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ट्रेनों में चूहों का आतंक: एसी कोच में यात्रियों की सुरक्षा पर मंडराया खतरा, 13 साल से बेअसर है रेलवे का सिस्टम

ट्रेन में सफर के दौरान चूहा सिर्फ गंदगी का संकेत नहीं, अब यात्री की सुरक्षा का सवाल बन चुका है। रेलवे के रिकॉर्ड और CAG की ऑडिट रिपोर्ट बताती है कि ट्रेनों में चूहे-कॉकरोच की समस्या 13 साल से लगातार बनी हुई है।

मोहम्मद फ़ैज़ान

मोहम्मद फ़ैज़ान

संपादक

10 सितंबर 20263 मिनट पढ़ें
ट्रेनों में चूहों का आतंक: एसी कोच में यात्रियों की सुरक्षा पर मंडराया खतरा, 13 साल से बेअसर है रेलवे का सिस्टम
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एसी कोच में चूहों का खौफनाक अनुभव

भारतीय ट्रेनों के एसी कोच, जिन्हें यात्रा का सबसे आरामदायक और सुरक्षित माध्यम माना जाता है, अब चूहों के कारण गंभीर सुरक्षा जोखिम का केंद्र बन गए हैं। हाल ही में ऊना-इंदौर एक्सप्रेस के फर्स्ट एसी कोच में एक 78 वर्षीय बुजुर्ग की नाक चूहे द्वारा कुतरे जाने की घटना ने रेलवे की कीट नियंत्रण व्यवस्था की पोल खोल दी है। यह कोई इकलौती घटना नहीं है; इंदौर-दौंड एक्सप्रेस और अन्य ट्रेनों में भी यात्रियों ने एसी डक्ट से चूहों के निकलने और उनके सामान को नुकसान पहुंचाने की शिकायतें की हैं।

यात्रियों के लिए यह समस्या केवल गंदगी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उनके स्वास्थ्य और सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा बन चुकी है। कई मामलों में यात्रियों को अपने कीमती सामान और कपड़ों के नुकसान का सामना करना पड़ा है। कटनी की एक घटना में तो उपभोक्ता आयोग ने रेलवे की सेवा में कमी मानते हुए पीड़ित यात्री को 15 हजार रुपये का हर्जाना देने का आदेश तक दिया था।

कैग की रिपोर्ट और वर्षों से जारी लापरवाही

रेलवे के रिकॉर्ड और नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की रिपोर्टें इस बात की गवाह हैं कि ट्रेनों में चूहों और कॉकरोच की समस्या पिछले 13 वर्षों से लगातार बनी हुई है। 2013 की कैग रिपोर्ट में 88 ट्रेनों के निरीक्षण के बाद यह पाया गया था कि कीट नियंत्रण व्यवस्था पूरी तरह से विफल है। सर्वे में शामिल करीब 24% एसी यात्रियों ने कोच के भीतर चूहों और कॉकरोच की मौजूदगी की पुष्टि की थी। इसके बावजूद, 2025 की ऑडिट रिपोर्ट में भी स्थिति में कोई खास सुधार नहीं देखा गया है।

रेलवे के नियमों के अनुसार, हर प्राथमिक रखरखाव के दौरान एसी कोच और पेंट्री कार में चूहों की रोकथाम के लिए विशेष दवाएं, गोंद वाले फंदे और बॉक्स का उपयोग अनिवार्य है। लापरवाही पाए जाने पर प्रति कोच 250 से 500 रुपये तक का जुर्माना लगाने का प्रावधान भी है, लेकिन धरातल पर इन नियमों का पालन न के बराबर होता दिख रहा है।

यार्ड से कोच तक चूहों का प्रवेश

विशेषज्ञों का मानना है कि चूहों की समस्या का मुख्य कारण कोचिंग डिपो, पिट लाइन और स्टेबलिंग यार्ड हैं। ट्रेनें जब लंबे समय तक इन यार्डों में खड़ी रहती हैं, तो चूहे कोच के नीचे के गैप और केबल डक्ट के जरिए अंदर प्रवेश कर जाते हैं। यार्ड के आसपास चूहों के बिलों को बंद करने और धुआं उपचार जैसी प्रक्रियाओं की कमी के कारण यह समस्या ट्रेनों के भीतर तक पहुंच जाती है।

यात्री अब प्रीमियम किराया देने के बावजूद असुरक्षित महसूस कर रहे हैं। कई यात्रियों का कहना है कि चूहों के डर से वे ट्रेन में खाना खाने तक से कतराते हैं। रेलवे के जनसंपर्क अधिकारियों का दावा है कि घटनाओं के बाद संबंधित कर्मचारियों पर कार्रवाई की जाती है और सफाई के लिए जिम्मेदार कंपनियों पर जुर्माना लगाया जाता है, लेकिन यात्रियों का अनुभव बताता है कि जब तक बुनियादी ढांचा और यार्ड प्रबंधन में सुधार नहीं होगा, तब तक यह समस्या बनी रहेगी।

सिस्टम की विफलता पर सवाल

चूहों का ट्रेन में पनपना केवल सफाई की कमी नहीं, बल्कि एक व्यवस्थित विफलता है। कोच के भीतर भोजन के अवशेष और कचरा चूहों को आकर्षित करते हैं, और एक बार अंदर आने के बाद, वे एसी डक्ट और सीटों के नीचे अपना ठिकाना बना लेते हैं। यात्रियों की शिकायतों के प्रति रेलवे का सुस्त रवैया इस समस्या को और गंभीर बना रहा है। अब देखना यह है कि क्या रेलवे प्रशासन इस पुरानी समस्या के समाधान के लिए कोई ठोस और दीर्घकालिक कदम उठाता है या यात्री इसी तरह खतरों के बीच सफर करने को मजबूर रहेंगे।

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टिप्पणियाँ (2)

  • अ
    अमित कुमार2 घंटे पहले

    बहुत बढ़िया और संतुलित रिपोर्टिंग। FN News पर भरोसा बना रहता है।

  • स
    सपना ठाकुर4 घंटे पहले

    ग्वालियर-चंबल की खबरें इतनी डिटेल में और कहीं नहीं मिलतीं। शुक्रिया!

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