एमपी हाईकोर्ट का कड़ा रुख: महाधिवक्ता कार्यालय में नियुक्तियों पर सरकार से मांगा जवाब
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने महाधिवक्ता कार्यालय में शासकीय अधिवक्ताओं की कथित नियम विरुद्ध नियुक्तियों पर कड़ा रुख अपनाया है। कार्यवाहक चीफ जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस प्रदीप मित्तल की युगलपीठ ने इस जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए राज्य शासन को नियुक्तियों से संबंधित पूरा रिकॉर्ड अदालत में पेश करने का निर्देश दिया है।

मोहम्मद फ़ैज़ान
संपादक

महाधिवक्ता कार्यालय में नियुक्तियों पर हाईकोर्ट की सख्ती
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने राज्य के महाधिवक्ता कार्यालय में शासकीय अधिवक्ताओं की नियुक्तियों को लेकर चल रहे विवाद पर कड़ा संज्ञान लिया है। कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश विवेक रूसिया और न्यायमूर्ति प्रदीप मित्तल की युगलपीठ ने इस मामले में राज्य सरकार को नोटिस जारी करते हुए नियुक्तियों से संबंधित संपूर्ण रिकॉर्ड तलब किया है। अदालत का यह रुख उन आरोपों के बाद सामने आया है जिनमें नियुक्तियों को नियमों के विरुद्ध बताया गया है।
यह मामला हाईकोर्ट बार एसोसिएशन जबलपुर के संयुक्त सचिव योगेश सोनी द्वारा दायर एक जनहित याचिका के जरिए सामने आया है। याचिकाकर्ता ने अदालत के समक्ष तर्क दिया है कि महाधिवक्ता कार्यालय में शासकीय अधिवक्ताओं की नियुक्ति प्रक्रिया में पारदर्शिता का घोर अभाव रहा है। याचिका में यह भी दावा किया गया है कि नियुक्त किए गए कई अधिवक्ता निर्धारित योग्यता और मानकों को पूरा नहीं करते हैं।
नियमों के उल्लंघन का गंभीर आरोप
याचिका में वर्ष 2013 की राजपत्र अधिसूचना का हवाला देते हुए स्पष्ट किया गया है कि किसी भी शासकीय अधिवक्ता की नियुक्ति के लिए न्यूनतम 10 वर्षों का विधिक अभ्यास अनिवार्य है। आरोप है कि वर्तमान में जिन अधिवक्ताओं को नियुक्त किया गया है, उनमें से कई इस अनिवार्य अनुभव की पात्रता नहीं रखते हैं। याचिकाकर्ता ने इसे मनमाना और पक्षपातपूर्ण निर्णय बताते हुए न्यायिक हस्तक्षेप की मांग की है।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के अधिवक्ता दिनेश उपाध्याय ने अदालत को बताया कि चयन प्रक्रिया में नियमों की अनदेखी की गई है, जिससे योग्य उम्मीदवारों के अधिकारों का हनन हुआ है। उन्होंने अदालत से इन नियुक्तियों की निष्पक्ष जांच कराने और नियमों के पालन सुनिश्चित करने का आग्रह किया है।
सरकार को रिकॉर्ड पेश करने का अंतिम अवसर
मंगलवार को हुई सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से अदालत से नियुक्तियों का रिकॉर्ड पेश करने के लिए अतिरिक्त समय की मांग की गई। युगलपीठ ने सरकार के अनुरोध को स्वीकार करते हुए उन्हें रिकॉर्ड प्रस्तुत करने का अंतिम अवसर प्रदान किया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि अगली सुनवाई में किसी भी प्रकार की कोताही बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
मामले की गंभीरता को देखते हुए हाईकोर्ट ने महाधिवक्ता को आगामी 10 अगस्त को व्यक्तिगत रूप से अदालत में उपस्थित रहने के निर्देश दिए हैं। इस आदेश के बाद प्रशासनिक गलियारों में हलचल तेज हो गई है। अब सभी की निगाहें 10 अगस्त को होने वाली सुनवाई पर टिकी हैं, जहां सरकार को अपना पक्ष रखना होगा और नियुक्तियों से जुड़े दस्तावेजी सबूत पेश करने होंगे।
न्यायिक प्रक्रिया और भविष्य की दिशा
यह मामला राज्य सरकार के कानूनी विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करता है। यदि आरोप सिद्ध होते हैं, तो यह नियुक्तियां रद्द की जा सकती हैं, जिससे राज्य के कानूनी कामकाज पर भी असर पड़ सकता है। हाईकोर्ट का यह हस्तक्षेप सरकारी नियुक्तियों में पारदर्शिता और योग्यता के महत्व को पुनः स्थापित करने के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है।
आगामी सुनवाई में महाधिवक्ता की उपस्थिति और सरकार द्वारा पेश किए जाने वाले रिकॉर्ड के आधार पर ही अदालत अपना अगला निर्णय लेगी। इस मामले का परिणाम न केवल संबंधित अधिवक्ताओं के करियर पर प्रभाव डालेगा, बल्कि भविष्य में होने वाली सरकारी नियुक्तियों के लिए भी एक नजीर साबित हो सकता है।

संपादक
मोहम्मद फ़ैज़ान
टिप्पणियाँ (2)
- अअमित कुमार2 घंटे पहले
बहुत बढ़िया और संतुलित रिपोर्टिंग। FN News पर भरोसा बना रहता है।
- ससपना ठाकुर4 घंटे पहले
ग्वालियर-चंबल की खबरें इतनी डिटेल में और कहीं नहीं मिलतीं। शुक्रिया!
