नकली नोटों का बड़ा सिंडिकेट: इंडस्ट्री की तरह चल रहा था जाली नोट छापने का काम, गांधीजी के वाटरमार्क तक की नकल
India fake currency production gang with production, marketing, supply heads. नकली नोट में गांधीजी का वाटरमार्क, सिल्वर लाइन भी : एक पेपर पर छपते 500 के तीन नोट, अलग सीरियल नंबर, इंडस्ट्री की तरह गैंग में प्रोडक्शन, मार्केटिंग और सप्लाई हेड.

मोहम्मद फ़ैज़ान
संपादक

इंडस्ट्री की तरह काम कर रहा था नकली नोटों का गिरोह
राजस्थान और दिल्ली-एनसीआर में सक्रिय एक बड़े नकली नोट गिरोह का खुलासा हुआ है, जो किसी संगठित उद्योग की तरह काम कर रहा था। इस गैंग का नेटवर्क इतना व्यवस्थित था कि इसमें प्रोडक्शन, मार्केटिंग और सप्लाई के लिए अलग-अलग सदस्य तैनात थे। जांच में सामने आया है कि आरोपी 500 रुपये के नकली नोटों को इतनी बारीकी से छापते थे कि उनमें गांधीजी का वाटरमार्क और सिल्वर लाइन तक शामिल होती थी।
गिरोह के मास्टरमाइंड विशाल ने इस काम को अंजाम देने के लिए कंप्यूटर डिजाइनिंग का सहारा लिया। उसने फरीदाबाद में एक घर को ही नोट छापने की फैक्ट्री बना रखा था, जहां 11 प्रिंटर और 3 लैपटॉप के जरिए नोट तैयार किए जाते थे। हर नोट का सीरियल नंबर अलग रखा जाता था ताकि वे असली दिखें। सिल्वर लाइन के लिए आरोपी खाने के पैकेट में इस्तेमाल होने वाली सिल्वर फॉयल का उपयोग करते थे।
दौसा से शुरू हुआ खुलासा
इस गिरोह का भंडाफोड़ दौसा में एक युवक आयुष की गिरफ्तारी से हुआ। आयुष पिछले तीन महीनों से स्थानीय बाजारों में 500 रुपये के नकली नोट चला रहा था। वह एक दुकान पर एक ही बार सामान खरीदता था ताकि किसी को शक न हो। हालांकि, जब दुकानदारों को लगातार नकली नोट मिलने लगे, तो उन्होंने पुलिस को सूचित किया। पुलिस ने निगरानी के बाद आयुष को रंगे हाथों पकड़ा, जिसके पास से 80 नकली नोट बरामद हुए।
आयुष से पूछताछ के बाद पुलिस को इस बड़े सिंडिकेट का पता चला। उसने बताया कि उसे दिल्ली से नकली नोटों की खेप मिलती थी। पुलिस ने आगे की कार्रवाई करते हुए फरीदाबाद में संतोष वाल्मीकि के ठिकाने पर छापा मारा। वहां से 23 लाख 37 हजार रुपये के नकली नोट और भारी मात्रा में प्रिंटिंग उपकरण जब्त किए गए। पुलिस के अनुसार, यदि वे दो मिनट और देरी करते, तो आरोपी 24 लाख रुपये की खेप लेकर फरार हो जाते।
मास्टरमाइंड और नेटवर्क का जाल
इस गिरोह में शामिल विशाल, गुलशन बैरवा और संतोष वाल्मीकि की भूमिकाएं बंटी हुई थीं। विशाल जहां मास्टरमाइंड था, वहीं गुलशन मार्केटिंग और नोट खपाने का काम देखता था। संतोष के घर पर नोटों की छपाई का पूरा सेटअप लगा था। जांच में यह भी पता चला कि गिरोह ने राजस्थान के अजमेर, किशनगढ़, अलवर और भरतपुर तक अपना जाल फैलाने की तैयारी कर ली थी।
गिरोह ने एक नाबालिग को राजस्थान का हेड बना रखा था, जो दिल्ली जाकर बस स्टैंड या धौलाकुआं से नकली नोटों के पैकेट लाता था। ये लोग 17 हजार रुपये के असली नोटों के बदले 40 हजार रुपये के नकली नोट देते थे। पुलिस अब इस पूरे नेटवर्क के अन्य संपर्कों की तलाश कर रही है ताकि यह पता लगाया जा सके कि इस गिरोह ने अब तक कुल कितनी राशि बाजार में उतारी है।

संपादक
मोहम्मद फ़ैज़ान
टिप्पणियाँ (2)
- अअमित कुमार2 घंटे पहले
बहुत बढ़िया और संतुलित रिपोर्टिंग। FN News पर भरोसा बना रहता है।
- ससपना ठाकुर4 घंटे पहले
ग्वालियर-चंबल की खबरें इतनी डिटेल में और कहीं नहीं मिलतीं। शुक्रिया!
