रामगढ़ विषधारी में लौटा बाघों का गौरव: चार दशक बाद फिर गूंजी दहाड़, 8 बाघों का बना आशियाना
राजस्थान के चौथे और देश के 52वें टाइगर रिजर्व रामगढ़ विषधारी में चार दशक बाद बाघों की दहाड़ फिर से सुनाई दे रही है। करीब 1501.89 वर्ग किलोमीटर में फैला यह वन क्षेत्र बाघों की आवाजाही के लिए एक सुरक्षित मार्ग प्रदान करता है।

मोहम्मद फ़ैज़ान
संपादक

राजस्थान के बूंदी जिले में स्थित रामगढ़ विषधारी टाइगर रिजर्व में एक बार फिर बाघों की दहाड़ सुनाई दे रही है। चार दशक के लंबे अंतराल के बाद, यह क्षेत्र एक बार फिर बाघों के लिए सुरक्षित और पसंदीदा ठिकाना बनकर उभरा है। कभी बाघों की घटती संख्या के कारण वीरान हो चुके इस जंगल में अब आठ बाघों का बसेरा है, जो राज्य के वन्यजीव संरक्षण प्रयासों की एक बड़ी सफलता मानी जा रही है।
रणथंभौर और मुकुंदरा के बीच महत्वपूर्ण गलियारा
रामगढ़ विषधारी टाइगर रिजर्व की भौगोलिक स्थिति इसे बेहद खास बनाती है। करीब 1501.89 वर्ग किलोमीटर में फैला यह वन क्षेत्र रणथंभौर और मुकुंदरा हिल्स टाइगर रिजर्व के बीच एक महत्वपूर्ण कॉरिडोर के रूप में कार्य करता है। वन विभाग के अधिकारियों का कहना है कि यह गलियारा बाघों की आवाजाही के लिए एक सुरक्षित मार्ग प्रदान करता है। हाल ही में रणथंभौर से मुकुंदरा तक एक बाघ की सफल यात्रा ने इस क्षेत्र की रणनीतिक अहमियत को सिद्ध कर दिया है।
वर्ष 2022 में आधिकारिक रूप से टाइगर रिजर्व का दर्जा मिलने के बाद से यहां संरक्षण की गतिविधियों में तेजी आई है। मानव हस्तक्षेप को नियंत्रित करने, शिकार पर पूरी तरह रोक लगाने और बाघों के प्राकृतिक आवास को विकसित करने के प्रयासों का सकारात्मक परिणाम सामने आया है। इन प्रयासों के चलते जंगल का पारिस्थितिकी तंत्र फिर से जीवंत हो उठा है।
आठ बाघों का कुनबा और बढ़ता दायरा
वर्तमान आंकड़ों के अनुसार, रामगढ़ विषधारी में कुल आठ बाघ मौजूद हैं, जिनमें पांच मादा और तीन नर शामिल हैं। हाल ही में एक युवा बाघ को जंगल में छोड़े जाने की प्रक्रिया को विशेषज्ञों ने री-वाइल्डिंग की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताया है। इसके अलावा, बाघिन आरवीटी-3 के साथ शावक की मौजूदगी यह संकेत देती है कि यह क्षेत्र बाघों के प्रजनन और उनके वंश वृद्धि के लिए पूरी तरह अनुकूल है।
बूंदी का बाघों से नाता काफी पुराना रहा है। ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार, 1941 तक इस जिले में 75 बाघ मौजूद थे। 1980 के दशक तक भी यहां बाघों की संख्या दो दर्जन से अधिक थी। हालांकि, 1982 में वन्यजीव अभयारण्य घोषित होने के बावजूद संरक्षण के अभाव में बाघों की संख्या में भारी गिरावट आई और वे यहां से लुप्त हो गए थे। अब चार दशक बाद फिर से बाघों की वापसी ने स्थानीय लोगों और पर्यावरणविदों में नई उम्मीद जगाई है।
इको-टूरिज्म और रोजगार की नई संभावनाएं
क्षेत्रीय वन संरक्षक अरुण कुमार डी के अनुसार, रामगढ़ विषधारी अपनी जैव विविधता के मामले में प्रदेश के अन्य रिजर्व से काफी समृद्ध है। वर्तमान में हैबिटेट को और अधिक विकसित करने पर ध्यान दिया जा रहा है ताकि पर्यटकों को बाघों की बेहतर साइटिंग मिल सके। इको-टूरिज्म को बढ़ावा देने से न केवल पर्यटन बढ़ेगा, बल्कि स्थानीय स्तर पर रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे।
कोर-बफर समिति के सदस्य पृथ्वी सिंह राजावत का मानना है कि आने वाले समय में यह टाइगर रिजर्व क्षेत्र के युवाओं के लिए आर्थिक उन्नति का जरिया बनेगा। जैसे-जैसे बाघों की संख्या बढ़ेगी और पर्यटकों का आगमन होगा, वैसे-वैसे स्थानीय अर्थव्यवस्था में भी सुधार की प्रबल संभावनाएं हैं। रामगढ़ विषधारी अब केवल एक जंगल नहीं, बल्कि राजस्थान के वन्यजीव मानचित्र पर एक प्रमुख केंद्र के रूप में स्थापित हो रहा है।

संपादक
मोहम्मद फ़ैज़ान
टिप्पणियाँ (2)
- अअमित कुमार2 घंटे पहले
बहुत बढ़िया और संतुलित रिपोर्टिंग। FN News पर भरोसा बना रहता है।
- ससपना ठाकुर4 घंटे पहले
ग्वालियर-चंबल की खबरें इतनी डिटेल में और कहीं नहीं मिलतीं। शुक्रिया!