युवाओं के लिए घातक हुक्का और ई-सिगरेट, फेफड़ों के कैंसर का खतरा बढ़ा: विशेषज्ञ
KGMU Lucknow health warning on youth hookah e-cigarette addiction causing lung cancer. हुक्का पीने से एक बार में 20 से 25 सिगरेट का धुंआ अंदर जाता है। जो फेंफड़ों को नुकसान पहुंचाने के लिए काफी है।

मोहम्मद फ़ैज़ान
संपादक

लखनऊ स्थित किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU) के विशेषज्ञों ने युवाओं में बढ़ते हुक्का और ई-सिगरेट के चलन को लेकर गंभीर चेतावनी जारी की है। विश्व लंग कैंसर दिवस के अवसर पर पल्मोनरी मेडिसिन विभाग के विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया है कि ये आधुनिक नशे फेफड़ों के कैंसर का एक बड़ा कारण बन रहे हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, एक बार हुक्का पीने से शरीर के भीतर 20 से 25 सिगरेट के बराबर धुआं पहुंचता है, जो फेफड़ों को गंभीर नुकसान पहुंचाने के लिए पर्याप्त है।
धूम्रपान और अन्य कारक बन रहे जानलेवा
KGMU के पल्मोनरी मेडिसिन विभाग के प्रमुख डॉ. वेद प्रकाश ने बताया कि वर्तमान में 'जेन-जेड' (Gen Z) पीढ़ी इन नशों की चपेट में तेजी से आ रही है। उन्होंने कहा कि केवल धूम्रपान ही नहीं, बल्कि रसायनों का संपर्क, पर्यावरण प्रदूषण और घटती शारीरिक सक्रियता भी कम उम्र के बच्चों में लंग कैंसर के मामलों को बढ़ावा दे रही है। उन्होंने सलाह दी कि यदि किसी को लंबे समय तक खांसी की समस्या बनी हुई है, तो उसे नजरअंदाज न करें और तुरंत चिकित्सक से संपर्क कर लो-डोज सीटी स्कैन करवाएं।
आंकड़ों पर गौर करें तो वर्ष 2020 में विश्व स्तर पर लगभग 22 लाख लोग लंग कैंसर से पीड़ित थे, जिनमें से 19 लाख लोगों ने अपनी जान गंवा दी। पद्मश्री डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने बताया कि भारत में 2024 के दौरान 1.12 लाख नए मामले सामने आए, जिनमें से 98 हजार मरीजों की मृत्यु हो गई। यह दर टीबी जैसी बीमारियों से कहीं अधिक खतरनाक है, क्योंकि कैंसर का समय पर पता न चलने पर मरीज के पास बचने का समय बहुत कम होता है।
भारत और विदेशों में लंग कैंसर की बदलती तस्वीर
विशेषज्ञों के अनुसार, भारत और विदेशों में लंग कैंसर के पैटर्न में बड़ा अंतर देखने को मिल रहा है। विदेशों में जहां लंग कैंसर की औसत आयु 60 से 70 वर्ष है, वहीं भारत में यह अब 40 से 50 वर्ष की आयु के लोगों को भी अपनी चपेट में ले रहा है। इसके अलावा, विदेशों में 98 प्रतिशत मामले धूम्रपान से जुड़े होते हैं, जबकि भारत में 25 प्रतिशत मामले अन्य पर्यावरणीय और रासायनिक कारणों से होते हैं।
प्रो. शैलेंद्र यादव ने थोरेसिक सर्जरी विभाग की ओर से बताया कि भारत में इस बीमारी की पहचान में सबसे बड़ी चुनौती जागरूकता का अभाव है। अधिकांश मरीज अस्पताल तब पहुंचते हैं जब बीमारी काफी आगे बढ़ चुकी होती है, जिससे सर्जरी और इलाज की संभावनाएं सीमित हो जाती हैं। कई बार टीबी और कैंसर के बीच सही पहचान न हो पाने के कारण भी इलाज में देरी होती है।
लक्षण और बचाव के उपाय
लंग कैंसर के प्रमुख लक्षणों में लगातार खांसी आना, खांसी के साथ खून आना, सीने में दर्द, सांस लेने में तकलीफ, आवाज में भारीपन और बिना किसी कारण वजन कम होना शामिल है। चेहरे और गर्दन में सूजन या सिरदर्द भी इसके संकेत हो सकते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि प्रारंभिक अवस्था में पहचान ही जीवन बचाने की एकमात्र कुंजी है।
विश्व स्तर पर लंग कैंसर कैंसर से होने वाली मौतों का सबसे बड़ा कारण बना हुआ है। धूम्रपान के अलावा सेकंडहैंड स्मोक, रेडॉन गैस और एस्बेस्टस जैसे जहरीले पदार्थों के संपर्क में आना भी जोखिम को कई गुना बढ़ा देता है। विशेषज्ञों ने युवाओं से अपील की है कि वे हुक्का और ई-सिगरेट जैसे घातक नशों से दूर रहें और अपनी जीवनशैली में सुधार करें ताकि इस गंभीर बीमारी के बढ़ते प्रकोप को रोका जा सके।

संपादक
मोहम्मद फ़ैज़ान
टिप्पणियाँ (2)
- अअमित कुमार2 घंटे पहले
बहुत बढ़िया और संतुलित रिपोर्टिंग। FN News पर भरोसा बना रहता है।
- ससपना ठाकुर4 घंटे पहले
ग्वालियर-चंबल की खबरें इतनी डिटेल में और कहीं नहीं मिलतीं। शुक्रिया!
