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मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में ओबीसी आरक्षण पर सुनवाई: वरिष्ठ अधिवक्ता ने दिया आरक्षण खत्म करने का सुझाव

High Court OBC Reservation hearing updates, advocate argument, government data, legal proceedings. वरिष्ठ अधिवक्ता रामेश्वर सिंह ने कोर्ट को यह भी बताया कि ओबीसी का सम्पूर्ण डेटा धर्म ग्रंथो में जिसे मंडल तथा महाजन आयोग ने अपनी रिपोर्टो में संग्रहित किया है, इसलिए अलग से डेटा जरूरी नहीं है। प्रदेश में ब्राह्मणों की कुल आवादी के 40% आवादी को शामिल किया गया है।

मोहम्मद फ़ैज़ान

मोहम्मद फ़ैज़ान

संपादक

4 अगस्त 20262 मिनट पढ़ें 782
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में ओबीसी आरक्षण पर सुनवाई: वरिष्ठ अधिवक्ता ने दिया आरक्षण खत्म करने का सुझाव
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मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में ओबीसी आरक्षण से जुड़े विभिन्न मामलों पर सुनवाई का सिलसिला जारी है। विशेष बेंच के समक्ष चल रही इस कानूनी प्रक्रिया के 14वें दिन ओबीसी पक्ष की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता रामेश्वर सिंह ठाकुर ने अपनी दलीलें पेश कीं। जस्टिस आनंद पाठक और जस्टिस विनय सराफ की बेंच इस मामले की गंभीरता से समीक्षा कर रही है।

आरक्षण समाप्त करने का वैकल्पिक प्रस्ताव

सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता ने एक चौंकाने वाला सुझाव देते हुए कहा कि यदि आरक्षण व्यवस्था को लेकर समाज में विवाद की स्थिति बनी हुई है, तो सरकार इसे समाप्त करने पर भी विचार कर सकती है। उन्होंने इसके विकल्प के रूप में एक नया प्रस्ताव रखा, जिसमें कक्षा 1 से 12वीं तक सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले छात्रों को ही सरकारी नौकरियों में प्राथमिकता देने की बात कही गई। अधिवक्ता का तर्क है कि इससे न केवल आरक्षण का विवाद सुलझ सकता है, बल्कि सरकारी शिक्षा प्रणाली की गुणवत्ता में भी सुधार आएगा।

अदालत में बहस के दौरान ओबीसी पक्ष ने मंडल और महाजन आयोग की रिपोर्टों का हवाला दिया। अधिवक्ता ने तर्क दिया कि ओबीसी वर्ग का संपूर्ण डेटा ऐतिहासिक धर्मग्रंथों में निहित है, जिसे इन आयोगों ने अपनी रिपोर्टों में संकलित किया है, इसलिए अलग से डेटा जुटाने की आवश्यकता नहीं है। महाजन आयोग की रिपोर्ट के अध्याय 4 और 5 का उल्लेख करते हुए उन्होंने वर्ण व्यवस्था और पिछड़े वर्गों पर इसके प्रभाव को रेखांकित किया।

पिछली सरकारों के फैसलों और डेटा पर बहस

अधिवक्ता ने कोर्ट को बताया कि अगस्त 2019 में तत्कालीन सरकार ने विधानसभा से 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण का कानून पारित किया था। इसके समर्थन में अक्टूबर 2019 में 555 पृष्ठों का विस्तृत जवाब दाखिल किया गया था, जिसमें ओबीसी की 51 प्रतिशत आबादी का डेटा पहली बार आधिकारिक तौर पर रखा गया था। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार बदलने के बाद इस दिशा में प्रयासों की गति धीमी रही और कई मामलों को सुप्रीम कोर्ट में ट्रांसफर कराने की कोशिशें की गईं।

बहस के दौरान मेरिट में आने वाले ओबीसी अभ्यर्थियों का मुद्दा भी उठा। अधिवक्ता ने बताया कि बड़ी संख्या में ओबीसी छात्र अपनी योग्यता के दम पर अनारक्षित श्रेणी में जगह बनाते हैं, जिसके कारण उन्हें आरक्षण का लाभ नहीं मिल पाता। इस पर जस्टिस विनय सराफ ने टिप्पणी करते हुए पूछा कि क्या यह प्रदर्शन इस बात का संकेत है कि ओबीसी अभ्यर्थी अधिक प्रतिभाशाली हैं और उन्हें आरक्षण की आवश्यकता नहीं है?

सुनवाई का अगला चरण

न्यायालय ने इस मामले की सुनवाई के लिए बुधवार, 5 अगस्त की तारीख तय की है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि बेंच के सदस्यों की अन्य व्यस्तताओं के कारण गुरुवार से यह विशेष बेंच उपलब्ध नहीं रहेगी, इसलिए बुधवार को इस चरण की अंतिम बहस पूरी होने की पूरी संभावना है। यह सुनवाई प्रदेश में आरक्षण नीति के भविष्य और कानूनी पेचीदगियों को सुलझाने के लिहाज से अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

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टिप्पणियाँ (2)

  • अमित कुमार2 घंटे पहले

    बहुत बढ़िया और संतुलित रिपोर्टिंग। FN News पर भरोसा बना रहता है।

  • सपना ठाकुर4 घंटे पहले

    ग्वालियर-चंबल की खबरें इतनी डिटेल में और कहीं नहीं मिलतीं। शुक्रिया!

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