एमबीएम यूनिवर्सिटी कुलपति को बड़ी राहत: यौन उत्पीड़न संबंधी टिप्पणी पर हाईकोर्ट ने लगाई रोक
Rajasthan High Court provides interim relief to MBM University VC in sexual harassment case. राजस्थान हाईकोर्ट ने एमबीएम विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. अजय कुमार शर्मा को अंतरिम राहत देते हुए राज्यपाल सचिवालय के 3 जुलाई 2026 के आदेश में की उस टिप्पणी के प्रभाव पर रोक लगा दी है। इसमें कहा गया था कि उनके खिलाफ यौन उत्पीड़न के आरोप जांच रिपोर्ट में सही पाए गए हैं।

मोहम्मद फ़ैज़ान
संपादक

हाईकोर्ट से कुलपति को मिली अंतरिम राहत
राजस्थान हाईकोर्ट ने एमबीएम विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. अजय कुमार शर्मा को एक महत्वपूर्ण कानूनी राहत प्रदान की है। कोर्ट ने राज्यपाल सचिवालय द्वारा 3 जुलाई 2026 को जारी किए गए उस आदेश के कुछ हिस्सों पर अंतरिम रोक लगा दी है, जिसमें कुलपति के खिलाफ यौन उत्पीड़न के आरोपों को जांच रिपोर्ट में सही ठहराया गया था। जस्टिस डॉ. नूपुर भाटी की एकलपीठ ने इस मामले में राज्यपाल सचिवालय को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।
याचिकाकर्ता की ओर से पैरवी कर रहे अधिवक्ताओं ने कोर्ट को स्पष्ट किया कि कुलपति ने कर्मचारी की पुनर्बहाली से संबंधित आदेश को चुनौती नहीं दी है। उनकी मुख्य आपत्ति उन टिप्पणियों को लेकर है, जिनमें यह दावा किया गया कि उन्होंने अध्यादेश 327 (5) का दुरुपयोग किया है और उनके खिलाफ यौन उत्पीड़न के आरोप जांच में सिद्ध पाए गए हैं। कोर्ट ने इन दलीलों को प्रथमदृष्टया विचारणीय मानते हुए अगली सुनवाई तक इन टिप्पणियों के प्रभाव पर रोक लगा दी है।
जांच रिपोर्ट और प्रक्रिया पर सवाल
मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट के समक्ष यह बात सामने आई कि विश्वविद्यालय की आंतरिक शिकायत समिति (आईसीसी) ने कुलपति के विरुद्ध यौन उत्पीड़न की शिकायत की जांच नहीं की थी। समिति ने दिल्ली हाईकोर्ट के एक पूर्व निर्णय का हवाला देते हुए यह तर्क दिया था कि नियोक्ता के खिलाफ इस प्रकार की जांच करना उनके अधिकार क्षेत्र में नहीं आता है। इसके बावजूद राज्यपाल सचिवालय के आदेश में यौन उत्पीड़न के आरोपों को सही ठहराया जाना विवाद का मुख्य बिंदु बना हुआ है।
प्रस्तुत जांच रिपोर्ट के अनुसार, जांच समिति ने केवल मानसिक प्रताड़ना से जुड़े आरोपों को ही सही माना था। याचिकाकर्ता का पक्ष रखते हुए वकीलों ने तर्क दिया कि रिपोर्ट में यौन उत्पीड़न संबंधी निष्कर्षों का कोई ठोस आधार नहीं है। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने राज्यपाल सचिवालय के आदेश में की गई टिप्पणियों पर रोक लगाने का निर्णय लिया है, जिससे कुलपति को फिलहाल बड़ी राहत मिली है।
आगे की कानूनी प्रक्रिया
हाईकोर्ट ने इस मामले में स्थगन आवेदन पर भी नोटिस जारी किए हैं। अब राज्यपाल सचिवालय को कोर्ट के समक्ष अपना पक्ष रखना होगा कि किन आधारों पर कुलपति के खिलाफ यौन उत्पीड़न के आरोपों को सही माना गया था। इस कानूनी लड़ाई का असर विश्वविद्यालय प्रशासन और कुलपति के कार्यकाल पर पड़ सकता है, इसलिए शैक्षणिक गलियारों में इस मामले पर सबकी नजरें टिकी हुई हैं।
अगली सुनवाई में यह स्पष्ट हो सकेगा कि क्या राज्यपाल सचिवालय इन टिप्पणियों को वापस लेता है या फिर कोर्ट के समक्ष कोई नया साक्ष्य प्रस्तुत करता है। फिलहाल, हाईकोर्ट का यह आदेश कुलपति के लिए एक महत्वपूर्ण कानूनी सुरक्षा कवच के रूप में देखा जा रहा है, जिसने प्रशासनिक आदेशों की प्रक्रिया पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।
एमबीएम विश्वविद्यालय के इस प्रकरण ने उच्च शिक्षण संस्थानों में आंतरिक जांच समितियों की कार्यप्रणाली और राज्यपाल सचिवालय के आदेशों की वैधानिकता पर एक नई बहस छेड़ दी है। कोर्ट के अंतिम फैसले के बाद ही यह स्पष्ट हो पाएगा कि विश्वविद्यालय प्रशासन के भीतर चल रहे इस विवाद का क्या अंत होता है।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इस मामले में दिल्ली हाईकोर्ट के जिस निर्णय का हवाला दिया गया है, वह भविष्य में अन्य विश्वविद्यालयों के लिए भी एक नजीर बन सकता है। फिलहाल, हाईकोर्ट के हस्तक्षेप के बाद संबंधित टिप्पणियों पर रोक लगने से कुलपति को अपने पद पर कार्य करने के दौरान एक बड़ी राहत मिली है।

संपादक
मोहम्मद फ़ैज़ान
टिप्पणियाँ (2)
- अअमित कुमार2 घंटे पहले
बहुत बढ़िया और संतुलित रिपोर्टिंग। FN News पर भरोसा बना रहता है।
- ससपना ठाकुर4 घंटे पहले
ग्वालियर-चंबल की खबरें इतनी डिटेल में और कहीं नहीं मिलतीं। शुक्रिया!
