उदयपुर: आरएनटी मेडिकल कॉलेज के डॉक्टरों ने दिखाई अद्भुत कुशलता, 60 दिन के संघर्ष के बाद प्री-मैच्योर जुड़वा बच्चों को दी नई जिंदगी
उदयपुर में आरएनटी मेडिकल कॉलेज के बाल चिकित्सालय में भर्ती जुड़वां नवजात शिशुओं को 60 दिन तक चले गंभीर इलाज के बाद बुधवार को डिस्चार्ज किया गया। जुडवां शिशु 50 बेडेड आउटबॉर्न नर्सरी में भर्ती थे।

मोहम्मद फ़ैज़ान
संपादक

राजस्थान के उदयपुर स्थित आरएनटी मेडिकल कॉलेज के बाल चिकित्सालय में चिकित्सा विज्ञान की एक बड़ी उपलब्धि सामने आई है। यहां डॉक्टरों की एक समर्पित टीम ने 60 दिनों तक चले गहन उपचार के बाद दो प्री-मैच्योर जुड़वा नवजातों को नया जीवन प्रदान किया है। जन्म के समय बेहद नाजुक स्थिति में रहे इन बच्चों को अब स्वस्थ अवस्था में अस्पताल से छुट्टी दे दी गई है।
चुनौतीपूर्ण था जन्म के समय का स्वास्थ्य
जयसमंद निवासी रमेश और काली बाई के घर जन्मे ये जुड़वा बच्चे मात्र 29 सप्ताह के गर्भकाल के बाद दुनिया में आए थे। 4 जून को सलूंबर के एक अस्पताल में जन्म के दौरान दोनों शिशुओं का वजन लगभग 1 किलो था। जन्म के कुछ ही घंटों के भीतर उन्हें गंभीर स्थिति में आरएनटी मेडिकल कॉलेज के बाल चिकित्सालय की 50-बेड वाली आउटबॉर्न नर्सरी में स्थानांतरित किया गया था।
चिकित्सकों के अनुसार, जन्म के समय इन नवजातों के फेफड़े पूरी तरह से विकसित नहीं थे, जिसके कारण उन्हें सांस लेने में भारी कठिनाई हो रही थी। पहले जन्मे शिशु को रेस्पिरेटरी डिस्ट्रेस सिंड्रोम की समस्या थी, जिसके लिए उन्हें तुरंत सर्फेक्टेंट थेरेपी दी गई। उनकी नाजुक स्थिति को देखते हुए उन्हें 10 दिनों तक वेंटिलेटर और 22 दिनों तक सीपीएपी सपोर्ट पर रखा गया था।
चिकित्सकों की टीम और सरकारी योजना का मिला लाभ
डॉ. अनुराधा सनाढ्य के नेतृत्व में डॉक्टरों की एक टीम ने दिन-रात इन बच्चों की निगरानी की। इस उपचार प्रक्रिया में डॉ. निशांत डांगी, डॉ. नेहा असोरा, डॉ. शिंथू, डॉ. नितीश, डॉ. ऋचा जोशी, डॉ. श्रुतकीर्ति और डॉ. लक्ष्य शर्मा सहित नर्सिंग स्टाफ का महत्वपूर्ण योगदान रहा। टीम की कड़ी मेहनत और निरंतर देखभाल का ही परिणाम था कि बच्चों की स्थिति में धीरे-धीरे सुधार होने लगा।
इन बच्चों के उपचार का पूरा खर्च मुख्यमंत्री आयुष्मान आरोग्य योजना के तहत उठाया गया। अस्पताल प्रशासन के अनुसार, पहले बच्चे के उपचार पर लगभग 2.25 लाख और दूसरे बच्चे पर 2.50 लाख रुपये का खर्च आया, जो पूरी तरह से निःशुल्क रहा। आर्थिक रूप से कमजोर परिवार के लिए यह सरकारी सहायता एक बड़ा सहारा साबित हुई।
स्वस्थ होकर घर लौटे नवजात
अस्पताल अधीक्षक डॉ. आरएल सुमन ने बताया कि 60 दिनों के लंबे इलाज के बाद अब दोनों बच्चे पूरी तरह स्वस्थ हैं। डिस्चार्ज के समय एक बच्चे का वजन बढ़कर 1.325 किलो और दूसरे का 1.345 किलो हो गया है। मां और बच्चे अब अपने घर लौट चुके हैं।
बाल चिकित्सा विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. विवेक अरोड़ा ने इस सफलता को मेडिकल टीम की बड़ी उपलब्धि बताया। उन्होंने कहा कि 29 सप्ताह में जन्मे और इतने कम वजन वाले बच्चों का जीवित बचना और पूरी तरह स्वस्थ होना एक चुनौतीपूर्ण कार्य होता है, जिसे टीम ने अपनी कुशलता से संभव कर दिखाया।

संपादक
मोहम्मद फ़ैज़ान
टिप्पणियाँ (2)
- अअमित कुमार2 घंटे पहले
बहुत बढ़िया और संतुलित रिपोर्टिंग। FN News पर भरोसा बना रहता है।
- ससपना ठाकुर4 घंटे पहले
ग्वालियर-चंबल की खबरें इतनी डिटेल में और कहीं नहीं मिलतीं। शुक्रिया!