लखनऊ: बंदरों के हमले से बचने की कोशिश में छत से गिरे ई-रिक्शा चालक की मौत
Lucknow Husainganj accident: Man falls 5th floor trying to escape monkeys. हुसैनगंज के फूलबाग निवासी जीतू सोनकर (40) ई-रिक्शा चलाकर परिवार का पालन-पोषण करते थे। शनिवार सुबह वह रोज की तरह नींद से उठकर घर की छत पर टहलने गए थे।

मोहम्मद फ़ैज़ान
संपादक

लखनऊ के हुसैनगंज इलाके में शनिवार की सुबह एक दर्दनाक हादसा सामने आया। फूलबाग निवासी 40 वर्षीय ई-रिक्शा चालक जीतू सोनकर की पांचवीं मंजिल से गिरने के कारण मौत हो गई। बताया जा रहा है कि जीतू अपनी छत पर टहल रहे थे, तभी बंदरों के एक झुंड ने उन्हें घेर लिया। बंदरों से बचने की हड़बड़ाहट में उनका संतुलन बिगड़ गया और वे सीधे नीचे जा गिरे।
घटना के तुरंत बाद स्थानीय लोग और परिजन मौके पर पहुंचे और गंभीर रूप से घायल जीतू को बलरामपुर अस्पताल ले गए। हालांकि, अस्पताल में डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। इस घटना ने पूरे इलाके में शोक की लहर पैदा कर दी है, वहीं स्थानीय निवासियों में प्रशासन के प्रति गहरा आक्रोश है।
प्रशासन की लापरवाही पर परिजनों का गुस्सा
मृतक के भाई रवि सोनकर ने आरोप लगाया कि हुसैनगंज क्षेत्र में बंदरों का आतंक लंबे समय से बना हुआ है। उन्होंने कहा कि बंदरों द्वारा लोगों पर हमले की घटनाएं आम हो गई हैं, लेकिन नगर निगम और वन विभाग ने अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं की है। परिजनों का मानना है कि यदि समय रहते बंदरों को पकड़ने या उनके नियंत्रण के लिए उचित कदम उठाए गए होते, तो आज जीतू उनके बीच जीवित होते।
कैसरबाग पुलिस ने अस्पताल पहुंचकर शव को कब्जे में ले लिया है और पोस्टमार्टम की प्रक्रिया शुरू कर दी है। पुलिस मामले की जांच कर रही है ताकि घटना के सटीक कारणों का पता लगाया जा सके। फिलहाल, इस दुखद घटना ने शहर में बंदरों के बढ़ते खतरे को लेकर एक बार फिर बहस छेड़ दी है।
शहर के कई इलाकों में बंदरों का खौफ
लखनऊ के पुराने और नए दोनों ही हिस्सों में बंदरों की बढ़ती संख्या लोगों के लिए मुसीबत का सबब बनी हुई है। हुसैनगंज, कैसरबाग, अमीनाबाद, गोमतीनगर, इंदिरानगर और अलीगंज जैसे घनी आबादी वाले क्षेत्रों में लोग रोजाना बंदरों के डर के साये में जी रहे हैं। छतों पर कपड़े सुखाना या बच्चों का बाहर खेलना भी अब जोखिम भरा हो गया है।
प्रशासन से कोई समाधान न मिलने के कारण, निवासियों ने अब खुद ही सुरक्षा के इंतजाम करने शुरू कर दिए हैं। कई घरों की बालकनियों और छतों पर लोहे की जालियां लगवाई गई हैं। खिड़कियों पर मजबूत ग्रिल और नेट का उपयोग किया जा रहा है। कुछ लोग बंदरों को डराने के लिए नकली लंगूर के पुतले और कांटेदार प्लास्टिक स्ट्रिप्स का सहारा ले रहे हैं।
पहले भी हो चुके हैं कई हादसे
यह पहली बार नहीं है जब बंदरों के कारण किसी ने अपनी जान गंवाई है। इससे पहले भी शहर में बंदरों के हमलों से बचने के दौरान लोगों के छत से गिरने, सीढ़ियों से फिसलने या सड़क दुर्घटनाओं का शिकार होने की खबरें आती रही हैं। चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार, बंदरों के काटने और नोचने के मामलों में भी हर साल बड़ी संख्या में लोग इलाज के लिए अस्पतालों का रुख करते हैं।
स्थानीय निवासियों की मांग है कि प्रशासन को इस समस्या को गंभीरता से लेना चाहिए और बंदरों को पकड़कर सुरक्षित स्थानों पर स्थानांतरित करने की व्यवस्था करनी चाहिए। जब तक कोई ठोस नीति नहीं अपनाई जाती, तब तक आम नागरिकों के लिए यह खतरा बना रहेगा।

संपादक
मोहम्मद फ़ैज़ान
टिप्पणियाँ (2)
- अअमित कुमार2 घंटे पहले
बहुत बढ़िया और संतुलित रिपोर्टिंग। FN News पर भरोसा बना रहता है।
- ससपना ठाकुर4 घंटे पहले
ग्वालियर-चंबल की खबरें इतनी डिटेल में और कहीं नहीं मिलतीं। शुक्रिया!
