सतना जिला अस्पताल में मरीजों की कमी का सच: विशेषज्ञ डॉक्टरों और संसाधनों के अभाव ने बढ़ाई मुश्किलें
Satna district hospital patient exodus reasons revealed. Manoj Shukla report finding expert doctor shortage, human resource gaps. स्वास्थ्य विभाग ने स्वीकार किया कि विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी, मानव संसाधनों का अभाव, मरीजों का अत्यधिक दबाव और बेहतर सुविधाओं की अपेक्षा के कारण मरीज निजी अस्पतालों का रुख कर रहे हैं।

मोहम्मद फ़ैज़ान
संपादक

जांच रिपोर्ट में स्वास्थ्य सेवाओं की पोल खुली
सतना जिला अस्पताल से मरीजों के लगातार निजी अस्पतालों की ओर पलायन करने के मामले ने अब तूल पकड़ लिया है। स्वास्थ्य विभाग द्वारा कराई गई एक आधिकारिक जांच में उन कारणों की पुष्टि हुई है, जिनकी वजह से आम जनता सरकारी स्वास्थ्य सुविधाओं से दूर हो रही है। मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) को सौंपी गई इस रिपोर्ट में अस्पताल की लचर व्यवस्था और संसाधनों की भारी कमी को मुख्य वजह माना गया है।
तीन सदस्यीय जांच टीम ने अपनी पड़ताल में पाया कि अस्पताल में मरीजों का दबाव उसकी क्षमता से कहीं अधिक है। बेड ऑक्यूपेंसी दर 150 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है, जिससे स्वास्थ्य सेवाओं पर अत्यधिक बोझ पड़ रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी और मानव संसाधनों का अभाव मरीजों को निजी अस्पतालों की ओर जाने के लिए मजबूर कर रहा है।
विशेषज्ञ डॉक्टरों के आधे पद खाली
अस्पताल में डॉक्टरों की उपलब्धता की स्थिति बेहद चिंताजनक है। रिपोर्ट के मुताबिक, विशेषज्ञ चिकित्सकों के कुल 42 स्वीकृत पद हैं, लेकिन वर्तमान में केवल 21 डॉक्टर ही अपनी सेवाएं दे रहे हैं। यानी आधे पद लंबे समय से रिक्त पड़े हैं। इसी तरह, चिकित्सा अधिकारियों के 27 स्वीकृत पदों में से केवल 17 पर ही तैनाती है। नर्सिंग स्टाफ की स्थिति भी कुछ ऐसी ही है, जहां 203 पदों के मुकाबले केवल 160 कर्मचारी ही काम कर रहे हैं।
स्टाफ की इस कमी का सीधा असर मरीजों के इलाज पर पड़ रहा है। जब अस्पताल में विशेषज्ञ डॉक्टर ही मौजूद नहीं होंगे, तो गंभीर मरीजों को इलाज के लिए निजी अस्पतालों का रुख करना ही पड़ता है। हालांकि, विभाग का दावा है कि अस्पताल में 24 घंटे आपातकालीन सेवाएं जारी हैं, लेकिन जमीनी हकीकत इन दावों के विपरीत नजर आती है।
आईसीयू और वेंटिलेटर की स्थिति
गंभीर मरीजों के लिए सबसे महत्वपूर्ण माने जाने वाले आईसीयू वार्ड की स्थिति भी संतोषजनक नहीं है। जिला अस्पताल में 30 आईसीयू बेड उपलब्ध हैं, जिनमें से 13 वेंटिलेटर की सुविधा है। वर्तमान में इनमें से 10 वेंटिलेटर ही चालू हालत में हैं, जबकि 3 वेंटिलेटर मरम्मत के लिए बंद पड़े हैं। अस्पताल में फिलहाल 20 गंभीर मरीज भर्ती हैं, जिनके इलाज के लिए सीमित संसाधनों का उपयोग किया जा रहा है।
जांच टीम में सिविल सर्जन अमर सिंह, जिला कुष्ठ अधिकारी डॉ. प्रियंक खटवानी और डिप्टी एमईईओ गीता मिश्रा शामिल थे। टीम ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट किया है कि बेहतर सुविधाओं की अपेक्षा और समय पर इलाज न मिल पाने के डर से मरीज निजी अस्पतालों में जाने को प्राथमिकता दे रहे हैं।
सुधार की दिशा में क्या है चुनौती?
स्वास्थ्य विभाग के लिए अब सबसे बड़ी चुनौती रिक्त पदों को भरना और मौजूदा संसाधनों का बेहतर प्रबंधन करना है। रिपोर्ट में यह स्वीकार किया गया है कि संसाधनों की कमी जिला अस्पताल की सबसे बड़ी बाधा बनी हुई है। यदि समय रहते विशेषज्ञ डॉक्टरों की नियुक्ति नहीं की गई और बुनियादी ढांचे में सुधार नहीं हुआ, तो मरीजों का सरकारी अस्पताल से मोहभंग होना जारी रहेगा।
अब देखना यह होगा कि इस जांच रिपोर्ट के सामने आने के बाद जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग क्या ठोस कदम उठाता है। मरीजों को बेहतर और सुलभ इलाज मुहैया कराना सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए, ताकि उन्हें निजी अस्पतालों के महंगे खर्च से बचाया जा सके।

संपादक
मोहम्मद फ़ैज़ान
टिप्पणियाँ (2)
- अअमित कुमार2 घंटे पहले
बहुत बढ़िया और संतुलित रिपोर्टिंग। FN News पर भरोसा बना रहता है।
- ससपना ठाकुर4 घंटे पहले
ग्वालियर-चंबल की खबरें इतनी डिटेल में और कहीं नहीं मिलतीं। शुक्रिया!
