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आयकर चोरी के मामलों में प्रोबेशन एक्ट का लाभ नहीं, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने निचली अदालत का फैसला पलटा

Allahabad High Court Income Tax Act Section 292A order cancelled. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आयकर अधिनियम की धारा 277 के एक मामले में निचली अदालत के फैसले को पलटते हुए महत्वपूर्ण टिप्पणी की है कि आयकर अपराधों में प्रोबेशन ऑफ ऑफेंडर्स एक्ट का लाभ नहीं दिया जा सकता। मिर्जापुर के आयकर अधिकारी ने कमरुद्दीन अंसारी और अजीमुल्लाह अंसारी के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी।

मोहम्मद फ़ैज़ान

मोहम्मद फ़ैज़ान

संपादक

5 जुलाई 20262 मिनट पढ़ें 1.1K
आयकर चोरी के मामलों में प्रोबेशन एक्ट का लाभ नहीं, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने निचली अदालत का फैसला पलटा
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आयकर चोरी से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि आयकर अधिनियम के तहत दोषी पाए गए व्यक्तियों को 'प्रोबेशन ऑफ ऑफेंडर्स एक्ट' का लाभ नहीं दिया जा सकता। कोर्ट ने निचली अदालत के उस आदेश को खारिज कर दिया, जिसमें आरोपी को प्रोबेशन के आधार पर रिहाई दी गई थी।

क्या था पूरा मामला?

यह मामला मिर्जापुर के एक आयकर अधिकारी द्वारा कमरुद्दीन अंसारी और अजीमुल्लाह अंसारी के खिलाफ दर्ज कराई गई शिकायत से संबंधित है। ये दोनों भदोही स्थित फर्म 'मेसर्स मोहम्मद इब्राहिम अजीमुल्लाह' के साझेदार थे। आरोप था कि आकलन वर्ष 1968-69 के दौरान फर्म ने अपनी आय में से 1,15,470 रुपये की राशि छिपाई थी। सुनवाई के दौरान अजीमुल्लाह अंसारी का निधन हो गया, जिसके बाद मुकदमा केवल कमरुद्दीन अंसारी के खिलाफ जारी रहा।

आरोपी ने अपना अपराध स्वीकार करते हुए दावा किया था कि उसने कर और जुर्माना जमा कर दिया है। इसके बाद, मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, मिर्जापुर ने 28 अप्रैल 1982 को कमरुद्दीन अंसारी को दोषी तो माना, लेकिन मामले की पुरानी प्रकृति और आरोपी की व्यक्तिगत परिस्थितियों का हवाला देते हुए उसे प्रोबेशन ऑफ ऑफेंडर्स एक्ट के तहत रिहा करने का आदेश दिया था।

हाईकोर्ट की कानूनी टिप्पणी और धारा 292ए

निचली अदालत के इस आदेश के खिलाफ आयकर विभाग ने हाईकोर्ट में अपील की। अपीलकर्ता के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि आयकर अधिनियम की धारा 292ए में स्पष्ट प्रावधान है कि इस अधिनियम के तहत दोषी पाए गए किसी भी व्यक्ति पर प्रोबेशन ऑफ ऑफेंडर्स एक्ट या सीआरपीसी की धारा 360 लागू नहीं होती, बशर्ते वह व्यक्ति 18 वर्ष से कम आयु का न हो।

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के 'यूनियन ऑफ इंडिया बनाम ममता सेठी' और पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट के 'कमिश्नर ऑफ इनकम टैक्स बनाम ओंकार नाथ' जैसे महत्वपूर्ण न्यायिक दृष्टांतों का हवाला दिया गया। इन फैसलों में भी यही स्थापित किया गया था कि आर्थिक अपराधों, विशेषकर आयकर चोरी के मामलों में प्रोबेशन का लाभ देना कानून की मंशा के विपरीत है।

निचली अदालत को नए सिरे से आदेश देने के निर्देश

मामले की सुनवाई कर रहे न्यायमूर्ति तेज प्रताप तिवारी ने पाया कि निचली अदालत ने धारा 292ए के स्पष्ट प्रतिबंधात्मक प्रावधानों की अनदेखी की थी। कोर्ट ने निचली अदालत के 1982 के आदेश को रद्द करते हुए अपील को स्वीकार कर लिया। हाईकोर्ट ने संबंधित अदालत को निर्देश दिया है कि वह दोनों पक्षों को सुनने के बाद केवल सजा के बिंदु पर नए सिरे से कानूनी आदेश पारित करे।

इस फैसले को आयकर कानूनों के सख्ती से पालन के दृष्टिकोण से काफी अहम माना जा रहा है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय उन मामलों में नजीर बनेगा जहां आर्थिक अपराधों में आरोपी प्रोबेशन का लाभ मांगते हैं। कोर्ट का यह रुख स्पष्ट करता है कि कर चोरी जैसे गंभीर मामलों में कानून के प्रावधानों का कड़ाई से पालन अनिवार्य है।

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टिप्पणियाँ (2)

  • अमित कुमार2 घंटे पहले

    बहुत बढ़िया और संतुलित रिपोर्टिंग। FN News पर भरोसा बना रहता है।

  • सपना ठाकुर4 घंटे पहले

    ग्वालियर-चंबल की खबरें इतनी डिटेल में और कहीं नहीं मिलतीं। शुक्रिया!

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