बेटी को शिक्षित करने से पहले बुजुर्गों की सोच बदलना जरूरी: नीना गुप्ता
Neena Gupta speaks on women status and girl child education in Jaipur event. बॉलीवुड की वरिष्ठ अभिनेत्री नीना गुप्ता ने कहा कि समाज में महिलाओं की स्थिति को लेकर जितनी बातें की जाती हैं, असलियत उससे कहीं अलग है। उन्होंने कहा कि बेटी पढ़ाओ, बेटी बचाओ का नारा देने से पहले दादा-दादी और नाना-नानी को पढ़ाओ वाला काम करना होगा, तभी बेटी सच में बचेगी।

मोहम्मद फ़ैज़ान
संपादक

बुजुर्गों की मानसिकता में बदलाव की आवश्यकता
हाल ही में जयपुर में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान बॉलीवुड की वरिष्ठ अभिनेत्री नीना गुप्ता ने महिला शिक्षा और समाज की स्थिति पर गंभीर टिप्पणी की। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि केवल 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' का नारा लगाने से बदलाव नहीं आएगा। अभिनेत्री के अनुसार, जब तक घर के बुजुर्गों, यानी दादा-दादी और नाना-नानी की सोच नहीं बदलेगी, तब तक बेटियों को समाज में वास्तविक सम्मान और स्वतंत्रता मिलना कठिन है।
नीना गुप्ता ने होटल ललित में आयोजित 'डायलॉग ऑन मेंटल वेलनेस' सत्र में हिस्सा लिया। उन्होंने अपने जीवन के अनुभवों, आत्मकथा लेखन की चुनौतियों और मानसिक स्वास्थ्य जैसे विषयों पर खुलकर चर्चा की। उन्होंने कहा कि शहरों में भले ही कुछ बदलाव दिख रहे हों, लेकिन छोटे कस्बों और गांवों में आज भी घूंघट प्रथा और महिलाओं के प्रति पुरानी सोच बरकरार है।
आत्मकथा और व्यक्तिगत संघर्ष की कहानी
अपनी आत्मकथा 'सच कहूं तो' के बारे में बात करते हुए नीना ने बताया कि इसे लिखने का विचार उन्हें 25 साल पहले आया था। उस समय काम न होने के कारण लोग उनके बारे में कुछ भी लिख देते थे, जिससे उन्हें अपनी सच्चाई खुद सामने लाने की प्रेरणा मिली। हालांकि, परिवार के प्रति सम्मान और डर के कारण वह लंबे समय तक इसे पूरा नहीं कर सकीं। कोविड-19 के दौरान जब वह अपने पहाड़ी घर में एकांत में थीं, तब उन्होंने बिना किसी डर के अपनी कहानी पूरी की।
अभिनेत्री ने स्वीकार किया कि उन्होंने अपनी किताब में सब कुछ नहीं लिखा है। उन्होंने कहा कि वह किसी से बदला नहीं लेना चाहती थीं और न ही अपनी बेटी मसाबा या अन्य प्रियजनों की भावनाओं को ठेस पहुंचाना चाहती थीं। उन्होंने हंसते हुए यह भी साझा किया कि कानूनी सलाह के कारण उन्हें कई लोगों के नाम बदलने पड़े थे।
ग्रामीण भारत की जमीनी हकीकत
अपनी वेबसीरीज 'पंचायत' की शूटिंग के दौरान मध्य प्रदेश के एक गांव के अनुभव को साझा करते हुए नीना ने बताया कि वहां की एक मां ने उनसे कहा था कि उनकी बेटी पढ़ तो रही है, लेकिन 18 साल की होते ही उसकी शादी कर दी जाएगी। उन्होंने कहा कि आज भी कई घरों में बेटी को पढ़ाने का उद्देश्य केवल उसे घर संभालने और बच्चे पैदा करने के लिए तैयार करना है। जब तक बुजुर्गों की यह सोच नहीं बदलेगी, शिक्षित होने के बाद भी बेटियों को घरेलू बंधनों में ही रहना पड़ेगा।
मानसिक स्वास्थ्य पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि वह अपनी परेशानियों को भगवान के सामने रखती हैं। उन्होंने युवाओं को सलाह दी कि वे अपने माता-पिता के व्यवहार से ही सीखते हैं, इसलिए बच्चों पर चिल्लाने के बजाय उनसे प्यार से बात करना जरूरी है। उन्होंने माना कि करियर के दौरान उनका ध्यान रिश्तों की तलाश में भटक गया था, जो उनकी एक बड़ी गलती थी।
युवा पीढ़ी का भ्रम और जीवन का अनुभव
आज की युवा पीढ़ी के बारे में नीना ने कहा कि वे काफी भ्रमित हैं। एक तरफ आधुनिक सोच है और दूसरी तरफ घर के पुराने विचार, जिसके बीच वे संतुलन नहीं बना पा रहे हैं। उन्होंने अंत में कहा कि जीवन में ठोकरें खाना जरूरी है, क्योंकि बिना गिरे कोई भी आगे नहीं बढ़ सकता। हर किसी को अपने अनुभवों से ही सीखना पड़ता है।
नीना गुप्ता का यह संदेश समाज के उस वर्ग के लिए एक आईना है जो दिखावे के लिए तो शिक्षा का समर्थन करता है, लेकिन घर की चारदीवारी के भीतर आज भी पुरानी रूढ़ियों को ढो रहा है। उनका मानना है कि वास्तविक परिवर्तन तभी आएगा जब शिक्षा का प्रभाव परिवार की सबसे पुरानी पीढ़ी तक पहुंचेगा।

संपादक
मोहम्मद फ़ैज़ान
टिप्पणियाँ (2)
- अअमित कुमार2 घंटे पहले
बहुत बढ़िया और संतुलित रिपोर्टिंग। FN News पर भरोसा बना रहता है।
- ससपना ठाकुर4 घंटे पहले
ग्वालियर-चंबल की खबरें इतनी डिटेल में और कहीं नहीं मिलतीं। शुक्रिया!
