मध्य प्रदेश में 9 साल बाद छात्रसंघ चुनाव की तैयारी: हाईकोर्ट के आदेश के बाद क्या बदलेगी कैंपस की राजनीति?
Madhya Pradesh Student Union Election Update: कोर्ट के 3 अगस्त 2026 के आदेश में खुद दर्ज है कि याचिका में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुपालन में शैक्षणिक सत्र 2024-25 के लिए हर कॉलेज-यूनिवर्सिटी में छात्र संगठन (Student Body) के चुनाव कराने की मांग थी।

मोहम्मद फ़ैज़ान
संपादक

नौ साल का लंबा इंतजार और हाईकोर्ट का दखल
मध्य प्रदेश के विश्वविद्यालयों में पिछले नौ वर्षों से छात्रसंघ चुनाव ठप पड़े हैं, लेकिन छात्रों से हर साल छात्रसंघ शुल्क की वसूली लगातार जारी रही। अब मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने इस मामले में कड़ा रुख अपनाते हुए राज्य के 15 सरकारी विश्वविद्यालयों में सितंबर 2026 तक चुनाव कराने के निर्देश दिए हैं। यह फैसला भोपाल और इंदौर के छात्रों द्वारा दायर जनहित याचिकाओं के बाद आया है, जिसमें शैक्षणिक सत्रों के बीत जाने के बावजूद चुनाव न कराए जाने पर सवाल उठाए गए थे।
अदालत ने राज्य सरकार द्वारा प्रस्तुत शैक्षणिक कैलेंडर को रिकॉर्ड पर लेते हुए स्पष्ट किया है कि सितंबर 2026 तक चुनाव प्रक्रिया पूरी की जानी चाहिए। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया है कि सुरक्षा व्यवस्था के लिए संबंधित कॉलेज के प्राचार्य या विश्वविद्यालय के कुलपति स्थानीय प्रशासन से पुलिस बल की मांग कर सकते हैं। इस आदेश के बाद अब प्रदेश भर के कैंपस में चुनावी सरगर्मियां तेज हो गई हैं।
सभरवाल कांड और छात्र राजनीति का बदलता स्वरूप
मध्य प्रदेश में छात्रसंघ चुनावों का इतिहास 2006 के सभरवाल कांड से गहराई से जुड़ा है। उज्जैन के माधव कॉलेज में प्रोफेसर एच.एस. सभरवाल की हत्या के बाद देशभर में छात्र राजनीति में हिंसा और बाहुबल को लेकर चिंताएं बढ़ गई थीं। इसके बाद लिंगदोह समिति की सिफारिशों के आधार पर चुनावों में बदलाव किए गए। प्रत्यक्ष चुनाव की जगह कई जगहों पर अप्रत्यक्ष (CR आधारित) प्रणाली लागू की गई, ताकि कैंपस में शांति बनी रहे।
वर्ष 2017 के बाद से प्रदेश में चुनाव पूरी तरह बंद हो गए। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2018 के विधानसभा चुनाव से पहले सरकार किसी भी नए राजनीतिक समीकरण का जोखिम नहीं लेना चाहती थी। इसके बाद कोविड और प्रशासनिक कारणों का हवाला देकर चुनावों को लगातार टाला जाता रहा। दिलचस्प यह है कि प्रदेश के शीर्ष नेतृत्व में रहे कई नेता खुद छात्र राजनीति से निकले हैं, फिर भी लंबे समय तक चुनाव नहीं हो सके।
शुल्क का हिसाब और चुनाव का मॉडल
चुनाव न होने के बावजूद छात्रों से वसूले गए करोड़ों रुपये के शुल्क का मुद्दा भी गंभीर है। आरटीआई से मिली जानकारी के अनुसार, केवल एक विश्वविद्यालय में साढ़े चार वर्षों में आठ करोड़ रुपये से अधिक की राशि छात्रसंघ शुल्क के रूप में जमा की गई, लेकिन इसका कोई स्पष्ट खर्च ब्यौरा सार्वजनिक नहीं है। अब छात्र संगठन इस बात पर जोर दे रहे हैं कि इस फंड का उपयोग छात्रों के कल्याण में होना चाहिए।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि चुनाव किस मॉडल पर होंगे। एबीवीपी और एनएसयूआई जैसे प्रमुख छात्र संगठन प्रत्यक्ष चुनाव की मांग कर रहे हैं, ताकि छात्रों को लोकतांत्रिक प्रक्रिया का सीधा अनुभव मिल सके। वहीं, उच्च शिक्षा विभाग अभी किसी भी मॉडल पर अंतिम निर्णय लेने से बच रहा है और विशेषज्ञों की टीम के माध्यम से कानूनी पहलुओं का अध्ययन कर रहा है।
भविष्य की चुनौतियां और राजनीतिक प्रभाव
चुनाव कराना प्रशासन के लिए एक बड़ी चुनौती साबित होगा, क्योंकि कई कॉलेजों में बुनियादी ढांचे और स्टाफ की कमी है। इसके अलावा, निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करना भी एक बड़ी जिम्मेदारी होगी। विश्लेषकों के अनुसार, इन चुनावों से निकलने वाली नई लीडरशिप राज्य की मुख्यधारा की राजनीति को प्रभावित कर सकती है। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या ये चुनाव नई पीढ़ी के लिए राजनीति के द्वार खोलते हैं या फिर पारंपरिक संगठनों का वर्चस्व ही बना रहता है।
आने वाले समय में यह स्पष्ट हो जाएगा कि सरकार किस प्रकार की नीति अपनाती है। सितंबर 2026 तक होने वाले ये चुनाव न केवल कैंपस की राजनीति को पुनर्जीवित करेंगे, बल्कि यह भी तय करेंगे कि मध्य प्रदेश में छात्र नेतृत्व का भविष्य किस दिशा में आगे बढ़ता है।

संपादक
मोहम्मद फ़ैज़ान
टिप्पणियाँ (2)
- अअमित कुमार2 घंटे पहले
बहुत बढ़िया और संतुलित रिपोर्टिंग। FN News पर भरोसा बना रहता है।
- ससपना ठाकुर4 घंटे पहले
ग्वालियर-चंबल की खबरें इतनी डिटेल में और कहीं नहीं मिलतीं। शुक्रिया!
