नीमच: किसान ने बदली खेती की तस्वीर, लागत में 80% की कटौती कर हासिल की बंपर पैदावार
Neemuch farmer cuts farming cost 80% to just ₹12,000, achieving 55-60 bags of wheat. नीमच जिले की मनासा तहसील क्षेत्र के ग्राम फूलपुरा में एक किसान की पहल अब दूसरे किसानों के लिए प्रेरणा बन रही है।

मोहम्मद फ़ैज़ान
संपादक

रासायनिक खेती को छोड़ अपनाई नई राह
नीमच जिले की मनासा तहसील के फूलपुरा गांव में एक किसान की मेहनत और नवाचार ने कृषि क्षेत्र में एक नई मिसाल पेश की है। किसान प्रकाश खूंवार ने वर्षों से चली आ रही रासायनिक खाद और कीटनाशकों पर निर्भर खेती को त्यागकर पुनर्योजी कृषि (रिजेनरेटिव एग्रीकल्चर) का मार्ग चुना है। इस बदलाव ने न केवल उनकी आर्थिक स्थिति को सुधारा है, बल्कि मिट्टी की सेहत को भी पुनर्जीवित किया है।
कुछ साल पहले तक प्रकाश अपनी 10 बीघा भूमि पर खेती के लिए डीएपी, यूरिया और सुपर फास्फेट जैसे महंगे रसायनों पर सालाना करीब 60 हजार रुपये खर्च करते थे। इसके बावजूद मिट्टी की उर्वरता लगातार घट रही थी और उत्पादन लागत का बोझ बढ़ता जा रहा था। इस स्थिति से परेशान होकर उन्होंने तीन साल पहले पुनर्योजी कृषि का प्रशिक्षण लिया और अपनी खेती की पद्धति में आमूलचूल परिवर्तन करने का निर्णय लिया।
लागत में भारी कमी और बेहतर उत्पादन
प्रशिक्षण के बाद प्रकाश ने अपने खेत में नीमास्त्र, घन जीवामृत और वर्मी कम्पोस्ट का उपयोग शुरू किया। उन्होंने अपने घर पर ही वर्मी कम्पोस्ट इकाई स्थापित की और नियमित रूप से जीवामृत तैयार कर मिट्टी की गुणवत्ता को सुधारा। इस बदलाव का परिणाम बेहद सकारात्मक रहा। वर्तमान में उनकी खेती की लागत घटकर मात्र 12 हजार रुपये रह गई है, जो पहले की तुलना में लगभग 80 प्रतिशत कम है।
लागत कम होने के साथ-साथ उत्पादन में भी उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। प्रकाश को अपनी 4 से 5 बीघा भूमि से 55 से 60 बोरी गेहूं की पैदावार मिल रही है। रसायनमुक्त होने के कारण उनकी उपज की बाजार में भारी मांग है और उन्हें पहले की तुलना में बेहतर दाम भी मिल रहे हैं।
जैविक खाद और कीटनाशक बनाने की विधि
प्रकाश खूंवार की सफलता के पीछे उनकी वैज्ञानिक पद्धति है। वे पुराने खाद में जीवामृत और छाछ मिलाकर उसे छायादार स्थान पर रखते हैं, जिससे जीवाणुओं की संख्या तेजी से बढ़ती है। इस मिश्रण को जमीन की नमी में देने से फसल की पैदावार में गुणात्मक सुधार होता है। कीटनाशक घोल को भी वे ड्रम में विशेष विधि से तैयार करते हैं। वे प्रति बीघा 15 लीटर जीवामृत और 10 बीघा के लिए एक ट्राली जैविक खाद का उपयोग करते हैं।
सॉलिडेरिडाड संस्था के महाप्रबंधक डॉ. सुरेश मोटवानी के अनुसार, भारत-यूरोपीय संघ साझेदारी कार्यक्रम के तहत किसानों को रासायनिक निर्भरता कम करने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। प्रकाश खूंवार इस अभियान के एक सफल उदाहरण के रूप में उभरे हैं। वे अब अपने अनुभव अन्य किसानों के साथ साझा कर रहे हैं ताकि अधिक से अधिक लोग जैविक और पुनर्योजी खेती की ओर रुख कर सकें।
खेती का भविष्य और प्रेरणा
प्रकाश की यह पहल न केवल उनके परिवार के लिए लाभकारी साबित हुई है, बल्कि आसपास के किसानों के लिए भी प्रेरणा का स्रोत बन गई है। रसायनों के अंधाधुंध प्रयोग से होने वाले नुकसान को समझते हुए, अब कई अन्य किसान भी उनसे जैविक खाद बनाने की तकनीक सीख रहे हैं। यह बदलाव आने वाले समय में क्षेत्र की कृषि अर्थव्यवस्था को अधिक टिकाऊ और लाभदायक बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।
मिट्टी की उर्वरता को बनाए रखने और कम लागत में अधिक मुनाफा कमाने की यह तकनीक साबित करती है कि पारंपरिक और आधुनिक ज्ञान का सही मेल खेती को फिर से मुनाफे का सौदा बना सकता है। प्रकाश खूंवार का यह सफर उन सभी किसानों के लिए एक मार्गदर्शक है जो खेती में नई संभावनाओं की तलाश कर रहे हैं।

संपादक
मोहम्मद फ़ैज़ान
टिप्पणियाँ (2)
- अअमित कुमार2 घंटे पहले
बहुत बढ़िया और संतुलित रिपोर्टिंग। FN News पर भरोसा बना रहता है।
- ससपना ठाकुर4 घंटे पहले
ग्वालियर-चंबल की खबरें इतनी डिटेल में और कहीं नहीं मिलतीं। शुक्रिया!
