भोपाल नगर निगम में अनुदान का खेल: तीन साल में ढाई गुना बढ़ी फर्जी संस्थाएं, 60 फीसदी कागजों में सिमटी

मोहम्मद फ़ैज़ान
संपादक

अनुदान की सूची में संदिग्ध संस्थाओं की बाढ़
भोपाल नगर निगम में इन दिनों अनुदान वितरण को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। निगम प्रशासन और एमआईसी सदस्यों के बीच जारी खींचतान के बीच एक चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। पिछले तीन वर्षों के आंकड़ों पर गौर करें तो निगम से अनुदान प्राप्त करने वाली संस्थाओं की संख्या में ढाई गुना से अधिक का इजाफा हुआ है। वर्ष 2023-24 में जहां 143 संस्थाएं अनुदान सूची में शामिल थीं, वहीं 2026-27 तक यह आंकड़ा बढ़कर 383 तक पहुंच गया है।
हैरानी की बात यह है कि इन तीन वर्षों में 240 नई संस्थाओं को सूची में जोड़ा गया है। इन संस्थाओं के दावों की पड़ताल करने पर पता चला कि इनमें से करीब 60 प्रतिशत संस्थाएं केवल कागजों पर ही अस्तित्व में हैं। कई संस्थाओं के पंजीकृत पते पर न तो कोई कार्यालय मिला और न ही वहां किसी प्रकार की सामाजिक या शैक्षणिक गतिविधि संचालित होती पाई गई। इसके बावजूद, इन संस्थाओं को दो-दो लाख रुपये तक का अनुदान स्वीकृत किया गया।
बिना सत्यापन के मंजूरी की प्रक्रिया
अनुदान वितरण की प्रक्रिया पूरी तरह से सवालों के घेरे में है। वर्तमान व्यवस्था के तहत पार्षद, एमआईसी सदस्य और निगम अध्यक्ष की अनुशंसा पर संस्थाओं के नाम महापौर के पास भेजे जाते हैं। वहां से यह सूची सीधे वित्त शाखा तक पहुंचती है। प्रक्रिया में सबसे बड़ी खामी यह है कि जमीनी स्तर पर संस्थाओं के कामकाज का कोई सत्यापन नहीं किया जाता है और न ही दस्तावेजों की गहन जांच होती है। सीधे बजट पुस्तिका में नाम शामिल कर लिए जाते हैं।
इसके बाद जीएडी शाखा में आवेदन के माध्यम से अपर आयुक्त की स्वीकृति लेकर राशि जारी कर दी जाती है। निगम प्रशासन ने हाल ही में अनुदान की अधिकतम सीमा को एक लाख से बढ़ाकर दो लाख रुपये कर दिया था, जिससे इन फर्जी संस्थाओं की चांदी हो गई। उदाहरण के तौर पर, विट्ठल नगर स्थित 'आकाशदीप समिति' को एक लाख रुपये का अनुदान दिया गया, जबकि मौके पर पहुंचने पर पता चला कि वहां ऐसी कोई समिति ही नहीं है और मकान मालिक भी संस्था से अनजान हैं।
कागजी संस्थाओं का सच
पड़ताल में सामने आया कि 'युवा विकास मंडल' जैसी संस्थाएं, जो कागजों में बालिका शिक्षा, लाइब्रेरी और महिला काउंसलिंग का दावा करती हैं, उनका वास्तविक पता केवल एक आवासीय घर है। जब इस संस्था के बारे में जानकारी ली गई, तो पता चला कि इसका कामकाज भोपाल में है ही नहीं, बल्कि यह सीहोर, आष्टा और राजगढ़ जैसे दूरस्थ जिलों के नाम पर अनुदान ले रही थी। ऐसी स्थिति में निगम के फंड का दुरुपयोग स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है।
इस पूरे मामले ने निगम की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। बिना किसी भौतिक सत्यापन के सार्वजनिक धन का वितरण करना सीधे तौर पर वित्तीय अनियमितता की ओर इशारा करता है। निगम के भीतर चल रही इस बंदरबांट ने अब प्रशासनिक अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों के बीच टकराव की स्थिति पैदा कर दी है।
प्रशासनिक सख्ती और भविष्य की राह
मामले के तूल पकड़ने के बाद नगर निगम कमिश्नर संस्कृति जैन ने स्पष्ट किया है कि राज्य सरकार द्वारा 7 जुलाई 2021 को जारी गजट नोटिफिकेशन के तहत एमआईसी और महापौर के वित्तीय अधिकारों में बदलाव किए गए हैं। नए नियमों के अनुसार, एमआईसी और महापौर सीधे तौर पर संस्थाओं को अनुदान नहीं दे सकते हैं। इसी कारण चालू वित्तीय वर्ष में अभी तक किसी भी संस्था को राशि जारी नहीं की गई है।
कमिश्नर ने बताया कि वर्तमान में सभी नियमों की नए सिरे से जांच की जा रही है और संस्थाओं का भौतिक सत्यापन कराया जा रहा है। जब तक पूरी प्रक्रिया पारदर्शी और नियमों के अनुरूप नहीं हो जाती, तब तक अनुदान वितरण पर रोक जारी रहेगी। यह कदम उन फर्जी संस्थाओं के लिए बड़ा झटका है जो अब तक निगम के खजाने का लाभ उठा रही थीं।

संपादक
मोहम्मद फ़ैज़ान
टिप्पणियाँ (2)
- अअमित कुमार2 घंटे पहले
बहुत बढ़िया और संतुलित रिपोर्टिंग। FN News पर भरोसा बना रहता है।
- ससपना ठाकुर4 घंटे पहले
ग्वालियर-चंबल की खबरें इतनी डिटेल में और कहीं नहीं मिलतीं। शुक्रिया!
