22 साल जेल में बिताने के बाद निर्दोष साबित हुआ अर्जुन जानी, सुप्रीम कोर्ट ने व्यवस्था पर उठाए सवाल
Supreme Court slams Odisha High Court and trial court for wrongful conviction failure. सुप्रीम कोर्ट ने हत्या के आरोप में 22 साल जेल में रहे ओडिशा के अर्जुन जानी नाम के शख्स को बरी कर दिया। मंगलवार को जारी फैसले में कोर्ट ने इसे न्याय व्यवस्था की सामूहिक विफलता बताया।

मोहम्मद फ़ैज़ान
संपादक

न्याय प्रणाली की बड़ी विफलता: 22 साल बाद मिली आजादी
सुप्रीम कोर्ट ने एक अत्यंत संवेदनशील मामले में ओडिशा के अर्जुन जानी को हत्या के आरोपों से बरी कर दिया है। अर्जुन जानी ने अपनी जिंदगी के 22 बहुमूल्य साल जेल की सलाखों के पीछे बिताए। इस मामले में फैसला सुनाते हुए जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के विनोद चंद्रन की पीठ ने इसे न्याय व्यवस्था की सामूहिक विफलता करार दिया है। अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा कि ट्रायल कोर्ट ने सबूतों का सही मूल्यांकन नहीं किया और हाईकोर्ट भी इस मामले में मूकदर्शक बना रहा।
अर्जुन जानी पर तीन महिलाओं की हत्या का आरोप था, जिसके बाद उन्हें दोषी ठहराया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि जिस एकमात्र चश्मदीद की गवाही के आधार पर उन्हें सजा सुनाई गई थी, वह गवाही विरोधाभासों से भरी थी और पूरी तरह अविश्वसनीय थी। शीर्ष अदालत ने कहा कि किसी भी व्यक्ति को केवल एक संदिग्ध गवाही के आधार पर दोषी नहीं ठहराया जा सकता, जब तक कि वह साक्ष्य अन्य परिस्थितियों के साथ मेल न खाते हों।
अपील में देरी को लेकर हाईकोर्ट पर नाराजगी
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में ओडिशा हाईकोर्ट के रवैये पर भी गहरी नाराजगी जताई। जब अर्जुन जानी ने जेल से अपनी अपील दायर की थी, तब तक वे 12 साल जेल में काट चुके थे। हाईकोर्ट ने अपील में हुई 3157 दिनों की देरी को माफ करने से इनकार कर दिया था, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने मौलिक अधिकारों का उल्लंघन माना। पीठ ने टिप्पणी की कि जेल में बंद कैदियों के लिए न्याय तक पहुंच सुनिश्चित करना अदालत की जिम्मेदारी है और आजादी के मामलों में देरी को तकनीकी आधार पर खारिज नहीं किया जाना चाहिए।
अदालत ने कहा कि हाशिए पर रहने वाले लोगों के लिए न्याय पाना आज भी एक कठिन चुनौती है। जेल से आने वाली अपीलों के प्रति सक्रिय दृष्टिकोण अपनाना अनिवार्य है, क्योंकि यह किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़ा होता है, जो संविधान द्वारा प्रदत्त सबसे महत्वपूर्ण मौलिक अधिकार है।
बर्बाद हो चुकी जिंदगी और अनिश्चित भविष्य
22 साल की कैद के बाद जब अर्जुन जानी अपने गांव हिरलीडांगरी लौटे, तो वहां उनके लिए कुछ भी शेष नहीं था। 45 वर्षीय अर्जुन, जिन्हें गांव वाले टुनटुन के नाम से जानते हैं, अब पूरी तरह अकेले हैं। जेल से रिहाई के बाद जब वे अपने घर पहुंचे, तो वहां केवल झाड़ियां और खंडहर मिले। उनके परिवार में अब कोई नहीं बचा है और न ही उनके पास रहने के लिए कोई ठिकाना है।
स्थानीय लोगों के अनुसार, अर्जुन की मानसिक स्थिति भी इस लंबी कैद के कारण गहरे सदमे में है। वे अक्सर नदी किनारे या जंगलों में अकेले भटकते देखे जाते हैं। उनके पास न तो कोई सहारा है और न ही जीवन को दोबारा शुरू करने का कोई साधन। एक निर्दोष व्यक्ति के लिए 22 साल की सजा ने न केवल उनका वर्तमान छीना, बल्कि उनके पूरे भविष्य को भी अंधकारमय बना दिया है।
यह मामला देश की निचली अदालतों से लेकर उच्च न्यायालयों तक की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है। एक निर्दोष व्यक्ति का दो दशक से अधिक समय जेल में बिताना न केवल एक मानवीय त्रासदी है, बल्कि यह न्यायिक प्रक्रिया में सुधार की तत्काल आवश्यकता को भी रेखांकित करता है।

संपादक
मोहम्मद फ़ैज़ान
टिप्पणियाँ (2)
- अअमित कुमार2 घंटे पहले
बहुत बढ़िया और संतुलित रिपोर्टिंग। FN News पर भरोसा बना रहता है।
- ससपना ठाकुर4 घंटे पहले
ग्वालियर-चंबल की खबरें इतनी डिटेल में और कहीं नहीं मिलतीं। शुक्रिया!
