हवाई सफर हुआ तंग: पिछले 40 सालों में विमानों की सीटें 4 इंच तक सिमटीं, यात्रियों का बढ़ा वजन
Airline cabin seat pitch reduction analysis 2026. एविएशन इंडस्ट्री की कई रिपोर्ट्स और एयरलाइंस के सीट मैप के एनालिसिस के मुताबिक 1980-90 के दशक में इकोनॉमी क्लास में सीटों के बीच की दूरी (सीट पिच) 34-35 इंच होती थी। आज अधिकांश एयरलाइंस में यह 30-31 इंच रह गई है।

मोहम्मद फ़ैज़ान
संपादक

सीटों की घटती दूरी और बढ़ती परेशानी
हवाई यात्रा करने वाले यात्रियों के लिए पिछले चार दशकों में सफर का अनुभव काफी बदल गया है। एविएशन इंडस्ट्री की विभिन्न रिपोर्ट्स और एयरलाइंस के सीट मैप के विश्लेषण से यह स्पष्ट होता है कि 1980 और 90 के दशक में इकोनॉमी क्लास की सीटों के बीच की दूरी, जिसे 'सीट पिच' कहा जाता है, 34 से 35 इंच हुआ करती थी। आज के समय में यह घटकर औसतन 30 से 31 इंच रह गई है। भारत में संचालित लो-कॉस्ट एयरलाइंस में तो यह अंतर और भी कम होकर 28 से 29 इंच तक पहुंच गया है।
दिलचस्प बात यह है कि एक तरफ जहां विमानों के भीतर लेगरूम में 4 से 7 इंच तक की कमी आई है, वहीं दूसरी ओर यात्रियों के शारीरिक आकार में भी बदलाव देखा गया है। साइंस मैग्जीन 'अप्लाइड एर्गोनॉमिक्स' और 'एसएई इंटरनेशनल' के आंकड़ों के अनुसार, पिछले 40 वर्षों में इंसानों के बैठने के दौरान औसत चौड़ाई में 8 से 13 फीसदी तक की बढ़ोतरी हुई है। इसका मतलब है कि एक तरफ सीटें संकरी हो रही हैं, तो दूसरी तरफ यात्री पहले से अधिक जगह की मांग कर रहे हैं।
मुनाफे का गणित और अतिरिक्त शुल्क
सीटों के सिकुड़ने के पीछे सबसे बड़ा कारण एयरलाइंस का आर्थिक मॉडल है। हवाई यात्रियों की संख्या में पिछले एक दशक में भारी उछाल आया है। आंकड़ों के अनुसार, 2015-16 की तुलना में 2025-26 तक हवाई यात्रियों की संख्या में 200 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि हुई है। अधिक प्रतिस्पर्धा और सीमित जगह के बीच एयरलाइंस कम जगह में अधिक यात्रियों को बैठाकर अपना मुनाफा बढ़ाने की रणनीति पर काम कर रही हैं।
विमान निर्माता कंपनियां भी अब ऐसी हल्की सीटें विकसित कर रही हैं जिनसे एयरलाइंस को सालाना करोड़ों रुपये की अतिरिक्त बचत हो सके। इस बदलाव का सीधा असर यात्रियों की जेब पर पड़ रहा है। आज एयरलाइंस अधिक लेगरूम वाली सीटों के लिए अतिरिक्त शुल्क वसूल रही हैं। भारत में घरेलू उड़ानों के दौरान पसंदीदा सीट या एक्स्ट्रा लेगरूम वाली सीटों के लिए यात्रियों को 500 से 2,000 रुपये तक अतिरिक्त भुगतान करना पड़ता है, जबकि अंतरराष्ट्रीय उड़ानों में यह शुल्क 3,000 से 10,000 रुपये तक हो सकता है।
भविष्य की चुनौतियां और नए प्रयोग
सीटों की घटती चौड़ाई और लेगरूम ने यात्रियों के लिए असुविधा बढ़ा दी है। 1980 के दशक में जो सीटें 19 इंच तक चौड़ी होती थीं, वे अब सिमटकर 16.5 इंच तक रह गई हैं। इस स्थिति को और गंभीर बनाने के लिए भविष्य में 'स्टैंडिंग-स्टाइल' सीटों के प्रयोग की चर्चा भी तेज हो गई है। इटली की एक कंपनी ने 'स्काईराइडर 2.0' नाम की ऐसी सीट विकसित की है, जिसमें यात्री पूरी तरह बैठने के बजाय एक संरचना पर टिककर यात्रा करता है।
इस नई तकनीक का दावा है कि इससे विमान में 20 प्रतिशत अधिक यात्रियों को समायोजित किया जा सकेगा। हालांकि, यह प्रयोग यात्रियों के आराम और सुरक्षा के मानकों पर कितना खरा उतरेगा, यह आने वाला समय ही बताएगा। फिलहाल, एयरलाइंस की प्राथमिकता अधिक यात्रियों को कम जगह में बैठाने की है, जिससे यात्रियों को लंबी दूरी की यात्राओं में शारीरिक थकान और असुविधा का सामना करना पड़ रहा है।

संपादक
मोहम्मद फ़ैज़ान
टिप्पणियाँ (2)
- अअमित कुमार2 घंटे पहले
बहुत बढ़िया और संतुलित रिपोर्टिंग। FN News पर भरोसा बना रहता है।
- ससपना ठाकुर4 घंटे पहले
ग्वालियर-चंबल की खबरें इतनी डिटेल में और कहीं नहीं मिलतीं। शुक्रिया!
