दरभंगा सिविल कोर्ट में फर्जीवाड़ा: एमटीएस बनकर ट्रेनिंग ले रहे दो युवक और एपीपी गिरफ्तार
फर्जी पहचान पत्र के सहारे खुद को मल्टी टास्किंग स्टाफ (एमटीएस) बताकर लंबे समय से व्यवहार न्यायालय में प्रशिक्षण ले रहे दो युवकों को लहेरियासराय थाना पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। मामले में प्रशिक्षण देने वाले अपर लोक अभियोजक (एपीपी) अशोक कुमार को भी गिरफ्तार किया गया है।

मोहम्मद फ़ैज़ान
संपादक

दरभंगा सिविल कोर्ट में फर्जी पहचान पत्र का खुलासा
बिहार के दरभंगा स्थित व्यवहार न्यायालय (सिविल कोर्ट) में एक बड़े फर्जीवाड़े का मामला सामने आया है। लहेरियासराय थाना पुलिस ने दो ऐसे युवकों को गिरफ्तार किया है, जो फर्जी पहचान पत्र के आधार पर खुद को मल्टी टास्किंग स्टाफ (एमटीएस) बताकर लंबे समय से कोर्ट परिसर में प्रशिक्षण ले रहे थे। इस मामले में एक सरकारी वकील यानी अपर लोक अभियोजक (एपीपी) की संलिप्तता भी उजागर हुई है, जिन्हें पुलिस ने हिरासत में लेने के बाद गिरफ्तार कर लिया है।
पुलिस को 3 अगस्त की दोपहर गुप्त सूचना मिली थी कि कोर्ट परिसर में कुछ संदिग्ध व्यक्ति मौजूद हैं जो फर्जी आई-कार्ड का उपयोग कर रहे हैं। सूचना मिलते ही पुलिस टीम ने त्वरित कार्रवाई करते हुए दोनों युवकों को हिरासत में लिया। पूछताछ के दौरान यह चौंकाने वाली बात सामने आई कि वे 23 जून 2024 से ही कोर्ट के विभिन्न विभागों में एमटीएस के रूप में ट्रेनिंग ले रहे थे।
एपीपी की भूमिका और गिरोह की आशंका
गिरफ्तार युवकों की पहचान विकास कुमार यादव और मनोज कुमार के रूप में हुई है। पूछताछ में उन्होंने खुलासा किया कि उन्हें नौकरी दिलाने का झांसा देकर देव, नईमुद्दीन और अजय उर्फ अमन नामक व्यक्तियों ने फर्जी आई-कार्ड उपलब्ध कराए थे। इन युवकों को कोर्ट की कार्यप्रणाली सिखाने की जिम्मेदारी एपीपी अशोक कुमार को सौंपी गई थी। पुलिस ने जब एपीपी से पूछताछ की, तो उन्होंने स्वीकार किया कि उन्हें किसी के फोन पर इन युवकों को प्रशिक्षण देने के लिए कहा गया था।
पुलिस ने एपीपी की इस कार्रवाई को घोर लापरवाही और मिलीभगत माना है। जांच में यह भी स्पष्ट हुआ कि जिन आई-कार्ड्स का उपयोग किया जा रहा था, उन पर अंकित जारीकर्ता का पद और हस्ताक्षर पूरी तरह से फर्जी थे। कोर्ट प्रशासन और जिला विधिक सेवा प्राधिकार (डीएलएसए) से सत्यापन कराने पर पता चला कि ऐसे कोई भी दस्तावेज न्यायालय द्वारा कभी जारी ही नहीं किए गए थे।
कानूनी कार्रवाई और जांच का दायरा
इस मामले में लहेरियासराय थाने में भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की विभिन्न धाराओं के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई है। पुलिस ने कुल 7 नामजद आरोपियों के अलावा फर्जी आई-कार्ड बनाने वाले अज्ञात व्यक्तियों के खिलाफ भी केस दर्ज किया है। पुलिस को संदेह है कि यह मामला केवल दो युवकों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे नौकरी के नाम पर ठगी करने वाला एक बड़ा संगठित गिरोह सक्रिय हो सकता है।
कमतौल एसडीपीओ एसके सुमन ने बताया कि पुलिस इस पूरे नेटवर्क को खंगाल रही है। उन्होंने कहा कि कोर्ट जैसे संवेदनशील स्थान पर फर्जी दस्तावेजों के साथ प्रवेश और प्रशिक्षण लेना सुरक्षा में एक बड़ी चूक है। पुलिस अब उन सभी लोगों की तलाश कर रही है जिन्होंने इन युवकों को फर्जी नियुक्ति पत्र और आई-कार्ड मुहैया कराए थे।
आगे की कार्रवाई
फिलहाल गिरफ्तार किए गए तीनों आरोपियों को न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया है। पुलिस का कहना है कि जांच के दौरान जिन भी अन्य लोगों की संलिप्तता सामने आएगी, उनके खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी। तकनीकी साक्ष्यों और मोबाइल रिकॉर्ड्स के आधार पर पुलिस अब गिरोह के मुख्य सरगनाओं तक पहुंचने का प्रयास कर रही है ताकि इस तरह की घटनाओं की पुनरावृत्ति को रोका जा सके।

संपादक
मोहम्मद फ़ैज़ान
टिप्पणियाँ (2)
- अअमित कुमार2 घंटे पहले
बहुत बढ़िया और संतुलित रिपोर्टिंग। FN News पर भरोसा बना रहता है।
- ससपना ठाकुर4 घंटे पहले
ग्वालियर-चंबल की खबरें इतनी डिटेल में और कहीं नहीं मिलतीं। शुक्रिया!
