मिर्जापुर 1988 हत्याकांड: हाईकोर्ट ने बरकरार रखी दोषियों की सजा, जमानत रद्द कर सरेंडर के आदेश
Mirzapur district 1988 murder case verdict High Court upholds conviction. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मिर्जापुर जिले के कोतवाली देहात थाना क्षेत्र में वर्ष 1988 में हुए बहुचर्चित गोलीकांड मामले में निचली अदालत के फैसले को सही ठहराया। हाईकोर्ट ने जमानत पर बाहर चल रहे इन चारों अभियुक्तों की जमानत रद्द करते हुए उन्हें एक महीने के भीतर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट मिर्जापुर की अदालत में आत्मसमर्पण करने का आदेश दिया है।

मोहम्मद फ़ैज़ान
संपादक

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मिर्जापुर जिले के कोतवाली देहात थाना क्षेत्र में वर्ष 1988 में हुए एक बेहद चर्चित गोलीकांड मामले में अपना महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने इस मामले में निचली अदालत द्वारा सुनाई गई सजा को बरकरार रखते हुए दोषियों को बड़ा झटका दिया है। न्यायमूर्ति सिद्धार्थ और न्यायमूर्ति विनय कुमार द्विवेदी की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए निचली अदालत के निर्णय को पूरी तरह सही ठहराया है।
क्या था 1988 का पूरा मामला
यह खौफनाक घटना 24 अक्टूबर 1988 को मिर्जापुर के चितवनपुर गांव में हुई थी। विवाद की जड़ एक खेत (आराजी नंबर 1387) की जुताई थी। वादी फखरुद्दीन के अनुसार, जब उनके नाना जासिम खान खेत जोतने का काम कर रहे थे, तभी बाबू खान ने उन्हें रोकने का प्रयास किया। देखते ही देखते विवाद ने हिंसक रूप ले लिया और मौके पर हथियारबंद लोग पहुंच गए। इन लोगों ने अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी, जिससे पूरे इलाके में दहशत फैल गई।
इस गोलीबारी में बदरुद्दीन नाम के एक व्यक्ति की मौत हो गई, जिसने अस्पताल ले जाते समय दम तोड़ दिया। इसके अलावा, जासिम खान और फखरुद्दीन समेत कुल 9 लोग गंभीर रूप से घायल हो गए थे। इस घटना ने पूरे क्षेत्र को हिलाकर रख दिया था और पुलिस ने तत्परता दिखाते हुए मामला दर्ज कर जांच शुरू की थी।
निचली अदालत का फैसला और हाईकोर्ट की मुहर
मिर्जापुर की सत्र अदालत ने वर्ष 1993 में इस मामले में अपना फैसला सुनाया था। अदालत ने हासिम खान को हत्या (धारा 302) का दोषी मानते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। इसके साथ ही बाबू खान, मलिक खान, इरशाद खान और रुस्तम खान समेत अन्य अभियुक्तों को जानलेवा हमले (धारा 307) और बलवे के अपराध में दोषी करार दिया गया था। इस फैसले के खिलाफ दोषियों ने हाईकोर्ट में अपील दायर की थी।
हाईकोर्ट की पीठ ने साक्ष्यों और गवाहों के बयानों का गहन विश्लेषण किया। अदालत ने पाया कि निचली अदालत द्वारा दी गई सजा साक्ष्यों के अनुरूप है। सुनवाई के दौरान यह भी सामने आया कि अपील लंबित रहने के दौरान बाबू खान, सईद खान, जाफरू खान और नजरू खान की मृत्यु हो चुकी है, जिसके चलते उनके खिलाफ कानूनी कार्यवाही समाप्त कर दी गई है।
जमानत रद्द, सरेंडर के कड़े निर्देश
हाईकोर्ट ने वर्तमान में जमानत पर बाहर चल रहे शेष चार दोषियों की जमानत तत्काल प्रभाव से रद्द कर दी है। अदालत ने उन्हें आदेश दिया है कि वे एक महीने के भीतर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM) मिर्जापुर की अदालत में आत्मसमर्पण करें। यदि दोषी निर्धारित समय सीमा के भीतर सरेंडर नहीं करते हैं, तो सीजेएम को उनके खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी कर गिरफ्तारी सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए हैं।
यह निर्णय दशकों पुराने मामले में पीड़ितों को न्याय दिलाने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। हाईकोर्ट के इस सख्त रुख ने स्पष्ट कर दिया है कि गंभीर अपराधों में शामिल दोषियों को कानून से बचने का कोई रास्ता नहीं मिलेगा। प्रशासन अब अदालत के आदेशों के अनुपालन की तैयारी में जुट गया है।

संपादक
मोहम्मद फ़ैज़ान
टिप्पणियाँ (2)
- अअमित कुमार2 घंटे पहले
बहुत बढ़िया और संतुलित रिपोर्टिंग। FN News पर भरोसा बना रहता है।
- ससपना ठाकुर4 घंटे पहले
ग्वालियर-चंबल की खबरें इतनी डिटेल में और कहीं नहीं मिलतीं। शुक्रिया!
