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रणथंभौर का वो अनोखा बाघ जिसने निभाई पिता की भूमिका, अनाथ शावकों को सिखाया शिकार का हुनर

आज इंटरनेशनल टाइगर डे है, रणथंभौर में 77 टाइगर हैं। इसमें मछली, जलेबी जैसी टाइग्रेस के नाम इतिहास में दर्ज हैं।

मोहम्मद फ़ैज़ान

मोहम्मद फ़ैज़ान

संपादक

29 जुलाई 20263 मिनट पढ़ें
रणथंभौर का वो अनोखा बाघ जिसने निभाई पिता की भूमिका, अनाथ शावकों को सिखाया शिकार का हुनर
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राजस्थान के रणथंभौर टाइगर रिजर्व में बाघों का अपना एक अलग इतिहास रहा है। यहाँ मछली और जलेबी जैसी कई बाघिनों ने अपनी पहचान बनाई है, लेकिन एक नर बाघ ऐसा भी रहा जिसने अपनी आक्रामक प्रकृति से इतर ममता की अनूठी मिसाल पेश की। इस बाघ का नाम था 'डॉलर' (टी-25)। डॉलर को वन्यजीव विशेषज्ञों द्वारा संभवतः दुनिया का इकलौता ऐसा बाघ माना जाता है, जिसने अनाथ हुए दो मादा शावकों को न केवल गोद लिया, बल्कि ढाई साल तक उनकी सुरक्षा और परवरिश की जिम्मेदारी भी निभाई।

अनाथ शावकों का बना सहारा

साल 2011 में कचीदा वन क्षेत्र में एक बाघिन की मृत्यु के बाद उसके दो शावक, बीना-1 (एसटी-9) और बीना-2 (एसटी-10), महज तीन महीने की उम्र में अकेले रह गए थे। आमतौर पर नर बाघ अपनी टेरिटरी में दूसरे शावकों को बर्दाश्त नहीं करते, लेकिन डॉलर ने इन नन्हीं बाघिनों को कोई नुकसान नहीं पहुँचाया। इसके विपरीत, वह एक सुरक्षा कवच बनकर उनके साथ रहने लगा। वन विभाग के अनुसार, डॉलर इन शावकों के साथ हर समय मौजूद रहता था, चाहे वह पानी पीने का समय हो या भोजन का।

वन्यजीव विशेषज्ञों का कहना है कि डॉलर ने न केवल उन्हें अन्य हिंसक जानवरों से बचाया, बल्कि उन्हें शिकार करने के गुर भी सिखाए। शावक डॉलर को शिकार करते हुए देखते थे और उसी तकनीक को अपनाकर खुद भी शिकार करना सीखते थे। जब भी कोई अन्य बाघ या बाघिन उन पर हमला करने की कोशिश करता, डॉलर ढाल बनकर उनके सामने खड़ा हो जाता था। ये दोनों बाघिनें 2014 तक डॉलर के साथ रहीं और बाद में उन्हें सरिस्का टाइगर रिजर्व में स्थानांतरित कर दिया गया।

प्रकृति के विरुद्ध एक दुर्लभ व्यवहार

रणथंभौर टाइगर रिजर्व के डीएफओ मानस सिंह के अनुसार, बाघ एक एकांतप्रिय और क्षेत्रीय (टेरिटोरियल) जानवर है। सामान्यतः ढाई-तीन साल की उम्र के बाद बाघ अपने शावकों से कोई संबंध नहीं रखते और अपनी टेरिटरी के लिए आपस में संघर्ष करते हैं। डॉलर का व्यवहार इस सामान्य प्रवृत्ति से बिल्कुल अलग था। उसने अपनी स्वाभाविक आक्रामकता को छोड़कर एक पिता की तरह शावकों की देखभाल की, जो वन्यजीव विज्ञान के नजरिए से एक बेहद दुर्लभ और अध्ययन का विषय रहा है।

डॉलर का जन्म 2007 में बाघिन टी-22 और नर बाघ झुमरू (टी-20) के घर हुआ था। वह अपनी पूरी उम्र रणथंभौर के जंगलों में सक्रिय रहा। उसकी जीवन यात्रा का अंत जनवरी 2020 में हुआ। उस समय उसकी उम्र लगभग 15 वर्ष थी। सांवटा क्षेत्र के पास एक युवा नर बाघ टी-66 के साथ हुई टेरिटोरियल फाइट (क्षेत्रीय वर्चस्व की लड़ाई) में वह गंभीर रूप से घायल हो गया था।

संघर्ष में हुई मौत

डॉलर की मृत्यु के बाद जब उसका पोस्टमॉर्टम किया गया, तो उसके सिर की हड्डियां टूटी हुई पाई गईं। यह स्पष्ट था कि युवा बाघ के साथ हुई भीषण लड़ाई में उसे घातक चोटें आई थीं। हालांकि डॉलर अब हमारे बीच नहीं है, लेकिन रणथंभौर के इतिहास में उसे एक ऐसे बाघ के रूप में याद किया जाता है, जिसने अपनी टेरिटरी के नियमों को दरकिनार कर अनाथ शावकों को जीवनदान दिया और उन्हें जंगल में जीने के लिए सक्षम बनाया।

वर्तमान में रणथंभौर में बाघों की संख्या 77 तक पहुंच चुकी है। बढ़ती आबादी के कारण अब बाघों के बीच अपनी टेरिटरी को लेकर संघर्ष की घटनाएं भी बढ़ रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि सीमित संसाधनों और बढ़ते दबाव के कारण बाघों का एक-दूसरे के प्रति हिंसक होना एक बड़ी चुनौती बन गया है, जिसके चलते पिछले कुछ वर्षों में कई बाघों ने अपनी जान गंवाई है।

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टिप्पणियाँ (2)

  • अ
    अमित कुमार2 घंटे पहले

    बहुत बढ़िया और संतुलित रिपोर्टिंग। FN News पर भरोसा बना रहता है।

  • स
    सपना ठाकुर4 घंटे पहले

    ग्वालियर-चंबल की खबरें इतनी डिटेल में और कहीं नहीं मिलतीं। शुक्रिया!

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