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टोंक: शिक्षक की नौकरी ठुकराकर आशीष जैन ने खड़ा किया हथकरघा साम्राज्य, 150 लोगों को मिल रहा रोजगार

टोंक जिले के आवां कस्बे में आशीष जैन का हथकरघा उद्योग अब खुद के साथ टोंक समेत बारां, अजमेर, झालावाड आदि जिलों में 150 लोगों को रोजगार दे रहा है। कारोबार का सालाना टर्नओवर करीब 50-60 लाख रुपए पहुंच गया है।

मुश्ताक अहमद खान

मुश्ताक अहमद खान

Editor In Chief

7 अगस्त 20262 मिनट पढ़ें
टोंक: शिक्षक की नौकरी ठुकराकर आशीष जैन ने खड़ा किया हथकरघा साम्राज्य, 150 लोगों को मिल रहा रोजगार
मूल स्रोत

शिक्षक की सरकारी नौकरी छोड़कर चुनी आत्मनिर्भरता की राह

टोंक जिले के आवां कस्बे के रहने वाले आशीष जैन ने एक मिसाल कायम की है। करीब पांच साल पहले उनका चयन तृतीय श्रेणी शिक्षक भर्ती परीक्षा में हुआ था, लेकिन उन्होंने सरकारी नौकरी के बजाय अपने पैतृक और पारंपरिक हथकरघा उद्योग को आगे बढ़ाने का साहसी निर्णय लिया। आज उनका यह उद्यम न केवल खुद के लिए बल्कि क्षेत्र के 150 से अधिक लोगों के लिए आजीविका का मुख्य साधन बन गया है।

आशीष ने 2016 में जयपुर के बुनकर सेवा केंद्र और मध्य प्रदेश से हथकरघा का विशेष प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद अपने गांव आवां में इस उद्योग की नींव रखी थी। धीरे-धीरे उन्होंने स्थानीय युवाओं को भी इस कला में निपुण बनाया, जिससे न केवल बेरोजगारी कम हुई, बल्कि युवाओं का बड़े शहरों की ओर पलायन भी थमा है। वर्तमान में उनके साथ काम करने वाले 150 लोगों में लगभग 100 महिलाएं शामिल हैं।

सालाना 60 लाख का टर्नओवर और विस्तार की कहानी

मेहनत और लगन का परिणाम यह है कि आज इस हथकरघा उद्योग का सालाना टर्नओवर 50 से 60 लाख रुपये तक पहुंच गया है। समिति द्वारा तैयार किए गए खादी वस्त्रों की मांग अब केवल स्थानीय स्तर तक सीमित नहीं है, बल्कि जयपुर और दिल्ली जैसे बड़े शहरों में भी इनके आउटलेट संचालित हो रहे हैं। आशीष जैन और उनके साथ जुड़े कई बुनकरों को अब तक जिला और राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित भी किया जा चुका है।

आशीष बताते हैं कि इस काम के पीछे उन्हें जैन आचार्य विद्यासागर जी महाराज और मुनि सुधा सागर जी महाराज से प्रेरणा मिली है। मुनि श्री का मानना था कि गांव के लोगों को रोजगार के लिए बाहर न जाना पड़े। इसी उद्देश्य को पूरा करने के लिए उन्होंने न केवल आवां में केंद्र स्थापित किए, बल्कि जेलों में भी कैदियों को हथकरघा का प्रशिक्षण दिया ताकि वे सकारात्मक जीवन की ओर लौट सकें।

हथकरघा की बारीकियां और भविष्य की चुनौतियां

हथकरघा पर कपड़ा तैयार करने की प्रक्रिया अत्यंत जटिल और कौशल आधारित है। इसमें ताना तैयार करने से लेकर शटल के माध्यम से बाने में धागा डालने तक का काम कारीगर अपने अनुभव से करते हैं। बिना किसी कागज-पेन के, केवल अपने कौशल के दम पर वे कपड़े पर आकर्षक डिजाइन उकेरते हैं। वर्तमान में राजस्थान में 27 हथकरघे उपलब्ध हैं, जिनमें से 20 सक्रिय रूप से संचालित हो रहे हैं।

जिला उद्योग केंद्र टोंक के महाप्रबंधक संजय जैन के अनुसार, राज्य सरकार बुनकरों को बढ़ावा देने के लिए ब्याज मुक्त ऋण जैसी सुविधाएं प्रदान कर रही है। आशीष जैन का मानना है कि भारतीय हैंडलूम की गुणवत्ता और पारंपरिक हुनर की मांग विदेशों में भी है। उनका लक्ष्य है कि इस उद्योग को और अधिक विस्तार दिया जाए ताकि पर्यावरण के अनुकूल इस पारंपरिक कला को नई पीढ़ी तक पहुंचाया जा सके और अधिक से अधिक बेरोजगारों को स्वरोजगार से जोड़ा जा सके।

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टिप्पणियाँ (2)

  • अ
    अमित कुमार2 घंटे पहले

    बहुत बढ़िया और संतुलित रिपोर्टिंग। FN News पर भरोसा बना रहता है।

  • स
    सपना ठाकुर4 घंटे पहले

    ग्वालियर-चंबल की खबरें इतनी डिटेल में और कहीं नहीं मिलतीं। शुक्रिया!

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