ईपीएफ नियमों में बदलाव का विरोध: 8 करोड़ कर्मचारियों को भारी नुकसान की आशंका
EPF 64 year old rule change protest 2026. 31 crore employees. कर्मचारी भविष्य निधि के 64 साल पुराने नियमों में किए गए बदलाव मिल मालिकों और उद्योगपतियों के लिए फायदेमंद हैं। यह कर्मचारी की सेवानिवृत्ति में मिलने वाले फंड में भारी कटौती करने वाला है।

मोहम्मद फ़ैज़ान
संपादक

केंद्र सरकार द्वारा कर्मचारी भविष्य निधि (EPF) के 64 साल पुराने नियमों में किए गए बदलावों को लेकर देशभर के कर्मचारी संगठनों में भारी आक्रोश है। वर्ष 2026 के लिए प्रस्तावित इन नए नियमों को कर्मचारी और श्रमिक वर्ग के हितों के खिलाफ बताया जा रहा है। संगठनों का दावा है कि इससे देश के करीब 7.31 करोड़ कर्मचारियों और श्रमिकों के भविष्य पर सीधा असर पड़ेगा, जिसका प्रभाव लगभग 30 करोड़ लोगों के जीवन स्तर पर पड़ सकता है।
क्या है विवाद की मुख्य वजह?
वर्ष 1952 से लागू मौजूदा ईपीएफ नियमों के तहत कर्मचारी और नियोक्ता (मालिक) दोनों का 12-12 प्रतिशत अंशदान भविष्य निधि में जमा होता है। इसके अलावा स्थापना और बीमा के रूप में अतिरिक्त राशि भी जमा की जाती है, जो सेवानिवृत्ति के समय एक बड़ी सुरक्षा राशि के रूप में काम आती है। नए नियमों में तर्क दिया जा रहा है कि कर्मचारियों का अंशदान कम करने से उनके हाथ में अधिक वेतन आएगा, लेकिन कर्मचारी नेताओं का कहना है कि यह केवल एक पक्षीय और भ्रामक प्रचार है।
कर्मचारी नेताओं के अनुसार, नए नियमों का वास्तविक लाभ केवल मिल मालिकों और उद्योगपतियों को मिलेगा। वर्तमान व्यवस्था में एक लाख रुपये वेतन पाने वाले कर्मचारी के खाते में नियोक्ता की ओर से भी पर्याप्त अंशदान जमा होता है। नई व्यवस्था में यह राशि काफी कम हो जाएगी, जिससे सेवानिवृत्ति के समय मिलने वाले फंड में लाखों रुपये की भारी कटौती होने की संभावना है।
नियोक्ता को होगा सीधा लाभ
मध्य प्रदेश संविदा कर्मचारी अधिकारी महासंघ के प्रदेश अध्यक्ष रमेश राठौर ने स्पष्ट किया कि इन नियमों से नियोक्ताओं को प्रतिमाह हजारों रुपये की बचत होगी। 15,000 रुपये की वेतन सीमा (सीलिंग) के कारण अब मालिकों को कम अंशदान देना होगा, जिससे उनके खर्च में तो कमी आएगी, लेकिन कर्मचारियों को मिलने वाले भविष्य निधि लाभ में भारी गिरावट दर्ज की जाएगी। कर्मचारी लंबे समय से इस सीलिंग को हटाने की मांग कर रहे थे ताकि पूर्ण वेतन पर समान अंशदान मिल सके, लेकिन सरकार ने इसके विपरीत दिशा में कदम उठाया है।
सेवानिवृत्त कर्मचारी भविष्य निधि कल्याण समिति के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष चंद्रशेखर परसाई ने इसे कर्मचारियों के भविष्य के साथ खिलवाड़ बताया है। उन्होंने कहा कि एक लाख रुपये वेतन पाने वाले कर्मचारी को पुराने नियमों के मुकाबले नई व्यवस्था में सालाना लाखों रुपये का नुकसान उठाना पड़ सकता है। यह फंड ही सेवानिवृत्ति के बाद कर्मचारी और उसके परिवार का एकमात्र सहारा होता है।
सरकार से पुनर्विचार की मांग
देशभर के कर्मचारी संगठन अब इन नए नियमों के खिलाफ लामबंद हो रहे हैं। संगठनों ने केंद्र सरकार से मांग की है कि ईपीएफ योजना 2026 पर तत्काल पुनर्विचार किया जाए। उनकी मुख्य मांग वेतन सीलिंग को पूरी तरह समाप्त करने और कर्मचारी के वास्तविक वेतन पर समान अंशदान सुनिश्चित करने की है। नेताओं का कहना है कि यदि सरकार ने इन नियमों को वापस नहीं लिया, तो देशभर में व्यापक विरोध प्रदर्शन किए जाएंगे।
कर्मचारी नेताओं ने आरोप लगाया है कि सरकार की नीतियां पूंजीपतियों को लाभ पहुंचाने वाली हैं। उन्होंने पूर्व की घटनाओं का हवाला देते हुए कहा कि पहले भी पेंशन योजनाओं में बदलाव कर कर्मचारियों को नुकसान पहुंचाया गया था और अब पीएफ में कटौती कर उनके पेट पर लात मारने का काम किया जा रहा है। यह निर्णय कर्मचारी वर्ग के लिए बेहद निराशाजनक है।
वर्तमान में, कर्मचारी संगठन इस मुद्दे को लेकर एकजुट हो रहे हैं और आने वाले समय में सरकार पर दबाव बनाने के लिए रणनीति तैयार की जा रही है। देखना यह होगा कि क्या सरकार कर्मचारियों के इस विरोध को देखते हुए अपने निर्णय में कोई बदलाव करती है या फिर इन विवादास्पद नियमों को लागू करने पर अड़ी रहती है।

संपादक
मोहम्मद फ़ैज़ान
टिप्पणियाँ (2)
- अअमित कुमार2 घंटे पहले
बहुत बढ़िया और संतुलित रिपोर्टिंग। FN News पर भरोसा बना रहता है।
- ससपना ठाकुर4 घंटे पहले
ग्वालियर-चंबल की खबरें इतनी डिटेल में और कहीं नहीं मिलतीं। शुक्रिया!
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