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बालाघाट: सरकारी फाइलों में 8 मौतें, हकीकत में 19 आदिवासी बच्चों ने तोड़ा दम; कुपोषण और मलेरिया का कहर

मोहम्मद नवेद

मोहम्मद नवेद

एडिटर

17 अगस्त 20263 मिनट पढ़ें
बालाघाट: सरकारी फाइलों में 8 मौतें, हकीकत में 19 आदिवासी बच्चों ने तोड़ा दम; कुपोषण और मलेरिया का कहर
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सरकारी दावों और जमीनी हकीकत में बड़ा अंतर

मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले के बिरसा ब्लॉक में कुपोषण और मलेरिया का प्रकोप लगातार बढ़ता जा रहा है। सरकारी रिकॉर्ड में हाल के दिनों में केवल 8 बच्चों की मौत दर्ज की गई है, जबकि जमीनी पड़ताल में यह आंकड़ा 19 तक पहुंच गया है। मातला और मछुरदा जैसे सुदूर गांवों में हुई कई मौतें आधिकारिक दस्तावेजों में कहीं भी दर्ज नहीं हैं, जिससे स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।

इन आदिवासी बहुल गांवों में स्थिति बेहद चिंताजनक है। ग्रामीणों का आरोप है कि पिछले छह महीनों से उन्हें पोषण आहार (टेक होम राशन) नहीं मिला है। इसके अलावा, पिछले पांच वर्षों से इन क्षेत्रों में मच्छरदानियों का वितरण भी न के बराबर हुआ है। बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव में ग्रामीण आज भी झाड़-फूंक और स्थानीय 'गुनिया' के भरोसे रहने को मजबूर हैं।

मातला और मछुरदा में मातम का मंजर

मातला गांव में तीन बच्चों की मौत हुई है, जिनमें से कई मामले रिकॉर्ड से गायब हैं। स्थानीय परिवारों का कहना है कि पोषण आहार न मिलने के कारण बच्चे शारीरिक रूप से बेहद कमजोर हो गए थे। एक परिवार ने बताया कि उनके बच्चों को तेज बुखार और शरीर पर दाने निकलने के बाद अस्पताल ले जाने का मौका भी नहीं मिला। वहां के निवासी आज भी जंगली भाजी और चावल पर निर्भर हैं, क्योंकि सरकारी नल-जल योजनाएं लंबे समय से ठप पड़ी हैं।

मछुरदा गांव की स्थिति भी इससे अलग नहीं है। यहां सगनू मरकाम जैसे कई पिता हैं जिन्होंने अपने बच्चों को खो दिया है। सगनू के अनुसार, यदि समय पर पोषण आहार मिलता तो शायद उनके बेटे की जान बच सकती थी। गांव में एक साल के रवनलाल और सात साल के कुंवरलाल की मौत भी सरकारी फाइलों में दर्ज नहीं की गई है। इन परिवारों को अब तक किसी भी प्रकार की सरकारी सहायता या मुआवजा नहीं मिल सका है।

प्रशासनिक चुनौतियां और मलेरिया का खतरा

बालाघाट कलेक्टर कुमार सत्यम का कहना है कि सभी 19 मौतों को एक साथ जोड़कर देखना उचित नहीं है, क्योंकि इनमें से कुछ मौतें पुरानी हो सकती हैं। प्रशासन का तर्क है कि नक्सल प्रभावित क्षेत्र होने के कारण स्वास्थ्य टीमों को ग्रामीणों को इलाज के लिए राजी करने में कठिनाई होती है। हालांकि, स्थानीय विधायक संजय उईके ने मलेरिया के मामलों में अचानक आई गिरावट पर संदेह जताते हुए इसे आंकड़ों को कम दिखाने का दबाव बताया है।

आंकड़ों के अनुसार, बालाघाट में पांच साल तक के करीब सवा लाख बच्चे हैं, जिनमें से 17 प्रतिशत कुपोषित या अति गंभीर कुपोषित हैं। मलेरिया के मामलों में भी बालाघाट की हिस्सेदारी प्रदेश में सबसे अधिक रही है। पिछले वर्षों में मलेरिया के मामलों में भारी उछाल देखा गया था, लेकिन इस साल जांच के तरीकों पर सवाल उठ रहे हैं। रैपिड किट के जरिए की जा रही जांच की गुणवत्ता पर भी विशेषज्ञ संशय जता रहे हैं।

आगे की राह और सामुदायिक प्रयास

सरकारी तंत्र की विफलता के बीच स्थानीय स्तर पर लोग खुद मदद के लिए आगे आ रहे हैं। बैगा समुदाय के युवक दुलेश्वर और उनके साथी चंदा इकट्ठा कर ग्रामीणों को मच्छरदानियां बांट रहे हैं। उनका मानना है कि यदि सरकार मदद नहीं कर रही है, तो उन्हें अपने लोगों को बचाने के लिए स्वयं कदम उठाने होंगे। यह पहल सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं के प्रति ग्रामीणों के भरोसे में आई कमी को भी दर्शाती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि बालाघाट के आदिवासी क्षेत्रों में कुपोषण का मुख्य कारण मोटे अनाज पर निर्भरता, सीमित शिक्षा और रोजगार के अवसरों की कमी है। टाटा इंस्टीट्यूट और रीजनल ट्राइबल रिसर्च इंस्टीट्यूट पहले ही इन क्षेत्रों में विटामिन और प्रोटीन की गंभीर कमी को लेकर चेतावनी दे चुके हैं। यदि समय रहते इन गांवों में पोषण आहार वितरण और स्वास्थ्य सेवाओं को सुदृढ़ नहीं किया गया, तो आने वाले दिनों में स्थिति और भी भयावह हो सकती है।

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टिप्पणियाँ (2)

  • अ
    अमित कुमार2 घंटे पहले

    बहुत बढ़िया और संतुलित रिपोर्टिंग। FN News पर भरोसा बना रहता है।

  • स
    सपना ठाकुर4 घंटे पहले

    ग्वालियर-चंबल की खबरें इतनी डिटेल में और कहीं नहीं मिलतीं। शुक्रिया!

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