शहडोल में डीएमएफ फंड का बड़ा खेल: हाईवे के गड्ढों को तालाब बताकर डकारे करोड़ों

मोहम्मद फ़ैज़ान
संपादक

डीएमएफ फंड के दुरुपयोग का मामला
शहडोल जिले में डिस्ट्रिक्ट मिनरल फाउंडेशन (डीएमएफ) की राशि के उपयोग को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। जिले में तालाब निर्माण और सौंदर्यीकरण के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च किए गए, लेकिन जमीनी हकीकत कागजों पर दर्ज दावों से बिल्कुल उलट है। पड़ताल में सामने आया है कि जिन परियोजनाओं के लिए भारी-भरकम बजट आवंटित किया गया, वहां या तो कोई काम नहीं हुआ या फिर पहले से मौजूद ढांचों को नया बताकर भुगतान उठा लिया गया।
वर्ष 2022-23 की कार्ययोजना के तहत डीएमएफ मद से तालाबों के निर्माण, घाटों के सौंदर्यीकरण और जल संरक्षण के लिए बड़ी धनराशि स्वीकृत की गई थी। रिकॉर्ड के अनुसार, एक औसत तालाब के निर्माण पर 25 लाख रुपये का खर्च दिखाया गया है। हालांकि, धरातल पर स्थिति यह है कि आधे से अधिक स्वीकृत प्रोजेक्ट उन स्थानों पर हैं जहां तालाब वर्षों से पहले से ही मौजूद थे, या फिर वे केवल हाईवे निर्माण के दौरान बने गड्ढे हैं।
सड़क के गड्ढों को बताया तालाब
भ्रष्टाचार का एक बड़ा उदाहरण जयसिंहनगर ब्लॉक के जोरा गांव में देखने को मिला। यहाँ रीवा-शहडोल हाईवे के निर्माण के दौरान मुरम निकालने के लिए एक बड़ा गड्ढा खोदा गया था। इस गड्ढे को ही प्रशासन ने एक 'नवीन तालाब' का दर्जा दे दिया और इसके लिए 25 लाख रुपये की राशि आवंटित कर दी गई। बिना किसी वास्तविक निर्माण कार्य के इस सरकारी धन का भुगतान भी कर दिया गया, जो सीधे तौर पर वित्तीय अनियमितता की ओर इशारा करता है।
इसी तरह बरना पंचायत के झिरिया में एक 20 साल पुराने तालाब की पाल टूटने पर उसकी मरम्मत की जानी चाहिए थी। लेकिन नियमों को दरकिनार कर इसे 'नवीन तालाब निर्माण' के रूप में पेश किया गया और 20.56 लाख रुपये की मंजूरी ले ली गई। ब्योहारी ब्लॉक के तेंदुहा गांव में भी ऐसा ही मामला सामने आया, जहां पहले से निर्मित नाले की पिचिंग को नया तालाब बताकर 25 लाख रुपये का भुगतान प्राप्त कर लिया गया।
प्रशासनिक जवाब और जांच की स्थिति
इस पूरे मामले पर शहडोल कलेक्टर केदार सिंह का कहना है कि डीएमएफ फंड से पुराने तालाबों का निर्माण नहीं किया जा सकता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि हाईवे निर्माण के दौरान मुरम निकालने से बने गड्ढों को तालाब में बदलने के सरकारी निर्देश जरूर थे, और संभव है कि उसी गाइडलाइन के तहत कार्य किया गया हो। हालांकि, उन्होंने इस पूरे मामले की गंभीरता को देखते हुए जिला पंचायत सीईओ से जांच कराने का आश्वासन दिया है।
स्थानीय स्तर पर इस खुलासे के बाद हड़कंप मचा हुआ है। सवाल यह उठ रहा है कि आखिर बिना भौतिक सत्यापन के भुगतान कैसे जारी कर दिया गया। डीएमएफ की राशि का उद्देश्य जिले के खनन प्रभावित क्षेत्रों का विकास करना है, लेकिन इस तरह के कथित घोटालों ने विकास के दावों पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है। अब देखना यह है कि जिला प्रशासन की जांच में क्या तथ्य सामने आते हैं और क्या दोषियों पर कोई ठोस कार्रवाई की जाती है।

संपादक
मोहम्मद फ़ैज़ान
टिप्पणियाँ (2)
- अअमित कुमार2 घंटे पहले
बहुत बढ़िया और संतुलित रिपोर्टिंग। FN News पर भरोसा बना रहता है।
- ससपना ठाकुर4 घंटे पहले
ग्वालियर-चंबल की खबरें इतनी डिटेल में और कहीं नहीं मिलतीं। शुक्रिया!
