मुजफ्फरनगर नगर पालिका विस्तार मामला: हाईकोर्ट ने 11 गांवों को शामिल करने की मांग वाली याचिका खारिज की
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मुजफ्फरनगर नगर पालिका परिषद में 11 और गांवों को शामिल करने की मांग वाली जनहित याचिका खारिज कर दी है। मुख्य न्यायाधीश अरुण भंसाली और न्यायमूर्ति क्षितिज शैलेंद्र की खंडपीठ ने यह आदेश मोहम्मद खालिद की जनहित याचिका पर पारित किया।

मोहम्मद फ़ैज़ान
संपादक

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मुजफ्फरनगर नगर पालिका परिषद की सीमाओं के विस्तार से जुड़ी एक महत्वपूर्ण जनहित याचिका को खारिज कर दिया है। इस याचिका में मांग की गई थी कि मुजफ्फरनगर के 11 और गांवों को नगर पालिका क्षेत्र में शामिल किया जाए। मुख्य न्यायाधीश अरुण भंसाली और न्यायमूर्ति क्षितिज शैलेंद्र की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के तर्कों को अपर्याप्त मानते हुए इसे खारिज करने का आदेश दिया।
क्या था पूरा मामला?
मामले की पृष्ठभूमि वर्ष 2008 से जुड़ी है, जब मुजफ्फरनगर नगर पालिका परिषद ने कुल 22 गांवों को अपनी सीमा में शामिल करने का एक प्रस्ताव तैयार किया था। इस प्रस्ताव पर लंबी प्रक्रिया चली और अंततः 29 सितंबर 2022 को राज्य सरकार द्वारा एक अधिसूचना जारी की गई। इस अधिसूचना के माध्यम से केवल 11 गांवों को ही नगर पालिका क्षेत्र का हिस्सा बनाया गया, जबकि शेष 11 गांवों को बाहर रखा गया।
याचिकाकर्ता मोहम्मद खालिद ने अदालत में तर्क दिया कि शेष 11 गांवों को नगर पालिका से बाहर रखने के पीछे कोई ठोस कारण नहीं बताया गया है। उन्होंने दावा किया कि इस संबंध में अप्रैल 2026 में राज्य सरकार को एक प्रतिवेदन भी सौंपा गया था, लेकिन उस पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। इसी के चलते उन्होंने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
अदालत की सख्त टिप्पणी
सुनवाई के दौरान खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि अधिसूचना जारी करने से पहले उत्तर प्रदेश म्युनिसिपलिटीज एक्ट, 1916 की धारा 3 और 4 के साथ-साथ संविधान के अनुच्छेद 243क्यू के तहत निर्धारित सभी कानूनी प्रक्रियाओं का पालन किया गया था। कोर्ट ने याचिकाकर्ता को फटकार लगाते हुए कहा कि याचिका पूरी तरह से सतही आरोपों पर आधारित है और इसमें कोई तथ्यात्मक दम नहीं है।
न्यायालय ने इस बात पर भी आश्चर्य जताया कि 2022 में जारी अधिसूचना को चुनौती देने के लिए याचिकाकर्ता ने चार साल का लंबा समय क्यों लिया। याचिका में इस देरी का कोई संतोषजनक कारण नहीं दिया गया था। कोर्ट ने कहा कि केवल मौखिक दावों के आधार पर प्रशासनिक निर्णयों में हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता।
कानूनी प्रक्रिया और निष्कर्ष
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि जब राज्य सरकार ने अधिनियम के प्रावधानों के तहत उचित प्रक्रिया अपनाकर अधिसूचना जारी की है, तो जनहित याचिका के माध्यम से अतिरिक्त गांवों को शामिल करने का निर्देश नहीं दिया जा सकता। यह एक नीतिगत मामला है जिसमें न्यायिक हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है।
इस निर्णय के बाद अब मुजफ्फरनगर नगर पालिका की सीमाएं वही रहेंगी जो 2022 की अधिसूचना में निर्धारित की गई थीं। याचिका खारिज होने से उन 11 गांवों के नगर पालिका में विलय की संभावना फिलहाल समाप्त हो गई है, जिन्हें इस विस्तार प्रक्रिया से बाहर रखा गया था।
यह मामला प्रशासनिक सीमाओं के निर्धारण में कानूनी प्रक्रियाओं के पालन और जनहित याचिकाओं के दायर करने के मानदंडों को फिर से रेखांकित करता है। हाईकोर्ट की इस टिप्पणी ने स्पष्ट कर दिया है कि बिना ठोस आधार और लंबी देरी के बाद दायर की गई याचिकाओं को अदालतें गंभीरता से नहीं लेंगी।

संपादक
मोहम्मद फ़ैज़ान
टिप्पणियाँ (2)
- अअमित कुमार2 घंटे पहले
बहुत बढ़िया और संतुलित रिपोर्टिंग। FN News पर भरोसा बना रहता है।
- ससपना ठाकुर4 घंटे पहले
ग्वालियर-चंबल की खबरें इतनी डिटेल में और कहीं नहीं मिलतीं। शुक्रिया!