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करौली रोडवेज डिपो: 15 साल बाद भी नहीं मिल सकी स्वतंत्र पहचान, हिण्डौन पर निर्भरता बरकरार

राज्य सरकार ने वर्ष 2010-11 के बजट में करौली को रोडवेज डिपो की सौगात दी थी, लेकिन लगभग डेढ़ दशक बाद भी यह डिपो स्वतंत्र रूप से संचालित नहीं हो सका है। वर्ष 2012 में उद्घाटन, बसों के आवंटन और कर्मचारियों की नियुक्ति के बावजूद करौली डिपो आज भी हिण्डौन रोडवेज आगार के अधीन कार्य कर रहा है।

मोहम्मद फ़ैज़ान

मोहम्मद फ़ैज़ान

संपादक

1 अगस्त 20263 मिनट पढ़ें
करौली रोडवेज डिपो: 15 साल बाद भी नहीं मिल सकी स्वतंत्र पहचान, हिण्डौन पर निर्भरता बरकरार
मूल स्रोत

राजस्थान के करौली जिले में रोडवेज डिपो का सपना पिछले 15 वर्षों से अधूरा बना हुआ है। राज्य सरकार ने वर्ष 2010-11 के बजट में करौली को स्वतंत्र रोडवेज डिपो की सौगात दी थी, लेकिन डेढ़ दशक बीत जाने के बाद भी यह डिपो अपनी स्वतंत्र पहचान नहीं बना सका है। वर्ष 2012 में उद्घाटन और बसों के आवंटन के बावजूद, आज भी यह डिपो हिण्डौन आगार के अधीन संचालित हो रहा है।

सुविधाओं के विस्तार में आ रही बाधा

करौली को जिला बने तीन दशक से अधिक का समय हो चुका है, लेकिन जिला मुख्यालय होने के बावजूद यहां के यात्रियों को स्वतंत्र रोडवेज डिपो की सुविधाओं का लाभ नहीं मिल पा रहा है। स्थानीय निवासियों का मानना है कि यदि डिपो स्वतंत्र रूप से कार्य करने लगे, तो नए बस रूटों का संचालन आसान हो जाएगा। इससे ग्रामीण क्षेत्रों और आसपास के कस्बों के यात्रियों को परिवहन की बेहतर सुविधा मिल सकेगी।

वर्तमान आंकड़ों के अनुसार, करौली डिपो के नाम पर कुल 19 बसें पंजीकृत हैं, जिनमें 13 निगम की और 6 अनुबंधित बसें शामिल हैं। इन बसों के लिए 18 शेड्यूल तय किए गए हैं। हालांकि, डिपो के लिए ड्राइवर, परिचालक और कार्यालयीन कर्मचारियों के पद स्वीकृत होने के बावजूद, स्वतंत्र संचालन न होने के कारण अधिकांश कर्मचारी हिण्डौन आगार से ही अपनी सेवाएं दे रहे हैं।

वर्कशॉप के लिए जमीन की तलाश बनी चुनौती

रोडवेज अधिकारियों के अनुसार, स्वतंत्र संचालन की राह में सबसे बड़ी बाधा वर्कशॉप के लिए उपयुक्त भूमि का न होना है। हालांकि, स्थानीय स्तर पर यह सुझाव भी दिया गया है कि जब तक नई भूमि आवंटित नहीं होती, तब तक उपलब्ध संसाधनों और वर्कशॉप का उपयोग करके डिपो का संचालन शुरू किया जा सकता है। इस दिशा में अभी तक कोई ठोस निर्णय नहीं लिया जा सका है।

मुख्य प्रबंधक अशोक शर्मा ने इस संबंध में जानकारी देते हुए बताया कि वर्कशॉप के लिए उपयुक्त भूमि की तलाश की जा रही है। नगर परिषद की ओर से भूमि का प्रस्ताव जयपुर मुख्यालय भेजा गया है, लेकिन अभी तक वहां से अंतिम स्वीकृति नहीं मिली है। भूमि आवंटन की प्रक्रिया में देरी के कारण पूरा मामला अधर में लटका हुआ है।

बेहतर राजस्व के बावजूद उपेक्षा

आश्चर्यजनक बात यह है कि संसाधनों की कमी के बावजूद करौली डिपो का राजस्व प्रदर्शन काफी सराहनीय रहा है। भरतपुर जोन में उत्कृष्ट आय अर्जित करने के कारण इसे कई बार 'जोनल डिपो ऑफ द मंथ' के सम्मान से नवाजा जा चुका है। कैलादेवी धाम जैसे प्रसिद्ध धार्मिक स्थल पर साल भर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ और मेलों के दौरान लाखों यात्रियों की आवाजाही के बावजूद, डिपो को स्वतंत्र दर्जा न मिलना प्रशासनिक उदासीनता को दर्शाता है।

स्थानीय लोगों और यात्रियों को अब सरकार से उम्मीद है कि वे इस मामले में हस्तक्षेप करें और जल्द से जल्द करौली डिपो को स्वतंत्र आगार के रूप में विकसित करें। जब तक यह डिपो पूरी तरह से स्वायत्त नहीं होता, तब तक यात्रियों को परिवहन संबंधी समस्याओं का सामना करना पड़ेगा और डिपो का पूर्ण विकास भी संभव नहीं हो पाएगा।

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टिप्पणियाँ (2)

  • अ
    अमित कुमार2 घंटे पहले

    बहुत बढ़िया और संतुलित रिपोर्टिंग। FN News पर भरोसा बना रहता है।

  • स
    सपना ठाकुर4 घंटे पहले

    ग्वालियर-चंबल की खबरें इतनी डिटेल में और कहीं नहीं मिलतीं। शुक्रिया!

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