इंदौर हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: श्रीराम मंदिर की संपत्ति के मालिक स्वयं भगवान, 68 साल पुराने विवाद का पटाक्षेप
हाईकोर्ट ने प्राचीन मंदिर की संपत्ति का मालिक देवता को माना, रतंदास का पुजारी के रूप में दर्जा स्वीकार। भगवान श्रीराम के मंदिर पर 68 साल बाद फैसला।

मुश्ताक अहमद खान
Editor In Chief

68 साल पुराने कानूनी विवाद पर विराम
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने उज्जैन जिले के खाचरौद स्थित प्राचीन श्रीराम मंदिर से जुड़े छह दशक से अधिक पुराने विवाद पर अपना अंतिम फैसला सुना दिया है। न्यायमूर्ति विनय सराफ की एकलपीठ ने इस मामले में ट्रायल कोर्ट के पूर्ववर्ती आदेश को निरस्त करते हुए अपील को आंशिक रूप से स्वीकार किया। यह मामला मंदिर के स्वामित्व और प्रबंधन अधिकारों को लेकर 1954 से अदालतों में चल रहा था।
अदालत ने अपने महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि मंदिर और उससे जुड़ी समस्त चल-अचल संपत्तियों के वास्तविक स्वामी स्वयं भगवान श्रीराम हैं। इस फैसले के साथ ही मंदिर की कानूनी स्थिति को लेकर बनी अनिश्चितता समाप्त हो गई है। अदालत ने मंदिर के प्रबंधन का अधिकार राज्य के राजस्व विभाग के पास रहने की पुष्टि की है, जबकि पुजारी की नियुक्ति का अधिकार औकाफ विभाग के पास सुरक्षित रखा गया है।
विवाद की पृष्ठभूमि और ऐतिहासिक घटनाक्रम
मंदिर प्रबंधन को लेकर विवाद की जड़ें 1930 के दशक में मिलती हैं, जब महंत मुरलीदास ने मंदिर की सुरक्षा और प्रबंधन के लिए औकाफ विभाग से हस्तक्षेप का अनुरोध किया था। 15 अक्टूबर 1930 को औकाफ विभाग ने मंदिर का नियंत्रण अपने हाथों में ले लिया था। इसके बाद 1954 में रतनदास ने मंदिर के प्रबंधन और पूजा के अधिकारों को लेकर सिविल वाद दायर किया था। 1968 में ट्रायल कोर्ट द्वारा वाद खारिज किए जाने के बाद मामला हाईकोर्ट की शरण में पहुंचा था।
हाईकोर्ट में यह अपील 1968 से लंबित थी। इस बीच, 1993 में हाईकोर्ट की एकलपीठ ने रतनदास के पक्ष में फैसला सुनाया था, जिसे बाद में सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई। फरवरी 2020 में सर्वोच्च न्यायालय ने पुराने फैसले को निरस्त करते हुए मामले को नए सिरे से सुनवाई के लिए हाईकोर्ट वापस भेज दिया था, जिसके बाद अब यह अंतिम निर्णय आया है।
पुजारी के अधिकारों और प्रबंधन पर स्पष्टता
अदालत ने रतनदास के पुजारी होने के दावे को साक्ष्यों के आधार पर सही माना है। रिकॉर्ड और मौखिक साक्ष्यों की समीक्षा के बाद न्यायालय ने पुष्टि की कि रतनदास मंदिर के पुजारी के रूप में कार्यरत थे। अदालत ने ट्रायल कोर्ट की उस टिप्पणी को खारिज कर दिया जिसमें रतनदास की नियुक्ति को अपर्याप्त साक्ष्यों के आधार पर नकारा गया था। हालांकि, अदालत ने महेश्वरी समाज के सदस्यों को मंदिर के श्रद्धालु के रूप में मान्यता दी, लेकिन उन्हें मंदिर के प्रबंधन में हस्तक्षेप करने से रोकने की मांग को स्वीकार नहीं किया।
मंदिर में श्रीराम, जानकीजी, लक्ष्मणजी, हनुमानजी, लक्ष्मीनारायणजी और गोपालजी की प्रतिमाएं स्थापित हैं। अदालत ने इन सभी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए मंदिर को एक प्राचीन धार्मिक स्थल के रूप में मान्यता दी है। अब मंदिर का प्रबंधन सरकारी देखरेख में होगा, जिससे वर्षों से चली आ रही प्रशासनिक अस्पष्टता का अंत हो गया है।
भविष्य की व्यवस्था
इस फैसले के बाद अब मंदिर की संपत्ति का प्रबंधन राजस्व विभाग की निगरानी में होगा। औकाफ विभाग को पुजारी की नियुक्ति करने का अधिकार प्राप्त है, जिससे मंदिर की दैनिक पूजा-अर्चना और व्यवस्था सुचारू रूप से चल सकेगी। अदालत ने सभी संबंधित पक्षों के दावों और अधिकारों का विस्तृत विश्लेषण करने के बाद यह संतुलन स्थापित किया है, जिससे मंदिर की पवित्रता और कानूनी स्वामित्व दोनों सुरक्षित हो गए हैं।
यह निर्णय न केवल खाचरौद के इस प्राचीन मंदिर के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि धार्मिक संपत्तियों के प्रबंधन से जुड़े कानूनी मामलों में भी एक नजीर के रूप में देखा जाएगा। 68 वर्षों के लंबे संघर्ष के बाद अब मंदिर के देवता को कानूनी रूप से संपत्ति का मालिक घोषित कर दिया गया है, जो इस मामले का सबसे महत्वपूर्ण कानूनी पहलू है।

Editor In Chief
मुश्ताक अहमद खान
टिप्पणियाँ (2)
- अअमित कुमार2 घंटे पहले
बहुत बढ़िया और संतुलित रिपोर्टिंग। FN News पर भरोसा बना रहता है।
- ससपना ठाकुर4 घंटे पहले
ग्वालियर-चंबल की खबरें इतनी डिटेल में और कहीं नहीं मिलतीं। शुक्रिया!