41 साल बाद आया फैसला: 300 रुपये की रिश्वत लेने वाले लेखपाल की सजा हाईकोर्ट ने रखी बरकरार
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पिछले सप्ताह 41 साल पुरानी एक आपराधिक अपील को खारिज कर दिया। इसमें लगभग आधी सदी पहले 300 रुपये की रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों पकड़े गए एक चकबंदी लेखपाल की 1985 की सजा को बरकरार रखा गया था।

मोहम्मद फ़ैज़ान
संपादक

चार दशक पुरानी कानूनी लड़ाई का अंत
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में चार दशक से अधिक पुराने भ्रष्टाचार के मामले में कानपुर के एक पूर्व चकबंदी लेखपाल की दोषसिद्धि को बरकरार रखा है। यह मामला वर्ष 1977 का है, जब आरोपी महेश चंद को 300 रुपये की रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों पकड़ा गया था। निचली अदालत ने 1985 में उसे दोषी करार देते हुए सजा सुनाई थी, जिसे आरोपी ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। न्यायमूर्ति संजीव कुमार की पीठ ने लंबी सुनवाई के बाद अपील को खारिज कर दिया है।
क्या था रिश्वत का पूरा मामला
घटना 1 अप्रैल 1977 की है। शिकायतकर्ता वीरेंद्र सिंह ने आरोप लगाया था कि चकबंदी प्रक्रिया के दौरान लेखपाल महेश चंद और कानूनगो चंद्र सेन ने उनके पक्ष में फैसला देने के बदले 400 रुपये की मांग की थी। शिकायतकर्ता ने पहले कानूनगो को 100 रुपये दिए और बाद में सतर्कता विभाग (विजिलेंस) को सूचित किया। सतर्कता विभाग ने एक योजनाबद्ध तरीके से जाल बिछाया और फिनोलफथेलिन पाउडर लगे नोटों के साथ लेखपाल को एक होटल में रंगे हाथों गिरफ्तार किया।
गिरफ्तारी के समय जब लेखपाल के हाथों और जेबों को सोडियम कार्बोनेट के घोल से धोया गया, तो वे लाल हो गए, जो रिश्वत लेने का पुख्ता सबूत माना गया। निचली अदालत ने अक्टूबर 1985 में साक्ष्यों के आधार पर महेश चंद को दोषी पाया और सजा सुनाई। हालांकि, कानूनगो को इस मामले में बरी कर दिया गया था।
अदालत में बचाव पक्ष की दलीलें और कोर्ट का रुख
हाईकोर्ट में अपील के दौरान आरोपी ने तर्क दिया कि मुख्य शिकायतकर्ता वीरेंद्र सिंह की अदालत में गवाही नहीं हुई थी, इसलिए अभियोजन का मामला कमजोर है। साथ ही, यह भी दलील दी गई कि एक सार्वजनिक होटल में रिश्वत लेना असंभव है। हालांकि, राज्य सरकार ने स्पष्ट किया कि शिकायतकर्ता मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं के कारण गवाही देने में असमर्थ था, लेकिन अन्य स्वतंत्र गवाहों और सतर्कता विभाग के अधिकारियों की गवाही मामले को साबित करने के लिए पर्याप्त है।
न्यायालय ने इन तर्कों को खारिज करते हुए कहा कि यदि जाल बिछाने की प्रक्रिया और बरामदगी के साक्ष्य पुख्ता हैं, तो केवल शिकायतकर्ता की अनुपस्थिति से पूरा मामला खारिज नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने यह भी माना कि आरोपी ने स्वयं अपने बयान में होटल में उपस्थित होने की बात स्वीकार की थी, जो उसके खिलाफ गया।
अब आगे क्या होगा
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया है कि आरोपी महेश चंद के जमानत बांड रद्द कर दिए गए हैं। उसे अब आत्मसमर्पण करना होगा और निचली अदालत द्वारा सुनाई गई सजा की शेष अवधि काटनी होगी। यदि आरोपी निर्धारित समय में आत्मसमर्पण नहीं करता है, तो निचली अदालत को उसकी गिरफ्तारी के लिए दंडात्मक कार्रवाई करने के निर्देश दिए गए हैं।
यह फैसला भ्रष्टाचार के मामलों में साक्ष्यों की महत्ता और कानूनी प्रक्रिया की गंभीरता को दर्शाता है। 41 साल तक चली इस कानूनी प्रक्रिया ने यह साबित कर दिया है कि भ्रष्टाचार के मामलों में समय बीतने के बावजूद ठोस सबूतों के आधार पर न्याय सुनिश्चित किया जा सकता है।

संपादक
मोहम्मद फ़ैज़ान
टिप्पणियाँ (2)
- अअमित कुमार2 घंटे पहले
बहुत बढ़िया और संतुलित रिपोर्टिंग। FN News पर भरोसा बना रहता है।
- ससपना ठाकुर4 घंटे पहले
ग्वालियर-चंबल की खबरें इतनी डिटेल में और कहीं नहीं मिलतीं। शुक्रिया!