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उदयपुर: टीबी क्लीनिक में सुरक्षा का अभाव, 14 वर्षों में 3648 मरीजों ने तोड़ा दम

मोहम्मद फ़ैज़ान

मोहम्मद फ़ैज़ान

संपादक

6 जुलाई 20263 मिनट पढ़ें 1.4K
उदयपुर: टीबी क्लीनिक में सुरक्षा का अभाव, 14 वर्षों में 3648 मरीजों ने तोड़ा दम
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संक्रमण का केंद्र बना एमबी अस्पताल का टीबी क्लीनिक

उदयपुर के महाराणा भूपाल (एमबी) अस्पताल परिसर में संचालित टीबी क्लीनिक वर्तमान में मरीजों और स्वास्थ्य कर्मियों के लिए एक बड़े खतरे का केंद्र बनता जा रहा है। प्रतिदिन यहां 40 से 50 नए टीबी मरीज इलाज के लिए आते हैं, लेकिन इस संवेदनशील स्थान पर हवा को शुद्ध करने वाली बुनियादी तकनीक का घोर अभाव है। क्लीनिक में न तो हेपा फिल्टर लगे हैं और न ही यूवी-सी रेज मशीनें, जो हवा में मौजूद घातक बैक्टीरिया को निष्क्रिय करने के लिए अनिवार्य मानी जाती हैं।

टीबी एक संक्रामक बीमारी है जो खांसने या छींकने के दौरान हवा में फैलने वाले सूक्ष्म कणों से फैलती है। ऐसे में वेंटिलेशन की कमी और सुरक्षा उपकरणों के बिना यह स्थान मरीजों, उनके परिजनों और वहां कार्यरत डॉक्टरों व पैरामेडिकल स्टाफ के लिए हाई-रिस्क जोन में तब्दील हो गया है। विशेष रूप से कमजोर इम्यूनिटी वाले बच्चे, बुजुर्ग और अन्य गंभीर बीमारियों से जूझ रहे लोगों के लिए यहां का वातावरण अत्यंत असुरक्षित है।

14 साल का भयावह आंकड़ा और बजट की अनदेखी

बड़ी स्थित टीबी अस्पताल के पिछले 14 वर्षों के आंकड़ों पर नजर डालें तो स्थिति की गंभीरता का अंदाजा लगाया जा सकता है। इस अवधि में 4 लाख 12 हजार से अधिक ओपीडी और 1 लाख 5 हजार से ज्यादा भर्ती मरीजों के बीच कुल 3,648 लोगों की मृत्यु दर्ज की गई है। संक्रमण की इस भयावहता के बावजूद शहर के बीचों-बीच स्थित एमबी टीबी क्लीनिक को बजट के अभाव में उपेक्षित छोड़ दिया गया है।

दिलचस्प बात यह है कि तीन महीने पहले नई दिल्ली से आई सेंट्रल टीबी डिविजन की टीम ने बड़ी स्थित मुख्य टीबी अस्पताल में 72 सुरक्षा मशीनें लगवाई थीं। वहां के वार्डों और गलियारों को संक्रमण मुक्त करने के लिए कड़े निर्देश दिए गए थे, जिसका पालन भी किया गया। हालांकि, शहर के सबसे व्यस्त इस क्लीनिक के लिए अधिकारियों के पास अब भी बजट का बहाना है, जिससे सुरक्षा व्यवस्था भगवान भरोसे है।

क्यों जरूरी हैं हेपा फिल्टर और यूवी-सी तकनीक?

अस्पतालों में संक्रमण को रोकने के लिए हेपा (हाई एफिशिएंसी पार्टिक्युलेट एयर) फिल्टर का उपयोग हवा में तैर रहे सूक्ष्म कणों, फंगस और बैक्टीरिया को सोखने के लिए किया जाता है। वहीं, यूवी-सी रेज मशीनें अपनी पराबैंगनी किरणों के जरिए सतह और हवा में मौजूद वायरस व बैक्टीरिया के डीएनए को निष्क्रिय कर देती हैं। इन उपकरणों के बिना टीबी जैसे संक्रामक रोग के प्रसार को रोकना लगभग असंभव है।

अधिकारियों का कहना है कि वे फंड की प्रतीक्षा कर रहे हैं। जिला टीबी अधिकारी डॉ. प्रणव भावसार ने स्पष्ट किया है कि बजट मिलते ही इन उपकरणों को लगवाना उनकी पहली प्राथमिकता होगी। वहीं, बड़ी टीबी अस्पताल के प्रभारी डॉ. मनोज आर्य ने भी माना है कि शहर के क्लीनिक में भी बड़ी अस्पताल जैसी सुरक्षा व्यवस्था तुरंत लागू की जानी चाहिए।

आगे की राह

फिलहाल, स्वास्थ्य विभाग की ओर से कोई ठोस समयसीमा तय नहीं की गई है। जब तक बजट स्वीकृत नहीं होता, तब तक एमबी टीबी क्लीनिक में आने वाले सैकड़ों लोग संक्रमण के साये में इलाज कराने को मजबूर हैं। आम जनता और स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जल्द ही सुरक्षा मानकों को पूरा नहीं किया गया, तो संक्रमण का दायरा और अधिक बढ़ सकता है।

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टिप्पणियाँ (2)

  • अमित कुमार2 घंटे पहले

    बहुत बढ़िया और संतुलित रिपोर्टिंग। FN News पर भरोसा बना रहता है।

  • सपना ठाकुर4 घंटे पहले

    ग्वालियर-चंबल की खबरें इतनी डिटेल में और कहीं नहीं मिलतीं। शुक्रिया!

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