बालाघाट: विधायक के हस्तक्षेप के बाद जिला अस्पताल में हुआ प्रसव, रेफर करने पर उठे सवाल
बालाघाट जिला अस्पताल में एक गर्भवती महिला की डिलीवरी विधायक के हस्तक्षेप के बाद की गई, जबकि पहले उसे हाईरिस्क बताकर रेफर कर दिया गया था। अब मां और नवजात बालिका दोनों स्वस्थ हैं।

मोहम्मद फ़ैज़ान
संपादक

मध्य प्रदेश के बालाघाट जिला अस्पताल में स्वास्थ्य सेवाओं की कार्यप्रणाली पर उस समय गंभीर सवाल खड़े हो गए, जब एक गर्भवती महिला को पहले 'हाईरिस्क' बताकर रेफर कर दिया गया, लेकिन बाद में विधायक के हस्तक्षेप के बाद उसी अस्पताल में उसका सफल ऑपरेशन किया गया। इस घटना ने आम मरीजों को रेफर करने की प्रक्रिया और अस्पताल प्रशासन की संवेदनशीलता पर कई प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं।
क्या था पूरा मामला?
जानकारी के अनुसार, प्रीति नाम की एक गर्भवती महिला को प्रसव पीड़ा के चलते गुरुवार को जिला अस्पताल के प्रसव वार्ड में भर्ती कराया गया था। शुक्रवार को अस्पताल के चिकित्सकों ने महिला की किडनी में पथरी होने और उसका आकार छोटा होने का हवाला देते हुए उसे 'हाईरिस्क' श्रेणी में डाल दिया। इसके बाद उसे जिला अस्पताल से रेफर कर दिया गया, जिससे परिजन घबरा गए और उन्हें समझ नहीं आया कि वे आगे क्या करें।
जब यह मामला स्थानीय विधायक अनुभा मुंजारे के संज्ञान में आया, तो उन्होंने इस पर कड़ी नाराजगी जताई। विधायक ने स्वयं अस्पताल पहुंचकर महिला और उसके परिजनों से मुलाकात की। उन्होंने अस्पताल प्रबंधन की कार्यशैली पर सवाल उठाते हुए कहा कि मरीजों को बिना ठोस कारण के रेफर करना उनकी जान के साथ खिलवाड़ है। विधायक के हस्तक्षेप के बाद महिला को पुनः जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया।
विधायक के दबाव में हुआ ऑपरेशन
विधायक की मौजूदगी और उनके कड़े रुख के बाद अस्पताल प्रशासन सक्रिय हुआ। डॉक्टरों ने महिला का समुचित उपचार शुरू किया और सीजेरियन ऑपरेशन के जरिए प्रसव कराया। राहत की बात यह रही कि मां और नवजात बच्ची दोनों पूरी तरह स्वस्थ हैं। इस घटना के बाद अस्पताल में मौजूद अन्य मरीजों और उनके परिजनों ने भी व्यवस्था को लेकर अपनी नाराजगी जाहिर की।
इस मामले पर सिविल सर्जन डॉ. निलय जैन ने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि महिला की स्थिति वास्तव में जटिल थी। उन्होंने दावा किया कि 'हाईरिस्क' होने के कारण ऑपरेशन के लिए परिजनों से सहमति मांगी गई थी, जो उस समय नहीं मिल पाई थी। हालांकि, परिजनों द्वारा बाद में सहमति दिए जाने के बाद ही ऑपरेशन की प्रक्रिया को अंजाम दिया गया।
व्यवस्था पर उठते सवाल
स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि जिला अस्पताल के पास संसाधन उपलब्ध थे और वे विधायक के हस्तक्षेप के बाद सुरक्षित प्रसव करा सकते थे, तो फिर पहले रेफर करने की जल्दबाजी क्यों की गई? यह सवाल अब चर्चा का विषय बना हुआ है कि क्या जिला अस्पताल में आम मरीजों को बिना किसी ठोस कारण के रेफर कर दिया जाता है। लोगों ने मांग की है कि अस्पताल प्रशासन को रेफर करने की प्रक्रिया में अधिक गंभीरता और पारदर्शिता बरतनी चाहिए।
इस घटना ने एक बार फिर सरकारी अस्पतालों में रेफरल सिस्टम की खामियों को उजागर कर दिया है। अक्सर देखा जाता है कि छोटे-मोटे कारणों से मरीजों को बड़े शहरों के अस्पतालों में रेफर कर दिया जाता है, जिससे गरीब परिवारों पर आर्थिक बोझ बढ़ता है। बालाघाट की इस घटना के बाद अब स्वास्थ्य विभाग के उच्च अधिकारियों से इस मामले की जांच और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने की मांग की जा रही है।
फिलहाल, मां और बच्चे के स्वस्थ होने से परिजनों ने राहत की सांस ली है, लेकिन जिला अस्पताल की कार्यप्रणाली को लेकर आम जनता में असंतोष बना हुआ है। विधायक द्वारा उठाए गए इस कदम ने अस्पताल प्रबंधन को भविष्य में मरीजों के प्रति अधिक संवेदनशील रहने का संदेश दिया है।

संपादक
मोहम्मद फ़ैज़ान
टिप्पणियाँ (2)
- अअमित कुमार2 घंटे पहले
बहुत बढ़िया और संतुलित रिपोर्टिंग। FN News पर भरोसा बना रहता है।
- ससपना ठाकुर4 घंटे पहले
ग्वालियर-चंबल की खबरें इतनी डिटेल में और कहीं नहीं मिलतीं। शुक्रिया!
