राजस्थान कॉलेज शिक्षक भर्ती पर हाईकोर्ट की रोक, संविदा प्रथा पर उठाए कड़े सवाल
Rajasthan High Court stays college lecturer recruitment citing exploitation of contractual teachers. राजस्थान हाईकोर्ट ने राजस्थान कॉलेज एजुकेशन सोसायटी के तहत की जा रही भर्तियों और प्रत्येक शैक्षणिक सत्र के बाद प्राध्यापकों की सेवाएं समाप्त कर नई नियुक्तियां करने की प्रक्रिया पर सख्ती दिखाई। कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि हर वर्ष शिक्षकों को हटाकर नए लोगों की नियुक्ति करना न केवल शिक्षकों के शोषण का कारण बन रहा है, बल्कि इसकी संवैधानिक वैधता पर भी गंभीर प्रश्

मोहम्मद फ़ैज़ान
संपादक

भर्ती प्रक्रिया पर हाईकोर्ट की सख्ती
राजस्थान हाईकोर्ट ने कॉलेज शिक्षा विभाग में चल रही नई नियुक्तियों की प्रक्रिया पर बड़ा फैसला सुनाते हुए अंतरिम रोक लगा दी है। कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश संजीव प्रकाश शर्मा और न्यायाधीश संजीत पुरोहित की खंडपीठ ने राजस्थान कॉलेज एजुकेशन सोसायटी (राजसेस) के माध्यम से की जा रही भर्तियों को लेकर राज्य सरकार के रवैये पर कड़ी नाराजगी जताई है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि जब तक इस मामले में अंतिम निर्णय नहीं आ जाता, तब तक नई भर्ती प्रक्रिया को आगे नहीं बढ़ाया जाएगा।
यह मामला तब सामने आया जब राजस्थान कॉलेज एजुकेशन सोसायटी के तहत प्रत्येक शैक्षणिक सत्र के बाद प्राध्यापकों की सेवाएं समाप्त कर नए सिरे से नियुक्तियां करने की प्रक्रिया को चुनौती दी गई। याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि यह व्यवस्था न केवल शिक्षकों के भविष्य के साथ खिलवाड़ है, बल्कि यह संवैधानिक प्रावधानों के भी विपरीत है।
संविदा नियुक्तियों को बताया गैर-जिम्मेदाराना
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के जवाब पर असंतोष व्यक्त करते हुए कहा कि उच्च शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र में राजपत्रित पदों पर संविदा के आधार पर नियुक्तियां करना सरकार के गैर-जिम्मेदाराना रवैये को दर्शाता है। कोर्ट ने टिप्पणी की कि हर साल शिक्षकों को हटाकर नए लोगों को रखना न केवल उनके शोषण का कारण बन रहा है, बल्कि इससे शिक्षा की गुणवत्ता पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
याचिकाकर्ताओं की ओर से पैरवी कर रहे अधिवक्ताओं ने कोर्ट को बताया कि 11 जुलाई 2022 के सरकारी आदेश के जरिए गठित राजस्थान कॉलेज एजुकेशन सोसायटी ने नियमित कॉलेजों को अपने अधीन ले लिया है। इस प्रक्रिया से राजस्थान शिक्षा सेवा (कॉलेजिएट शाखा) नियम-1986 को प्रभावी रूप से दरकिनार कर दिया गया है, जो कि पूरी तरह से असंवैधानिक है।
न्यायिक प्रक्रिया के दौरान भर्ती पर नाराजगी
अधिवक्ताओं ने कोर्ट का ध्यान इस ओर भी आकर्षित किया कि मामला पहले से ही न्यायालय में विचाराधीन था, इसके बावजूद सरकार ने नई भर्ती के लिए आवेदन आमंत्रित कर दिए। इस पर खंडपीठ ने कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा कि जब मामला कोर्ट में लंबित है, तो ऐसी प्रक्रिया शुरू करना उचित नहीं है। कोर्ट ने सरकार के इस कदम को न्यायिक गरिमा के प्रतिकूल माना है।
इस अंतरिम आदेश से प्रदेश भर के उन हजारों प्राध्यापकों को बड़ी राहत मिली है जो राजसेस और विद्या संबल योजना के तहत कार्यरत हैं। इन शिक्षकों को हर सत्र के बाद नौकरी जाने का डर सता रहा था, जिसे अब कोर्ट के इस आदेश के बाद कुछ समय के लिए विराम मिल गया है।
भविष्य की राह और संवैधानिक वैधता
हाईकोर्ट की इस टिप्पणी ने राज्य में उच्च शिक्षा के ढांचे पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सरकार नियमित पदों को संविदा के जरिए भरने की नीति पर कायम रहती है, तो यह आने वाले समय में कानूनी और प्रशासनिक जटिलताओं को और बढ़ा सकता है। कोर्ट अब इस मामले की संवैधानिक वैधता की गहराई से जांच करेगा।
आगामी सुनवाई में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि राज्य सरकार अपनी इस भर्ती नीति का बचाव किस प्रकार करती है और क्या वे नियमित नियुक्तियों की दिशा में कोई ठोस कदम उठाने का आश्वासन देते हैं। फिलहाल, कोर्ट का यह रुख राज्य के शिक्षा विभाग के लिए एक बड़ी चुनौती बनकर उभरा है।

संपादक
मोहम्मद फ़ैज़ान
टिप्पणियाँ (2)
- अअमित कुमार2 घंटे पहले
बहुत बढ़िया और संतुलित रिपोर्टिंग। FN News पर भरोसा बना रहता है।
- ससपना ठाकुर4 घंटे पहले
ग्वालियर-चंबल की खबरें इतनी डिटेल में और कहीं नहीं मिलतीं। शुक्रिया!
