रेप केस की सुनवाई में जजों के लिए नई गाइडलाइन: चरित्र और कपड़ों पर टिप्पणी नहीं, सिर्फ सबूतों पर होगा फैसला
Supreme Court latest guidelines for judges on rape cases, hearing, and evidence. सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी (NJA) ने एक गाइडलाइन जारी की है। एक्सपर्ट कमेटी के मुताबिक जजों को पीड़ित के चरित्र, कपड़ों, जीवनशैली, नैतिक धारणाओं के बजाय केवल सबूतों पर फैसला देने की सलाह दी गई है।

मोहम्मद फ़ैज़ान
संपादक

देश की अदालतों में यौन उत्पीड़न और दुष्कर्म जैसे संवेदनशील मामलों की सुनवाई के दौरान अब जजों को भाषा और व्यवहार के प्रति अधिक सतर्क रहना होगा। राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी (NJA) ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद एक विस्तृत गाइडलाइन जारी की है। इस नई नियमावली का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि न्याय प्रक्रिया के दौरान पीड़ित की गरिमा बनी रहे और फैसला पूरी तरह से कानूनी साक्ष्यों पर आधारित हो, न कि किसी के निजी जीवन या सामाजिक धारणाओं पर।
सबूतों को प्राथमिकता, चरित्र पर टिप्पणी वर्जित
नई गाइडलाइन में स्पष्ट किया गया है कि किसी भी मामले में फैसला सुनाते समय जज पीड़ित के पहनावे, जीवनशैली, चरित्र या नैतिक मान्यताओं को आधार नहीं बनाएंगे। अक्सर अदालती कार्यवाही के दौरान ऐसे सवाल उठाए जाते हैं जो पीड़ित को ही कटघरे में खड़ा कर देते हैं, जिसे रोकने के लिए यह कदम उठाया गया है। अब अदालतों को केवल उन तथ्यों और सबूतों पर ध्यान केंद्रित करने का निर्देश दिया गया है जो सीधे तौर पर अपराध से जुड़े हैं।
इसके अलावा, अदालती फैसलों और सुनवाई के दौरान इस्तेमाल होने वाली शब्दावली में भी बड़ा बदलाव किया गया है। जजों को 'लज्जा भंग', 'हवस', 'पवित्रता', 'बेबस महिला' और 'इज्जत' जैसे शब्दों के प्रयोग से बचने की सलाह दी गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के शब्दों का इस्तेमाल न केवल लैंगिक रूढ़ियों को बढ़ावा देता है, बल्कि पीड़ित के मानसिक आघात को भी गहरा करता है।
न्यायिक संवेदनशीलता और निष्पक्षता का आधार
इस गाइडलाइन को तैयार करने वाली एक्सपर्ट कमेटी की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस अनिरुद्ध बोस ने की थी। रिपोर्ट में कहा गया है कि न्यायिक भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं है, बल्कि यह निष्पक्ष न्याय का आधार है। असंवेदनशील टिप्पणियां अक्सर सर्वाइवर्स को न्याय प्रक्रिया से दूर कर देती हैं और उन्हें दोबारा आघात पहुंचाती हैं। इसलिए, अदालतों को तटस्थ और सर्वाइवर-सेंट्रिक भाषा अपनाने की आवश्यकता है।
यह कदम सुप्रीम कोर्ट के 10 फरवरी 2026 के उस आदेश के बाद उठाया गया है, जिसमें अदालतों को जेंडर स्टीरियोटाइप्स (लैंगिक रूढ़ियों) से दूर रहने का निर्देश दिया गया था। इलाहाबाद और पटना हाईकोर्ट के कुछ विवादास्पद फैसलों के बाद यह महसूस किया गया कि कानूनी पड़ताल के बिना की गई टिप्पणियां न्याय के मूल सिद्धांतों के खिलाफ हैं।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और सुधार की प्रक्रिया
न्यायिक शब्दावली में सुधार की यह पहल पूर्व मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ के कार्यकाल में शुरू हुई थी। 2023 में महिला दिवस के अवसर पर उन्होंने कई ऐसे फैसलों का जिक्र किया था, जिनमें महिलाओं के लिए अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल किया गया था। इसके बाद एक विशेष हैंडबुक तैयार की गई थी, जिसे अब और अधिक व्यापक बनाकर भारतीय सामाजिक संदर्भ के अनुरूप नई गाइडलाइन के रूप में लागू किया गया है।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि जजों को किसी भी मामले में सुनवाई के दौरान गहरी कानूनी रिसर्च करनी चाहिए। बिना ठोस आधार के की गई टिप्पणियां न केवल पीड़ित को डराती हैं, बल्कि कई बार शिकायतकर्ता को अपना केस वापस लेने के लिए मजबूर भी कर देती हैं। नई गाइडलाइन का उद्देश्य अदालतों को एक ऐसा सुरक्षित स्थान बनाना है जहाँ न्याय बिना किसी पूर्वाग्रह के मिल सके।
देश भर की सभी निचली और उच्च अदालतों को इन निर्देशों का पालन करने का आदेश दिया गया है। यह बदलाव भारतीय न्याय प्रणाली में एक महत्वपूर्ण सुधार के रूप में देखा जा रहा है, जिससे भविष्य में जेंडर-न्यूट्रल और अधिक संवेदनशील न्यायिक वातावरण तैयार होने की उम्मीद है।

संपादक
मोहम्मद फ़ैज़ान
टिप्पणियाँ (2)
- अअमित कुमार2 घंटे पहले
बहुत बढ़िया और संतुलित रिपोर्टिंग। FN News पर भरोसा बना रहता है।
- ससपना ठाकुर4 घंटे पहले
ग्वालियर-चंबल की खबरें इतनी डिटेल में और कहीं नहीं मिलतीं। शुक्रिया!
