बालाघाट: स्वास्थ्य सेवाओं पर भारी दबाव, जिला अस्पताल में एक बेड पर तीन-तीन बच्चे भर्ती
बालाघाट के बैहर और परसवाड़ा क्षेत्र से बीमार बच्चों के जिला अस्पताल पहुंचने का सिलसिला बढ़ता जा रहा है। अस्पताल में कुल 50 बेड हैं।

मोहम्मद नवेद
एडिटर

मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले में स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली का मामला सामने आया है। बैहर और परसवाड़ा क्षेत्र में फैल रही विभिन्न बीमारियों के कारण जिला अस्पताल में मरीजों की संख्या में भारी उछाल आया है। अस्पताल में बेड की सीमित संख्या होने के कारण यहां एक ही बेड पर दो से तीन बच्चों का इलाज करने की मजबूरी बनी हुई है। पिछले कुछ समय में यहां खसरा, मलेरिया, डायरिया, चर्मरोग और बुखार से पीड़ित बच्चों के आने का सिलसिला लगातार जारी है।
अस्पताल में बेड और संसाधनों का भारी अभाव
बालाघाट जिला अस्पताल में कुल 50 बेड की क्षमता है, लेकिन वर्तमान में मरीजों की संख्या इससे कहीं अधिक हो गई है। सिविल सर्जन डॉ. निलय जैन के अनुसार, सामान्य दिनों में प्रतिदिन 20 से 30 बच्चे भर्ती होते थे, लेकिन अब यह संख्या कई गुना बढ़ गई है। अस्पताल प्रशासन ने जबलपुर के संयुक्त संचालक को पत्र लिखकर तत्काल प्रभाव से अतिरिक्त बेड और स्टाफ नर्सों की मांग की है। वर्तमान में पीआईसीयू (PICU) में 13 बच्चे गंभीर अवस्था में भर्ती हैं और वैकल्पिक व्यवस्थाओं के जरिए उनका उपचार किया जा रहा है।
प्रभावित क्षेत्रों से आने वाले मरीजों की संख्या इतनी अधिक है कि स्वास्थ्य कर्मियों पर काम का भारी दबाव है। अस्पताल के वार्डों में जगह की कमी के कारण मरीजों को उचित सुविधाएं देने में कठिनाई आ रही है। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए स्वास्थ्य विभाग के सामने चुनौती बढ़ गई है कि कैसे इन सभी बच्चों को बेहतर इलाज मुहैया कराया जाए।
27 बच्चों की मौत से मचा हड़कंप
जून के अंतिम सप्ताह से अब तक इन बीमारियों के प्रकोप के कारण 27 बच्चों की मृत्यु हो चुकी है। मृतकों में बैगा और गोंड जनजाति के बच्चे भी शामिल हैं। हाल ही में 10 वर्षीय काजल सैयाम की मौत के बाद इस दुखद आंकड़े ने प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं। स्थानीय निवासियों का आरोप है कि स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी और गांवों में पेयजल की खराब स्थिति के कारण बीमारियां तेजी से फैल रही हैं।
सोनगुड्डा पंचायत के निवासी साधुसिंह टेकाम ने बताया कि उनके गांव में कई लोग मलेरिया से ग्रसित हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि नल-जल योजना के बावजूद कई वार्डों में साफ पानी नहीं पहुंच रहा है, जिससे लोग दूषित पानी पीने को मजबूर हैं। इसी तरह, कोरका और कुंडेकसा जैसे सुदूर इलाकों से भी परिजन अपने बीमार बच्चों को 100 किलोमीटर से अधिक की दूरी तय करके जिला अस्पताल लाने को विवश हैं।
अस्थायी अस्पताल बनाने का सुझाव
इतनी लंबी दूरी तय करके आने वाले परिवारों की समस्याओं को देखते हुए प्रभावित क्षेत्रों के पास ही 50 बेड का एक अस्थायी अस्पताल स्थापित करने का सुझाव दिया गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि प्रभावित इलाकों के नजदीक ही इलाज की सुविधा मिल जाए, तो बच्चों को जिला अस्पताल लाने की जरूरत नहीं पड़ेगी। इस अस्थायी केंद्र पर जबलपुर मेडिकल कॉलेज के डॉक्टरों और स्टाफ की नियुक्ति करने की मांग की जा रही है ताकि समय पर उपचार मिल सके।
फिलहाल, अस्पताल प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग की ओर से स्थिति को नियंत्रित करने के दावे किए जा रहे हैं। हालांकि, जमीनी स्तर पर संसाधनों की कमी और लगातार बढ़ रहे मरीजों के आंकड़े प्रशासन के लिए बड़ी चिंता का विषय बने हुए हैं। आने वाले दिनों में स्वास्थ्य विभाग किस प्रकार की ठोस रणनीति अपनाता है, इस पर सबकी नजरें टिकी हुई हैं।

एडिटर
मोहम्मद नवेद
टिप्पणियाँ (2)
- अअमित कुमार2 घंटे पहले
बहुत बढ़िया और संतुलित रिपोर्टिंग। FN News पर भरोसा बना रहता है।
- ससपना ठाकुर4 घंटे पहले
ग्वालियर-चंबल की खबरें इतनी डिटेल में और कहीं नहीं मिलतीं। शुक्रिया!