बागेश्वर धाम के धीरेंद्र शास्त्री के यूपी दौरे पर सियासी घमासान, अखिलेश यादव ने जताई आपत्ति
भगवान राम और कृष्ण की तुलना को लेकर विवादों में आए बागेश्वर धाम के पीठाधीश्वर धीरेंद्र शास्त्री का सपा प्रमुख अखिलेश यादव खुलकर विरोध कर रहे हैं। अखिलेश ने यहां तक इच्छा जताई कि बाबा की यूपी में एंट्री नहीं होनी चाहिए।

मुश्ताक अहमद खान
Editor In Chief

उत्तर प्रदेश की राजनीति में बागेश्वर धाम के पीठाधीश्वर धीरेंद्र शास्त्री के आगामी दौरों को लेकर हलचल तेज हो गई है। राज्य में होने वाले विधानसभा चुनावों के मद्देनजर धीरेंद्र शास्त्री के प्रस्तावित कार्यक्रमों ने सियासी गलियारों में बहस छेड़ दी है। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने इन कार्यक्रमों पर कड़ा रुख अपनाते हुए बाबा बागेश्वर के उत्तर प्रदेश में प्रवेश को लेकर अपनी असहमति और विरोध दर्ज कराया है।
विवादों का केंद्र बने धीरेंद्र शास्त्री
धीरेंद्र शास्त्री हाल ही में भगवान राम और कृष्ण की तुलना को लेकर दिए गए अपने बयानों के कारण चर्चा और विवादों के केंद्र में रहे हैं। उनके इन बयानों ने न केवल धार्मिक बल्कि राजनीतिक स्तर पर भी तीखी प्रतिक्रियाएं पैदा की हैं। इसी पृष्ठभूमि में, जब उत्तर प्रदेश में उनके कई रामकथा आयोजनों की रूपरेखा तैयार की गई, तो विपक्षी दलों ने इसे चुनावी चश्मे से देखना शुरू कर दिया है।
अखिलेश यादव ने सार्वजनिक रूप से बाबा बागेश्वर के यूपी आगमन का विरोध करते हुए कहा है कि उन्हें राज्य में प्रवेश नहीं करने देना चाहिए। सपा प्रमुख की इस टिप्पणी को राजनीतिक विश्लेषक आगामी चुनावों से जोड़कर देख रहे हैं। उनका मानना है कि अखिलेश यादव का यह रुख राज्य के वोट बैंक और धार्मिक ध्रुवीकरण की राजनीति को प्रभावित करने की एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा हो सकता है।
चुनाव से पहले रामकथाओं का गणित
उत्तर प्रदेश में धीरेंद्र शास्त्री की छह रामकथाएं प्रस्तावित हैं। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि इन आयोजनों के माध्यम से राज्य में एक बड़ा जनसमूह एकत्रित हो सकता है, जिसका सीधा लाभ भारतीय जनता पार्टी को मिल सकता है। यही कारण है कि समाजवादी पार्टी के नेतृत्व ने इन कार्यक्रमों को लेकर अपनी चिंताएं जाहिर की हैं। अखिलेश यादव का मानना है कि इन आयोजनों का उद्देश्य केवल धार्मिक नहीं, बल्कि राजनीतिक लाभ हासिल करना है।
विपक्ष का यह भी आरोप है कि ऐसे आयोजनों के माध्यम से समाज में वैचारिक विभाजन पैदा करने की कोशिश की जा रही है। हालांकि, धीरेंद्र शास्त्री के समर्थकों का कहना है कि वे केवल अपनी सनातन परंपरा और रामकथा का प्रचार कर रहे हैं, जिसका राजनीति से कोई लेना-देना नहीं है। इस दावे के बावजूद, राज्य की राजनीति में इन कथाओं को लेकर तनाव स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।
सियासी नफा-नुकसान की अटकलें
राज्य में चुनाव की आहट के साथ ही हर गतिविधि का राजनीतिक विश्लेषण किया जा रहा है। अखिलेश यादव का विरोध इस बात का संकेत है कि समाजवादी पार्टी किसी भी ऐसे आयोजन को लेकर सतर्क है जो भाजपा के पक्ष में माहौल बना सकता है। दूसरी ओर, भाजपा ने अभी तक इस मामले पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है, लेकिन पार्टी के भीतर इन आयोजनों को लेकर उत्साह देखा जा रहा है।
आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या धीरेंद्र शास्त्री के ये कार्यक्रम निर्धारित समय पर संपन्न हो पाते हैं या फिर प्रशासन और राजनीतिक विरोध के चलते इनमें कोई बदलाव आता है। प्रशासन के लिए भी यह एक चुनौती हो सकती है कि वह कानून-व्यवस्था बनाए रखते हुए इन धार्मिक आयोजनों को कैसे संचालित करता है।
फिलहाल, उत्तर प्रदेश की राजनीति में यह मुद्दा एक बड़े विवाद के रूप में उभर कर सामने आया है। एक तरफ धार्मिक आयोजनों की स्वतंत्रता का प्रश्न है, तो दूसरी तरफ चुनावी माहौल में शांति और सौहार्द बनाए रखने की जिम्मेदारी। अखिलेश यादव के बयान के बाद अब अन्य राजनीतिक दलों की प्रतिक्रियाओं का भी इंतजार है, जिससे यह स्पष्ट हो पाएगा कि राज्य की राजनीति किस दिशा में करवट ले रही है।

Editor In Chief
मुश्ताक अहमद खान
टिप्पणियाँ (2)
- अअमित कुमार2 घंटे पहले
बहुत बढ़िया और संतुलित रिपोर्टिंग। FN News पर भरोसा बना रहता है।
- ससपना ठाकुर4 घंटे पहले
ग्वालियर-चंबल की खबरें इतनी डिटेल में और कहीं नहीं मिलतीं। शुक्रिया!