मध्य प्रदेश पुलिस में 15 हजार कर्मियों पर डिमोशन का संकट, डीपीसी प्रक्रिया से बढ़ी चिंता
Madhya Pradesh police demotion fears rise as DPC process begins. मध्य प्रदेश में पिछले करीब पांच साल से कार्यवाहक पदोन्नति के आधार पर उच्च पदों पर कार्यरत लगभग 15 हजार पुलिस अधिकारी-कर्मचारियों की पदोन्नति अब खतरे में पड़ गई है। डीपीसी में तय मापदंडों पर खरे नहीं उतरने वाले अधिकारियों और कर्मचारियों से कार्यवाहक प्रभार वापस लेकर उन्हें उनके मूल पद पर भेजा जाएगा।

मोहम्मद फ़ैज़ान
संपादक

कार्यवाहक प्रभार पर संकट के बादल
मध्य प्रदेश पुलिस विभाग में कार्यरत करीब 15 हजार अधिकारी और कर्मचारियों की पदोन्नति पर बड़ा संकट मंडरा रहा है। पिछले पांच वर्षों से कार्यवाहक पदोन्नति के आधार पर उच्च पदों की जिम्मेदारी संभाल रहे इन पुलिसकर्मियों को अब वापस अपने मूल पदों पर लौटना पड़ सकता है। राज्य में नई पदोन्नति नियमावली 2025 के लागू होने के बाद विभागीय पदोन्नति समिति (डीपीसी) की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है, जिसके चलते यह स्थिति उत्पन्न हुई है।
वर्ष 2016 से प्रदेश में नियमित पदोन्नति की प्रक्रिया रुकी हुई थी, जिसके कारण विभाग ने वर्ष 2021 से बड़ी संख्या में पुलिसकर्मियों को कार्यवाहक प्रभार देकर काम चलाया था। अब जब नियमित डीपीसी की प्रक्रिया शुरू हुई है, तो इन सभी कार्यवाहक नियुक्तियों की गहन समीक्षा की जा रही है। जो कर्मी डीपीसी के तय मापदंडों को पूरा नहीं कर पाएंगे, उनसे उच्च पद का प्रभार वापस ले लिया जाएगा।
पांढुर्णा से शुरू हुई कार्रवाई
कार्यवाहक प्रभार वापस लेने की प्रक्रिया धरातल पर दिखाई देने लगी है। इसकी शुरुआत पांढुर्णा जिले से हुई है, जहां पुलिस अधीक्षक ने 32 पुलिसकर्मियों के कार्यवाहक प्रभार को समाप्त करने के आदेश जारी किए हैं। ये सभी कर्मी अब तक कार्यवाहक प्रधान आरक्षक के रूप में सेवाएं दे रहे थे, लेकिन अब उन्हें वापस आरक्षक के मूल पद पर भेज दिया गया है। विभाग का कहना है कि यह निर्णय मध्य प्रदेश लोक सेवा पदोन्नति नियम-2025 और पुलिस मुख्यालय के स्पष्ट निर्देशों के तहत लिया गया है।
इस कार्रवाई के बाद से पुलिस महकमे में हड़कंप की स्थिति है। जिन पुलिसकर्मियों को लंबे समय से उच्च पद का वेतन और मान-सम्मान मिल रहा था, उनके लिए वापस मूल पद पर लौटना एक बड़ा झटका माना जा रहा है। विभागीय सूत्रों के अनुसार, आने वाले कुछ दिनों में प्रदेश के अन्य जिलों में भी इसी तरह की कार्रवाई देखने को मिल सकती है।
सेवा रिकॉर्ड की बारीकी से जांच
नियमित डीपीसी के लिए पुलिस मुख्यालय द्वारा पिछले पांच वर्षों के सेवा रिकॉर्ड को आधार बनाया जा रहा है। इसमें वार्षिक गोपनीय प्रतिवेदन (SIR), विभागीय दंड, निलंबन की अवधि और न्यायालय में लंबित मामलों की बारीकी से समीक्षा की जा रही है। यदि किसी कर्मी का रिकॉर्ड संतोषजनक नहीं पाया जाता है, तो उसे पदोन्नति के लिए अयोग्य माना जाएगा और उसका कार्यवाहक प्रभार तत्काल प्रभाव से निरस्त कर दिया जाएगा।
अनुमान है कि करीब एक हजार से अधिक अधिकारी-कर्मचारी ऐसे हो सकते हैं, जिन पर इस प्रक्रिया का सीधा और प्रतिकूल असर पड़ सकता है। पुलिस मुख्यालय के अधिकारी इस पूरी प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने और नियमों के दायरे में रहकर ही पदोन्नति देने की बात कह रहे हैं। अगले चार से पांच दिनों के भीतर इस संबंध में और भी महत्वपूर्ण आदेश जारी होने की संभावना जताई जा रही है।
विभाग में बढ़ता असंतोष
इस अचानक शुरू हुई प्रक्रिया ने पुलिसकर्मियों के बीच असंतोष का माहौल पैदा कर दिया है। कई वर्षों तक उच्च पद पर काम करने के बाद वापस नीचे के पद पर आना न केवल आर्थिक नुकसान का कारण बन रहा है, बल्कि इससे मनोबल पर भी असर पड़ने की आशंका है। हालांकि, विभाग का तर्क है कि नियमित पदोन्नति के लिए डीपीसी अनिवार्य है और नियमों का पालन करना कानूनी मजबूरी है।
आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार इस स्थिति को कैसे संभालती है और क्या उन पुलिसकर्मियों के लिए कोई राहत का रास्ता निकलता है जो लंबे समय से उच्च पदों पर अपनी सेवाएं दे रहे थे। फिलहाल, पूरे प्रदेश के पुलिस थानों में इस प्रक्रिया को लेकर चर्चाओं का दौर जारी है और हर कोई अपने भविष्य को लेकर चिंतित है।

संपादक
मोहम्मद फ़ैज़ान
टिप्पणियाँ (2)
- अअमित कुमार2 घंटे पहले
बहुत बढ़िया और संतुलित रिपोर्टिंग। FN News पर भरोसा बना रहता है।
- ससपना ठाकुर4 घंटे पहले
ग्वालियर-चंबल की खबरें इतनी डिटेल में और कहीं नहीं मिलतीं। शुक्रिया!
