भोपाल-देवास फोरलेन टोल घोटाला: कोर्ट का बड़ा फैसला, कंपनी को लौटाने होंगे 11 करोड़

मोहम्मद फ़ैज़ान
संपादक

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने भोपाल-देवास फोरलेन पर फास्टैग के माध्यम से की गई अवैध वसूली के मामले में एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट की डिवीजन बेंच ने टोल कंपनी को आदेश दिया है कि वह वाहन मालिकों और ट्रांसपोर्टरों से वसूले गए 11 करोड़ रुपए की राशि वापस करे। इस मामले में कोर्ट ने कंपनी पर 25 हजार रुपए का जुर्माना भी लगाया है, जिसे मुख्यमंत्री राहत कोष में जमा करने का निर्देश दिया गया है।
क्या था पूरा मामला और तकनीकी खामी का तर्क
यह विवाद मेसर्स देवास-भोपाल कॉरिडोर प्राइवेट लिमिटेड द्वारा दायर एक याचिका से शुरू हुआ था। कंपनी ने मध्य प्रदेश सड़क विकास निगम (एमपीआरडीसी) के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें वर्ष 2022 में अतिरिक्त वसूली गई राशि को वापस करने के लिए कहा गया था। कंपनी का तर्क था कि फास्टैग सिस्टम में तकनीकी खराबी के कारण तीन एक्सल वाली बसों को गलती से मल्टी-एक्सल वाहनों की श्रेणी में गिना गया, जिसके चलते उनसे अधिक टोल काटा गया। कंपनी ने दावा किया कि यह एक सॉफ्टवेयर त्रुटि थी, जिसके लिए वे सीधे तौर पर जिम्मेदार नहीं हैं।
हालांकि, एक्टिंग चीफ जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस प्रदीप मित्तल की डिवीजन बेंच ने कंपनी के इस तर्क को सिरे से खारिज कर दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि तकनीक का उद्देश्य सुविधा प्रदान करना है, न कि अनुबंध की शर्तों को दरकिनार करना। यदि सॉफ्टवेयर में गलत मैपिंग हुई है, तो उसकी पूरी जिम्मेदारी टोल संचालन करने वाली कंपनी की ही बनती है।
अनुबंध की शर्तों का उल्लंघन
अदालत ने अपने अवलोकन में पाया कि मूल समझौते में कहीं भी तीन एक्सल वाली बसों को मल्टी-एक्सल ट्रक के रूप में वर्गीकृत करने का कोई प्रावधान नहीं था। बसों के लिए टोल की दरें पहले से ही निर्धारित और अलग थीं। इसके बावजूद, कंपनी ने फास्टैग सिस्टम का उपयोग करके निर्धारित दर से अधिक वसूली की। कोर्ट ने इसे अनुबंध का उल्लंघन माना और कहा कि कंपनी अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकती।
इस फैसले से उन हजारों वाहन मालिकों और ट्रांसपोर्टरों को बड़ी राहत मिली है, जिनसे पिछले कुछ वर्षों में गलत तरीके से अतिरिक्त टोल वसूला गया था। कोर्ट का यह रुख स्पष्ट करता है कि डिजिटल सिस्टम के नाम पर जनता से की जाने वाली अवैध वसूली को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा और टोल कंपनियों को अपने सिस्टम की सटीकता सुनिश्चित करनी होगी।
आगे की कार्रवाई और प्रभाव
कोर्ट के आदेश के बाद अब टोल कंपनी को 11 करोड़ रुपए की राशि वापस करने की प्रक्रिया शुरू करनी होगी। साथ ही, 25 हजार रुपए का जुर्माना मुख्यमंत्री राहत कोष में जमा करना अनिवार्य है। यह फैसला भविष्य में टोल संचालन करने वाली कंपनियों के लिए एक नजीर साबित होगा, जो अक्सर तकनीकी खामियों का बहाना बनाकर अपनी जवाबदेही से बचने की कोशिश करती हैं।
एमपीआरडीसी के आदेश को सही ठहराते हुए हाई कोर्ट ने यह सुनिश्चित किया है कि सरकारी नियमों और अनुबंधों का पालन हर हाल में हो। अब संबंधित अधिकारियों को यह सुनिश्चित करना होगा कि कंपनी जल्द से जल्द वाहन मालिकों को उनकी राशि लौटाए और भविष्य में ऐसी तकनीकी गलतियों की पुनरावृत्ति न हो।

संपादक
मोहम्मद फ़ैज़ान
टिप्पणियाँ (2)
- अअमित कुमार2 घंटे पहले
बहुत बढ़िया और संतुलित रिपोर्टिंग। FN News पर भरोसा बना रहता है।
- ससपना ठाकुर4 घंटे पहले
ग्वालियर-चंबल की खबरें इतनी डिटेल में और कहीं नहीं मिलतीं। शुक्रिया!
