ब्रेकिंग
किशनगंज: अवैध लॉटरी के खिलाफ पुलिस की बड़ी कार्रवाई, 1690 टिकटों के साथ एक गिरफ्तारआगरा जनकपुरी: सफाई व्यवस्था में कोताही बरतने वाले 12 अधिकारियों पर गिरी गाज, जारी हुआ नोटिसभिंड: रोजगार मेले में युवाओं का जलवा, 94 फीसदी आवेदकों को मिली सफलतामुजफ्फरपुर से पटना तक फैला देह व्यापार का जाल, 2 नाबालिग बच्चियां मुक्त, 7 गिरफ्तारइंदौर: लेकपार्क कॉलोनी में प्लॉट के नाम पर 10 लाख की धोखाधड़ी, अध्यक्ष और संचालक पर FIRकानपुर: गणेश विसर्जन यात्रा पर दबंगों का हमला, बमबाजी और फायरिंग से मची अफरा-तफरीयमुना एक्सप्रेसवे बस हादसा: जान जोखिम में डालकर हासिर खान ने बचाई 14 यात्रियों की जिंदगीयमुना एक्सप्रेस-वे पर भीषण हादसा: चलती स्लीपर बस में लगी आग, 9 यात्रियों की दर्दनाक मौत
किशनगंज: अवैध लॉटरी के खिलाफ पुलिस की बड़ी कार्रवाई, 1690 टिकटों के साथ एक गिरफ्तारआगरा जनकपुरी: सफाई व्यवस्था में कोताही बरतने वाले 12 अधिकारियों पर गिरी गाज, जारी हुआ नोटिसभिंड: रोजगार मेले में युवाओं का जलवा, 94 फीसदी आवेदकों को मिली सफलतामुजफ्फरपुर से पटना तक फैला देह व्यापार का जाल, 2 नाबालिग बच्चियां मुक्त, 7 गिरफ्तारइंदौर: लेकपार्क कॉलोनी में प्लॉट के नाम पर 10 लाख की धोखाधड़ी, अध्यक्ष और संचालक पर FIRकानपुर: गणेश विसर्जन यात्रा पर दबंगों का हमला, बमबाजी और फायरिंग से मची अफरा-तफरीयमुना एक्सप्रेसवे बस हादसा: जान जोखिम में डालकर हासिर खान ने बचाई 14 यात्रियों की जिंदगीयमुना एक्सप्रेस-वे पर भीषण हादसा: चलती स्लीपर बस में लगी आग, 9 यात्रियों की दर्दनाक मौत

पूर्व विधायक विपिन वानखेड़े समेत 8 आरोपी बरी, कोर्ट ने कहा- पुलिस से बहस करना अपराध नहीं

इंदौर की विशेष सांसद-विधायक (MP-MLA) कोर्ट ने वर्ष 2020 में आगर-मालवा के बड़ौद थाने में दर्ज शासकीय कार्य में बाधा, धमकी और पुलिस से अभद्रता के मामले में पूर्व विधायक विपिन वानखेड़े समेत आठ आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित करने में असफल रहा।

मोहम्मद फ़ैज़ान

मोहम्मद फ़ैज़ान

संपादक

29 जुलाई 20263 मिनट पढ़ें
पूर्व विधायक विपिन वानखेड़े समेत 8 आरोपी बरी, कोर्ट ने कहा- पुलिस से बहस करना अपराध नहीं
मूल स्रोत

इंदौर की विशेष अदालत का बड़ा फैसला

इंदौर स्थित विशेष सांसद-विधायक (MP-MLA) अदालत ने वर्ष 2020 के एक चर्चित मामले में पूर्व विधायक विपिन वानखेड़े और उनके सात सहयोगियों को सभी आरोपों से बरी कर दिया है। यह मामला आगर-मालवा जिले के बड़ौद थाने में शासकीय कार्य में बाधा डालने, पुलिस के साथ अभद्रता करने और धमकी देने के आरोपों से संबंधित था। अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि अभियोजन पक्ष आरोपियों के खिलाफ लगे आरोपों को संदेह से परे साबित करने में पूरी तरह विफल रहा है।

अदालत ने अपने निर्णय में एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि किसी भी नागरिक या जनप्रतिनिधि का पुलिस अधिकारी से किसी मुद्दे पर सवाल पूछना, विरोध जताना या तर्क-वितर्क करना स्वतः ही शासकीय कार्य में बाधा डालने का अपराध नहीं माना जा सकता। न्यायाधीश ने स्पष्ट किया कि भारतीय दंड संहिता की धारा 353 के तहत अपराध तब सिद्ध होता है जब लोक सेवक को उसके कर्तव्य पालन से रोकने के लिए आपराधिक बल का प्रयोग किया गया हो, जो इस मामले में कहीं भी साबित नहीं हुआ।

साक्ष्यों और सीसीटीवी फुटेज की भूमिका

सुनवाई के दौरान अदालत ने घटना से संबंधित सीसीटीवी फुटेज और अन्य दस्तावेजी साक्ष्यों का बारीकी से परीक्षण किया। कोर्ट ने पाया कि फुटेज में कहीं भी ऐसी कोई स्थिति नहीं दिखी, जिसमें आरोपियों ने पुलिसकर्मियों के साथ धक्का-मुक्की या हाथापाई की हो। अभियोजन पक्ष द्वारा पेश किए गए सबूत घटनाक्रम की पुष्टि करने में असमर्थ रहे, जिसके चलते अदालत ने आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए दोषमुक्त कर दिया।

अदालत ने पुलिस जांच की कार्यप्रणाली पर भी असंतोष व्यक्त किया। बचाव पक्ष के अधिवक्ता आशीष एस. शर्मा ने तर्क दिया कि विपिन वानखेड़े एक जनप्रतिनिधि के रूप में केवल पुलिस के कार्यप्रणाली पर सवाल उठा रहे थे। अधिवक्ता ने कहा कि जनता के हित में उठाए गए किसी भी मुद्दे को अपराध का स्वरूप देना लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है। अदालत ने बचाव पक्ष के इन तर्कों को गंभीरता से लेते हुए माना कि पुलिस द्वारा पेश किए गए साक्ष्य आरोप सिद्ध करने के लिए पर्याप्त नहीं थे।

क्या था 2020 का पूरा मामला

यह मामला 23 नवंबर 2020 का है, जब तत्कालीन थाना प्रभारी ने बड़ौद थाने में शिकायत दर्ज कराई थी। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि तत्कालीन विधायक विपिन वानखेड़े अपने समर्थकों के साथ थाने पहुंचे और पुलिस कार्रवाई का विरोध करते हुए शासकीय कार्य में बाधा डाली। इस शिकायत के आधार पर पूर्व विधायक और उनके सात समर्थकों के खिलाफ विभिन्न धाराओं में मामला दर्ज किया गया था। पिछले छह वर्षों से यह मामला अदालत में विचाराधीन था।

अदालत के इस फैसले को जनप्रतिनिधियों के लिए एक राहत के रूप में देखा जा रहा है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय स्पष्ट करता है कि पुलिस के साथ केवल बहस या असहमति को आपराधिक कृत्य नहीं माना जा सकता, जब तक कि उसमें बल प्रयोग या हमले का कोई ठोस प्रमाण न हो। लंबे समय तक चली कानूनी प्रक्रिया के बाद, सभी आठ आरोपियों को सम्मानजनक राहत मिली है।

SponsoredMushfan Digital Studios - We Build Brands. We Grow Businesses.

टिप्पणियाँ (2)

  • अ
    अमित कुमार2 घंटे पहले

    बहुत बढ़िया और संतुलित रिपोर्टिंग। FN News पर भरोसा बना रहता है।

  • स
    सपना ठाकुर4 घंटे पहले

    ग्वालियर-चंबल की खबरें इतनी डिटेल में और कहीं नहीं मिलतीं। शुक्रिया!

संबंधित खबरें