101 साल के स्वतंत्रता सेनानी ताराचंद जैन की जुबानी: जेल में तिरंगा फहराने पर मिली यातनाएं, अंग्रेजों ने अखाड़ा रोकने के लिए मैदान में डलवाया मल-मूत्र
अगस्त 1947 को भारत आजाद हुआ। सागर में आजादी का पहला जश्न मनाया गया।

मोहम्मद नवेद
एडिटर

सागर की गलियों से आजादी के आंदोलन तक का सफर
सागर के इतवारा बाजार में पले-बढ़े 101 वर्षीय स्वतंत्रता संग्राम सेनानी ताराचंद जैन आज भी आजादी की लड़ाई की उन यादों को जीवंत रखते हैं, जब महज 16 साल की उम्र में उन्होंने अंग्रेजी हुकूमत को चुनौती दी थी। 1942 में महात्मा गांधी के 'भारत छोड़ो आंदोलन' के आह्वान ने उनके भीतर देशभक्ति की ऐसी अलख जगाई कि वे स्कूल के छात्रों को संगठित कर सड़कों पर उतर आए।
ताराचंद जैन बताते हैं कि उस दौर में राजनीति की समझ न होने के बावजूद, यमुना ताई जैसे शिक्षकों से प्रेरित होकर उन्होंने सैकड़ों छात्रों का कारवां तैयार किया। तीनबत्ती से कलेक्टोरेट तक निकाली गई रैलियों में उन्हें कई बार पुलिस की लाठियों का सामना करना पड़ा और गिरफ्तारियों के बाद जंगलों में छोड़ा गया, लेकिन उनका हौसला कम नहीं हुआ।
जेब में छिपाया तिरंगा और पुलिस के सामने फहराया
9 अक्टूबर 1942 का दिन उनके जीवन का सबसे साहसी पल था। बस स्टैंड पर आयोजित सभा के दौरान उन्होंने अपनी जेब में तिरंगा छिपाकर रखा था। जैसे ही मौका मिला, वे स्टूल पर चढ़ गए और अंग्रेजों की भारी मौजूदगी के बीच तिरंगा फहरा दिया। इस घटना के तुरंत बाद उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और उन पर मुकदमा चलाया गया।
जेल में उन्हें 'मिर्ची' कहकर संबोधित किया गया, क्योंकि पुलिस अधिकारी उन्हें आंदोलन की जड़ मानते थे। छह महीने की सजा के दौरान उन्हें जेल में कीड़े वाली दाल और कच्ची रोटियां दी गईं। जब उन्होंने जेल की ड्रेस पहनने से इनकार किया और विरोध में नारेबाजी की, तो उनकी आवाज नागपुर तक गूंज उठी।
अखाड़ा रोकने के लिए अंग्रेजों की ओछी हरकतें
जेल के भीतर भी उनका संघर्ष जारी रहा। कैदियों ने व्यायाम के लिए एक अखाड़ा बनाया था, जिसे देखकर अंग्रेज अधिकारी बौखला गए। पहले उन्होंने अखाड़े में पत्थर डलवा दिए, और जब कैदियों ने पत्थर हटा दिए, तो एसपी ने अखाड़े के मैदान में मल-मूत्र डलवा दिया ताकि वे वहां व्यायाम न कर सकें। यह यातनाएं देने का एक तरीका था, लेकिन सेनानियों का मनोबल नहीं टूटा।
1 अप्रैल 1943 को रिहाई के बाद भी वे अंग्रेजों के खिलाफ सक्रिय रहे। 15 अगस्त 1947 की रात जब देश आजाद हुआ, तो सागर में पुलिस ट्रेनिंग एकेडमी के किले में हुई आतिशबाजी और लोगों के उत्साह को देखकर उन्हें लगा कि उनका संघर्ष सफल हो गया।
सम्मान निधि को लेकर जताई चिंता
आज 101 वर्ष की आयु में ताराचंद जैन को देश की प्रगति पर गर्व है, लेकिन स्वतंत्रता सेनानियों की वर्तमान स्थिति को लेकर उनके मन में टीस है। उनका मानना है कि सरकार को सेनानियों की सम्मान निधि पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। वे कहते हैं कि नेताओं का मानदेय बढ़ाने के लिए सदन में सहमति बन जाती है, लेकिन सेनानियों को मिलने वाली 30 हजार रुपये की राशि आज के दौर में बहुत कम है।
ताराचंद जैन का मानना है कि तिरंगा केवल एक झंडा नहीं, बल्कि उनके संघर्ष और उन साथियों की याद है जिन्होंने आजादी के लिए अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया। उन्होंने कहा कि उन्होंने आजादी की कहानी किताबों में नहीं पढ़ी, बल्कि उसे अपनी आंखों से जिया है।

एडिटर
मोहम्मद नवेद
टिप्पणियाँ (2)
- अअमित कुमार2 घंटे पहले
बहुत बढ़िया और संतुलित रिपोर्टिंग। FN News पर भरोसा बना रहता है।
- ससपना ठाकुर4 घंटे पहले
ग्वालियर-चंबल की खबरें इतनी डिटेल में और कहीं नहीं मिलतीं। शुक्रिया!