जबलपुर: बायोमेट्रिक तकनीक से मिली घायल मजदूर की पहचान, 13 साल पुराने रिकॉर्ड ने बचाई जान
Jabalpur hospital uses biometric technology to identify injured laborer and resume critical medical treatment. जबलपुर में डिजिटल रिकॉर्ड और बायोमेट्रिक तकनीक ने एक गंभीर रूप से घायल मजदूर के लिए जीवनदायिनी भूमिका निभाई। सिहोरा निवासी अजय मेहरा पिछले 15 दिनों से कटंगी बायपास के एक निजी अस्पताल में भर्ती थे।

मोहम्मद फ़ैज़ान
संपादक

जबलपुर में डिजिटल तकनीक और मानवीय संवेदना का एक अनूठा उदाहरण देखने को मिला है। एक गंभीर रूप से घायल मजदूर की पहचान सुनिश्चित करने के लिए प्रशासन ने बायोमेट्रिक डेटा का सहारा लिया, जिससे न केवल उसकी पहचान उजागर हुई बल्कि उसके रुके हुए इलाज को भी फिर से शुरू किया जा सका। यह मामला सिहोरा निवासी अजय मेहरा से जुड़ा है, जो पिछले 15 दिनों से एक निजी अस्पताल में जिंदगी और मौत के बीच जूझ रहे थे।
दुर्घटना के बाद पहचान का संकट
अजय मेहरा एक ऑटो दुर्घटना में बुरी तरह घायल हो गए थे, जिसके बाद उन्हें कटंगी बायपास स्थित एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया। इलाज के दौरान मरीज की पहचान और आधार कार्ड की आवश्यकता पड़ी, लेकिन अजय अपनी स्थिति के कारण कोई भी विवरण देने में असमर्थ थे। उनके पास कोई भी पहचान पत्र मौजूद नहीं था, जिससे अस्पताल प्रशासन के लिए इलाज की प्रक्रिया को आगे बढ़ाना मुश्किल हो गया था। पहचान के अभाव में उनका उपचार प्रभावित हो रहा था।
स्थिति की गंभीरता को समझते हुए, शनिवार की शाम को अजय के पड़ोसी उन्हें एम्बुलेंस के जरिए सीधे कलेक्टर कार्यालय ले गए। उस समय दफ्तर बंद होने की प्रक्रिया में था, लेकिन मरीज की नाजुक हालत को देखते हुए प्रशासन ने इसे प्राथमिकता दी। आधार केंद्र की टीमों ने छुट्टी के दिन भी काम पर लौटने का निर्णय लिया और इसे एक मिशन के रूप में स्वीकार किया।
13 साल पुराने डेटाबेस से मिली सफलता
प्रशासनिक टीम के सामने सबसे बड़ी चुनौती 13 साल पुराने डिजिटल रिकॉर्ड को खंगालने की थी। डीजीसीएम चित्रांशु त्रिपाठी के अनुसार, अजय का आधार कार्ड वर्ष 2013 में बना था, लेकिन मरीज को अपना कोई भी विवरण याद नहीं था। टीम ने सिहोरा क्षेत्र के विभिन्न पिन कोड, संभावित पते और जन्म तिथियों के आधार पर सर्च ऑपरेशन शुरू किया। उंगलियों के निशान और आंखों की पुतली के बायोमेट्रिक मिलान के जरिए यह प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई।
करीब दो घंटे की कड़ी मशक्कत के बाद, शाम 6 बजे के आसपास सिस्टम ने डेटा को मैच कर लिया। वर्ष 1983 के जन्म वर्ष और बायोमेट्रिक डेटा के मिलान के साथ ही अजय का पुराना रिकॉर्ड सामने आ गया। इस त्वरित कार्रवाई के बाद नया कार्ड जारी किया गया, जिससे अस्पताल में उनके इलाज का रास्ता साफ हो गया।
तकनीक का सार्थक उपयोग
यह घटना इस बात का प्रमाण है कि कैसे डिजिटल गवर्नेंस और बायोमेट्रिक डेटाबेस आम आदमी के लिए जीवनरक्षक साबित हो सकते हैं। यदि समय रहते यह रिकॉर्ड नहीं मिलता, तो मजदूर का इलाज अधर में लटक सकता था। प्रशासन की तत्परता और तकनीक के सही तालमेल ने एक गरीब मजदूर को नई उम्मीद दी है।
वर्तमान में अजय मेहरा का इलाज अस्पताल में जारी है। प्रशासन और आधार केंद्र की इस पहल की स्थानीय स्तर पर सराहना की जा रही है। यह मामला दर्शाता है कि कैसे सरकारी डेटाबेस का उपयोग केवल प्रशासनिक कार्यों तक सीमित न रहकर आपातकालीन स्थितियों में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

संपादक
मोहम्मद फ़ैज़ान
टिप्पणियाँ (2)
- अअमित कुमार2 घंटे पहले
बहुत बढ़िया और संतुलित रिपोर्टिंग। FN News पर भरोसा बना रहता है।
- ससपना ठाकुर4 घंटे पहले
ग्वालियर-चंबल की खबरें इतनी डिटेल में और कहीं नहीं मिलतीं। शुक्रिया!
