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करनाल धान घोटाला: जीपीएस डेटा से हुआ फर्जी उठान का खुलासा, 20 करोड़ का भुगतान अटका

Karnal Mandi Dhan Uthan scam 20 crore payment stopped. GPS system zeroes on zero km vehicles. करनाल जिले की मंडियों में धान उठान को लेकर बड़ा खुलासा सामने आया है। इलेक्ट्रॉनिक सबूतों में यह सामने आया कि जिन गाड़ियों से धान उठाने का दावा किया गया, वे जीपीएस सिस्टम में ‘शून्य किलोमीटर’ चली दिखीं।

मोहम्मद फ़ैज़ान

मोहम्मद फ़ैज़ान

संपादक

6 जुलाई 20263 मिनट पढ़ें 679
करनाल धान घोटाला: जीपीएस डेटा से हुआ फर्जी उठान का खुलासा, 20 करोड़ का भुगतान अटका
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जीपीएस रिकॉर्ड ने खोली फर्जीवाड़े की पोल

करनाल जिले की मंडियों में धान उठान के नाम पर एक बड़े घोटाले का पर्दाफाश हुआ है। जांच के दौरान सामने आए इलेक्ट्रॉनिक सबूतों ने सिस्टम की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जीपीएस डेटा की पड़ताल में पाया गया कि जिन वाहनों के जरिए धान को मंडियों से मिलों तक पहुंचाने का दावा किया गया था, उनमें से कई वाहन जीपीएस सिस्टम में 'शून्य किलोमीटर' चलते हुए दिखाई दिए। इसका सीधा अर्थ यह है कि कागजों में धान का उठान तो दिखाया गया, लेकिन असल में गाड़ियां चली ही नहीं।

इस खुलासे के बाद विभाग ने सख्त रुख अपनाते हुए करीब 35 प्रतिशत गाड़ियों का भुगतान रोक दिया है। कुल 20 करोड़ रुपये की राशि फिलहाल होल्ड पर है। जब उच्च अधिकारियों के समक्ष यह डेटा पेश किया गया, तो यह स्पष्ट हो गया कि लाखों क्विंटल धान के परिवहन का जो दावा किया गया था, वह पूरी तरह से फर्जी था। अब जांच एजेंसियां इस बात की पड़ताल कर रही हैं कि यदि गाड़ियां चली ही नहीं, तो मंडियों से धान आखिर गया कहां और उसे कैसे ठिकाने लगाया गया।

ट्रांसपोर्टरों का तर्क और एसआईटी की जांच

मामले की आंच तेज होने पर ट्रांसपोर्ट ठेकेदारों ने विभाग के सामने अपनी सफाई पेश की है। उन्होंने तकनीकी खामियों का हवाला देते हुए दावा किया कि जीपीएस में लोकेशन शून्य दिखने का कारण कोई तकनीकी त्रुटि हो सकती है। हालांकि, सूत्रों का कहना है कि कई ठेकेदारों ने बिना चली गाड़ियों के भुगतान का दावा वापस लेना शुरू कर दिया है, जिससे उनकी मिलीभगत का संदेह और गहरा गया है। प्रशासन द्वारा गठित एसआईटी अब आउटर गेट पास की गहन जांच कर रही है ताकि इस फर्जीवाड़े की पूरी परतें खुल सकें।

पुलिस ने इस पूरे मामले में अब तक छह अलग-अलग एफआईआर दर्ज की हैं। जांच के दौरान यह भी सामने आया है कि मंडी अधिकारियों की मिलीभगत से फर्जी गेट पास जारी किए गए थे। इन फर्जी दस्तावेजों के जरिए एमएसपी पर धान खरीद का दिखावा किया गया, जबकि असल में बड़े स्तर पर सरकारी खजाने को चूना लगाया गया। धान सीजन खत्म होने के आठ महीने बाद भी जांच का दायरा लगातार बढ़ रहा है।

45 अधिकारियों पर कार्रवाई और भविष्य की राह

सरकार ने इस घोटाले को लेकर अब तक 45 अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई की है। इनमें खरीद एजेंसियों के छोटे-बड़े कर्मचारियों से लेकर मंडी सचिव स्तर के अधिकारी तक शामिल हैं, जिन्हें जेल भेजा जा चुका है। बावजूद इसके, ट्रांसपोर्टरों की भूमिका पर अभी भी कई सवाल अनुत्तरित हैं। विभाग ने अभी तक फर्जी उठान के सटीक आंकड़े सार्वजनिक नहीं किए हैं, जिससे पारदर्शिता पर सवाल उठ रहे हैं।

डीएफएससी मुकेश ने पुष्टि की है कि ट्रांसपोर्टरों की दलीलों और पूरे मामले की विस्तृत रिपोर्ट सरकार को भेज दी गई है। अब अंतिम निर्णय उच्च स्तर पर लिया जाना है। मंडियों में धान उठान की इस गड़बड़ी ने न केवल सरकारी तंत्र की विश्वसनीयता को चोट पहुंचाई है, बल्कि यह भी स्पष्ट कर दिया है कि इस घोटाले की जड़ें काफी गहरी हैं। अब सबकी निगाहें सरकार के अगले कदम और एसआईटी की अंतिम रिपोर्ट पर टिकी हैं।

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टिप्पणियाँ (2)

  • अमित कुमार2 घंटे पहले

    बहुत बढ़िया और संतुलित रिपोर्टिंग। FN News पर भरोसा बना रहता है।

  • सपना ठाकुर4 घंटे पहले

    ग्वालियर-चंबल की खबरें इतनी डिटेल में और कहीं नहीं मिलतीं। शुक्रिया!

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