भीलवाड़ा: चारागाह जमीन पर कब्जे का मामला, गौशाला के नाम पर आवंटित 20 बीघा भूमि पर एक भी गाय नहीं

मोहम्मद फ़ैज़ान
संपादक

गौशाला के नाम पर सरकारी जमीन पर कब्जा
राजस्थान के भीलवाड़ा जिले में शाहपुरा-केकड़ी मेगा हाईवे के समीप स्थित 20 बीघा चारागाह भूमि को लेकर बड़ा विवाद सामने आया है। आरोप है कि स्थानीय विधायक लालाराम बैरवा और उनके परिवार के सदस्यों ने एक गौशाला के नाम पर इस सरकारी जमीन पर कब्जा कर लिया है। मौके पर तारबंदी और निर्माण कार्य भी किया गया है, लेकिन हकीकत यह है कि वहां एक भी गाय मौजूद नहीं है।
इस जमीन के आवंटन के लिए 'देव गौशाला सेवा संस्थान' के नाम से एक प्रस्ताव तैयार किया गया था। इस संस्थान के पदाधिकारियों की सूची में विधायक लालाराम बैरवा स्वयं सचिव के पद पर हैं। उनके छोटे बेटे चिनार देवतवाल अध्यक्ष और बड़े बेटे जतिन देवतवाल कोषाध्यक्ष हैं। इसके अलावा, विधायक के निजी सहायक हुकमचंद कुमावत को उपाध्यक्ष बनाया गया है। संस्थान के अन्य सदस्यों में दिशांक गर्ग और राहुल बोहरा शामिल हैं।
प्रशासनिक नियमों की अनदेखी और आवंटन का खेल
सरकारी नियमों के अनुसार, किसी भी गौशाला को जमीन आवंटित करने के लिए उसका कम से कम तीन साल से संचालित होना अनिवार्य है। साथ ही, राजस्थान सोसायटी रजिस्ट्रीकरण अधिनियम और राजस्थान गौशाला अधिनियम के तहत पंजीकरण आवश्यक है। राजस्व विभाग के शासन उप सचिव हरिसिंह मीणा ने स्पष्ट किया है कि इन शर्तों को पूरा न करने के कारण सरकार ने इस जमीन के आवंटन प्रस्ताव को खारिज कर दिया है। इसके बावजूद, मौके पर कब्जा बरकरार है।
फाइल की प्रक्रिया पर गौर करें तो यह काफी तेजी से आगे बढ़ी थी। अगस्त 2025 में संस्थान के पंजीकरण के कुछ ही महीनों के भीतर फाइल तहसीलदार, एसडीएम और कलेक्टर कार्यालय से होते हुए राजस्व विभाग तक पहुंच गई। शुरू में आमलीकला क्षेत्र की जमीन का प्रस्ताव भेजा गया था, लेकिन बाद में फाइल में बदलाव कर इसे हाईवे के पास स्थित माताजी का खेड़ा के पास की जमीन में बदल दिया गया।
बिजली कनेक्शन और अधिकारियों की भूमिका
विवादित जमीन पर बिजली का एक अस्थायी कनेक्शन भी लगा हुआ है, जो विधायक के बेटे चिनार के नाम पर है। इस कनेक्शन से जुड़े एक विवाद के चलते बिजली विभाग के एक एक्सईएन (XEN) को एपीओ (पदस्थापन की प्रतीक्षा) भी किया गया था। स्थानीय प्रशासन की भूमिका भी सवालों के घेरे में है, क्योंकि प्रस्ताव खारिज होने के बाद भी मौके से निर्माण नहीं हटाया गया है।
शाहपुरा के तहसीलदार भीमराज परिहार का कहना है कि चारागाह भूमि आवंटन के लिए विशेष छूट का प्रावधान था, जिसके चलते प्रस्ताव भेजा गया था। उन्होंने कहा कि सरकार ने जो उचित समझा, वही निर्णय लिया है। वहीं, शाहपुरा के एसडीएम सुनील मीणा ने इस मामले पर अनभिज्ञता जाहिर की है और कहा कि उन्हें प्रकरण की पूरी जानकारी नहीं है।
विधायक का पक्ष
जब इस संबंध में विधायक लालाराम बैरवा से सवाल किया गया, तो उन्होंने कहा कि गौशाला संचालन की प्रक्रिया चल रही है और गायों को फिलहाल दूसरी जगह शिफ्ट किया गया है। उन्होंने अपने परिवार के सदस्यों के ट्रस्ट में शामिल होने पर कहा कि वे गौसेवा में रुचि रखते हैं और वे कोई गलत काम नहीं कर रहे हैं। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि प्रभावशाली व्यक्ति होने से काम जल्दी सफल होते हैं।
फिलहाल, सरकारी जमीन पर कब्जे और गौशाला के नाम पर हो रही इस गतिविधि ने स्थानीय स्तर पर राजनीतिक चर्चाओं को तेज कर दिया है। नियमों के उल्लंघन और सरकारी जमीन के दुरुपयोग के आरोपों के बीच अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि प्रशासन आगे क्या कदम उठाता है।

संपादक
मोहम्मद फ़ैज़ान
टिप्पणियाँ (2)
- अअमित कुमार2 घंटे पहले
बहुत बढ़िया और संतुलित रिपोर्टिंग। FN News पर भरोसा बना रहता है।
- ससपना ठाकुर4 घंटे पहले
ग्वालियर-चंबल की खबरें इतनी डिटेल में और कहीं नहीं मिलतीं। शुक्रिया!
