62 साल बाद मिली न्याय की जीत: पूर्व सैनिक की विधवा को मिलेगी पेंशन, ट्रिब्यूनल ने सुनाया फैसला
पंचकूला की चंडी मंदिर स्थित सशस्त्र सेना ट्रिब्यूनल (AFT) की रीजनल बेंच ने 62 साल पुराने पेंशन विवाद केस में मृत सैनिक की विधवा के पक्ष में फैसला सुनाया है। दादरी के फोगाट गांव निवासी ब्रह्मा देवी ने पति चांदराम के निधन के बाद पेंशन की डिमांड की थी।

मुश्ताक अहमद खान
Editor In Chief

छह दशक से लंबित था पेंशन का मामला
पंचकूला स्थित सशस्त्र सेना ट्रिब्यूनल (AFT) की रीजनल बेंच ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए 62 साल पुराने पेंशन विवाद का निपटारा कर दिया है। यह मामला चरखी दादरी के फोगाट गांव निवासी स्वर्गीय चांदराम फोगाट की पत्नी 85 वर्षीय ब्रह्मा देवी से जुड़ा था। दशकों तक चली कानूनी जद्दोजहद के बाद अब उन्हें पारिवारिक पेंशन का लाभ मिल सकेगा।
स्वर्गीय चांदराम फोगाट ने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान और उसके बाद भारतीय सेना में अपनी सेवाएं दी थीं। वर्ष 1954 में उन्हें सेना से कार्यमुक्त कर दिया गया था। उस समय सेना ने उनकी सेवा अवधि को पेंशन के लिए निर्धारित 15 वर्ष की न्यूनतम सीमा से कम माना था, जिसके कारण परिवार को पेंशन से वंचित रखा गया। ब्रह्मा देवी ने अपने पति के निधन के बाद इस अधिकार के लिए लंबी लड़ाई लड़ी।
युद्धकालीन सेवा ने बदली तस्वीर
मामले की सुनवाई के दौरान ट्रिब्यूनल के समक्ष यह तथ्य सामने आया कि चांदराम ने जून 1941 से सितंबर 1945 तक द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान सक्रिय सेवा दी थी। भारत सरकार के 1951 के नियमों के अनुसार, युद्ध के दौरान की सेवा को पेंशन गणना के लिए दोगुना गिना जाना अनिवार्य था। इस नियम को लागू करने पर उनकी कुल सेवा अवधि 16 वर्ष से अधिक हो गई, जो पेंशन पात्रता के लिए पर्याप्त थी।
ब्रह्मा देवी की ओर से पेश किए गए जाट रेजिमेंट के आधिकारिक रिकॉर्ड ने ट्रिब्यूनल को यह मानने पर मजबूर कर दिया कि उनकी पहली सेवा अवधि भी वैध थी। सेना ने पहले केवल 1948 से 1954 तक की सेवा को ही रिकॉर्ड में माना था, लेकिन ट्रिब्यूनल ने पुरानी सेवा को भी मान्यता देते हुए पेंशन की राह आसान कर दी।
परिवार के लिए बड़ी राहत
ब्रह्मा देवी के बेटे सतप्रकाश फोगाट, जो स्वयं सेना से सूबेदार पद से सेवानिवृत्त हैं, ने बताया कि उनके पिता को सेवा के दौरान वीरता के लिए पदक भी मिले थे। उन्होंने बताया कि 1954 में सेवामुक्ति के बाद उन्हें सम्मान स्वरूप बहुत मामूली राशि मिलती थी, जो महंगाई के साथ थोड़ी बढ़ती रही, लेकिन पेंशन का हक उन्हें कभी नहीं मिला। अब 85 वर्ष की आयु में मां को पेंशन मिलने से परिवार में खुशी का माहौल है।
ट्रिब्यूनल ने अपने आदेश में स्पष्ट किया है कि इतने पुराने मामले को देखते हुए पूरा बकाया (एरियर) नहीं दिया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट के एक पूर्व फैसले का हवाला देते हुए, ट्रिब्यूनल ने एरियर को पिछले तीन वर्षों तक सीमित रखने का निर्देश दिया है। इसके साथ ही अब ब्रह्मा देवी को आजीवन मासिक पेंशन का लाभ भी प्राप्त होगा।
कानूनी संघर्ष और निष्कर्ष
चांदराम फोगाट का निधन 1994 में हो गया था। उनकी पत्नी ने 2020 के बाद से पेंशन के लिए औपचारिक प्रयास तेज किए थे, लेकिन जब अधिकारियों ने दावे को खारिज कर दिया, तो 2021 में उन्होंने ट्रिब्यूनल का दरवाजा खटखटाया। पांच साल की लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद आखिरकार ट्रिब्यूनल ने सेना के अधिकारियों को पेंशन तय करने के निर्देश दे दिए हैं।
यह मामला उन हजारों पूर्व सैनिकों और उनके परिवारों के लिए एक नजीर है जो आज भी तकनीकी कारणों या रिकॉर्ड के अभाव में अपने पेंशन अधिकारों से वंचित हैं। ट्रिब्यूनल का यह निर्णय साबित करता है कि सही तथ्यों और दस्तावेजों के साथ न्याय की लड़ाई अंततः सफल होती है, भले ही उसमें दशकों का समय क्यों न लग जाए।

Editor In Chief
मुश्ताक अहमद खान
टिप्पणियाँ (2)
- अअमित कुमार2 घंटे पहले
बहुत बढ़िया और संतुलित रिपोर्टिंग। FN News पर भरोसा बना रहता है।
- ससपना ठाकुर4 घंटे पहले
ग्वालियर-चंबल की खबरें इतनी डिटेल में और कहीं नहीं मिलतीं। शुक्रिया!