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खोहनागोरियान हादसा: 700 मकानों की वैधता पर एक महीने बाद भी जेडीए मौन

मोहम्मद फ़ैज़ान

मोहम्मद फ़ैज़ान

संपादक

13 जुलाई 20263 मिनट पढ़ें 1.5K
खोहनागोरियान हादसा: 700 मकानों की वैधता पर एक महीने बाद भी जेडीए मौन
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जांच के नाम पर फाइलों का खेल

जयपुर के खोहनागोरियान स्थित रहीम नगर तलाई में पटाखा फैक्ट्री में हुए भीषण अग्निकांड को एक महीना बीत चुका है। इस हादसे में आठ लोगों की जान चली गई थी, लेकिन घटना के इतने समय बाद भी जयपुर विकास प्राधिकरण (जेडीए) यह स्पष्ट नहीं कर पाया है कि जिस क्षेत्र में 700 से अधिक मकान बने हुए हैं, वे सरकारी जमीन पर हैं या निजी खातेदारी कृषि भूमि पर। हादसे के तुरंत बाद शुरू हुई जांच फाइलों के बीच उलझकर रह गई है।

जेडीए के अधिकारी राजस्व रिकॉर्ड, सेटलमेंट नक्शों और मौके की पैमाइश के नाम पर लगातार एक विभाग से दूसरे विभाग तक फाइलें घुमा रहे हैं। स्थानीय निवासियों और जानकारों का आरोप है कि इस देरी के पीछे भू-माफिया और कुछ भ्रष्ट अधिकारियों की मिलीभगत है। सवाल यह है कि यदि जमीन विवादित है, तो वहां वर्षों से इतनी बड़ी बस्ती कैसे बस गई और यदि यह निजी जमीन है, तो इसका वैध रूपांतरण या स्वीकृत लेआउट क्यों नहीं है?

सरकारी जमीन पर कब्जे का आरोप

स्थानीय लोगों का दावा है कि रहीम नगर तलाई के आसपास की सरकारी भूमि, जिसमें श्मशान और तालाब की जमीन भी शामिल है, पर भू-माफियाओं ने कब्जा कर अवैध कॉलोनियां विकसित की हैं। आरोप है कि प्रभावशाली लोगों के फार्म हाउस और बड़े कब्जों के कारण जेडीए की प्रवर्तन शाखा कार्रवाई करने से बच रही है। पूर्व में भी इस क्षेत्र में अवैध कॉलोनियों को बसाने के लिए राजनीतिक संरक्षण और अधिकारियों की साठगांठ की चर्चाएं रही हैं।

पुराने भू-अभिलेखों में इस क्षेत्र में जलाशय का उल्लेख मिलता है, जबकि जेडीए की हालिया रिपोर्टों में तालाब के अस्तित्व को लेकर विरोधाभासी बातें कही गई हैं। यही विरोधाभास अब जांच की राह में सबसे बड़ा रोड़ा बना हुआ है, जिससे पूरी बसावट की वैधता पर सवालिया निशान लग गया है।

हादसे के बाद भी जारी है अवैध निर्माण

हैरानी की बात यह है कि आठ मौतों के दर्दनाक हादसे के बाद भी इलाके में अवैध निर्माण थमने का नाम नहीं ले रहे हैं। रहीम नगर तलाई से महज 500 मीटर की दूरी पर 'द्वारकापुरी-2' नाम से एक नई कॉलोनी के बसने की खबरें सामने आ रही हैं। बालकनाथ आश्रम के पीछे विकसित हो रही इस कॉलोनी में प्लॉटिंग और निर्माण कार्य जोरों पर है, जबकि जेडीए के पास इसकी कोई आधिकारिक स्वीकृति नहीं है।

वर्ष 2024 में भी जेडीए ने इसी क्षेत्र में 'द्वारकापुरी' नाम की एक अवैध कॉलोनी को ध्वस्त किया था। बावजूद इसके, उसी के पास फिर से नई कॉलोनी का बसना प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है। यदि यह निर्माण अवैध है, तो जेडीए की प्रवर्तन शाखा ने अब तक इसे रोकने के लिए कोई ठोस कदम क्यों नहीं उठाए हैं?

प्रशासन की चुप्पी और भविष्य की चुनौतियां

हादसे के बाद उम्मीद थी कि जेडीए पूरे क्षेत्र का सीमांकन कर स्थिति को स्पष्ट करेगा और अवैध निर्माणों पर बुलडोजर चलेगा। लेकिन एक महीने बाद भी कोई अंतिम निष्कर्ष न निकलना यह दर्शाता है कि प्रशासन इस मामले में ढुलमुल रवैया अपनाए हुए है। जब तक जमीन की स्थिति स्पष्ट नहीं होगी, तब तक न तो वहां रहने वाले लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित हो पाएगी और न ही भविष्य में होने वाले हादसों को रोका जा सकेगा।

अब देखना यह होगा कि जेडीए कब तक इन फाइलों की जांच पूरी करता है और क्या उन लोगों पर कार्रवाई की जाएगी जिन्होंने सरकारी जमीन पर कब्जा कर अवैध कॉलोनियां बसाई हैं। स्थानीय लोग अब इस मामले में उच्च स्तरीय जांच और सख्त कार्रवाई की मांग कर रहे हैं ताकि भविष्य में किसी और को अपनी जान न गंवानी पड़े।

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टिप्पणियाँ (2)

  • अमित कुमार2 घंटे पहले

    बहुत बढ़िया और संतुलित रिपोर्टिंग। FN News पर भरोसा बना रहता है।

  • सपना ठाकुर4 घंटे पहले

    ग्वालियर-चंबल की खबरें इतनी डिटेल में और कहीं नहीं मिलतीं। शुक्रिया!

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