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गुरुग्राम: आरटीआई का जवाब देने में नाकाम रहे तहसीलदार पर 25 हजार का जुर्माना, एआई के इस्तेमाल पर भी आयोग ने जताई नाराजगी

हरियाणा राज्य सूचना आयोग ने सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत मांगी गई जानकारी समय पर और सही तरीके से न देने के एक मामले में सख्त रुख अपनाया है। आयोग ने कड़ी फटकार लगाते हुए तत्कालीन राज्य जन सूचना अधिकारी-सह-तहसीलदार सतीश कुमार पर 25,000 रुपये का जुर्माना लगाया है।

मोहम्मद नवेद

मोहम्मद नवेद

एडिटर

2 सितंबर 20263 मिनट पढ़ें
गुरुग्राम: आरटीआई का जवाब देने में नाकाम रहे तहसीलदार पर 25 हजार का जुर्माना, एआई के इस्तेमाल पर भी आयोग ने जताई नाराजगी
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आरटीआई कानून की अनदेखी पर राज्य सूचना आयोग का कड़ा रुख

गुरुग्राम में सूचना का अधिकार (आरटीआई) अधिनियम का पालन न करने और आवेदकों को गुमराह करने के मामले में हरियाणा राज्य सूचना आयोग ने एक सख्त आदेश जारी किया है। आयोग ने तत्कालीन राज्य जन सूचना अधिकारी-सह-तहसीलदार सतीश कुमार पर 25,000 रुपये का जुर्माना लगाया है। यह कार्रवाई तब की गई जब अधिकारी ने आरटीआई के तहत मांगी गई जानकारी समय पर उपलब्ध कराने में न केवल विफलता दिखाई, बल्कि सुनवाई के दौरान भ्रामक तर्क भी पेश किए।

मामले की शुरुआत 7 नवंबर 2022 को हुई, जब कादीपुर निवासी हरिंदर धींगड़ा ने कुछ प्रशासनिक दस्तावेजों की मांग की थी। कानून के अनुसार, यह जानकारी 30 दिनों के भीतर प्रदान की जानी अनिवार्य थी, लेकिन तत्कालीन तहसीलदार ने इस समय सीमा का उल्लंघन किया। लगभग छह महीने बाद, 10 मई 2023 को एक अधूरा जवाब दिया गया, जिसमें दावा किया गया कि मांगी गई जानकारी विभाग की वेबसाइट पर पहले से ही उपलब्ध है।

चैटजीपीटी और गूगल सर्च का सहारा लेना पड़ा भारी

जून 2026 में जब यह मामला राज्य सूचना आयुक्त डॉ. अजय कुमार सूरा की अदालत में सुनवाई के लिए पहुंचा, तो विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े हो गए। आयोग ने जब प्रतिनिधि से वेबसाइट पर जानकारी दिखाने को कहा, तो वे उसे एक्सेस करने में असमर्थ रहे। स्थिति को संभालने के लिए विभाग की ओर से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस प्लेटफॉर्म 'चैटजीपीटी' और गूगल सर्च का उपयोग कर यह साबित करने की कोशिश की गई कि जानकारी सार्वजनिक डोमेन में है।

आयोग ने अपने आदेश में इस प्रयास को पूरी तरह से निरर्थक और भ्रामक करार दिया। डॉ. सूरा ने स्पष्ट किया कि एआई के माध्यम से जानकारी खोजने का यह तरीका न केवल गैर-पेशेवर था, बल्कि यह आवेदक को गुमराह करने की एक सोची-समझी कोशिश थी। आयोग ने इसे आरटीआई अधिनियम की मूल भावना के खिलाफ माना और अधिकारी के इस रवैये पर कड़ी नाराजगी जताई।

जुर्माने की वसूली और पेंशन से कटौती का प्रावधान

आयोग ने अपने आदेश में स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि 25,000 रुपये का जुर्माना तीन महीने के भीतर सरकारी खजाने में जमा कराया जाए। गुरुग्राम के उपायुक्त को इस वसूली की प्रक्रिया सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है। आदेश में यह भी स्पष्ट किया गया है कि यदि संबंधित अधिकारी सेवानिवृत्त हो चुके हैं, तो यह राशि उनकी पेंशन से काटी जाएगी। इसके अलावा, उच्च अधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं कि वे इस देरी की जांच करें और दोषी स्टाफ के खिलाफ विभागीय अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू करें।

हालांकि, आयोग के हस्तक्षेप के बाद 21 अगस्त 2026 को आवेदक को वांछित जानकारी उपलब्ध करा दी गई थी, लेकिन आयोग ने स्पष्ट किया कि यह विलंबित कार्रवाई शुरुआती वैधानिक चूक को माफ नहीं करती है। पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय के पूर्व फैसलों का हवाला देते हुए आयोग ने कहा कि बिना किसी उचित कारण के जानकारी देने में देरी करना दंडात्मक कार्रवाई को आमंत्रित करता है।

शिकायतकर्ता की आगे की रणनीति

इस मामले में शिकायतकर्ता हरिंदर धींगड़ा ने बताया कि उन्होंने कुल चार अपील याचिकाएं दायर की थीं। आयोग ने एक मामले में जुर्माना लगाया है, जबकि अन्य तीन मामलों का निपटारा कर दिया गया है। धींगड़ा ने असंतोष जताते हुए कहा है कि वे बाकी तीन मामलों में भी न्याय पाने के लिए उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाएंगे ताकि जवाबदेही तय की जा सके।

यह मामला सरकारी कार्यालयों में आरटीआई आवेदनों के प्रति बरती जा रही लापरवाही को उजागर करता है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के कड़े जुर्माने से अधिकारियों में जवाबदेही बढ़ेगी और भविष्य में सूचना देने में अनावश्यक देरी से बचा जा सकेगा।

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टिप्पणियाँ (2)

  • अ
    अमित कुमार2 घंटे पहले

    बहुत बढ़िया और संतुलित रिपोर्टिंग। FN News पर भरोसा बना रहता है।

  • स
    सपना ठाकुर4 घंटे पहले

    ग्वालियर-चंबल की खबरें इतनी डिटेल में और कहीं नहीं मिलतीं। शुक्रिया!

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