सिवनी में आवारा कुत्तों की नसबंदी पर खर्च हुए 26 लाख, फिर भी सड़कों पर दिख रहे झुंड
सिवनी शहर में आवारा श्वानों की समस्या बनी हुई है। नगर पालिका के आंकड़ों के अनुसार, पिछले दो वर्षों में आवारा श्वानों की नसबंदी पर 26.20 लाख रुपए खर्च किए गए हैं।

मोहम्मद फ़ैज़ान
संपादक

मध्य प्रदेश के सिवनी शहर में आवारा कुत्तों की बढ़ती संख्या और उनके आतंक से आम नागरिक परेशान हैं। नगर पालिका द्वारा पिछले दो वर्षों में इन श्वानों की नसबंदी के नाम पर लाखों रुपये खर्च किए जाने के दावे किए गए हैं, लेकिन जमीनी हकीकत इन आंकड़ों से मेल नहीं खाती। शहर की सड़कों, गलियों और प्रमुख चौराहों पर आज भी कुत्तों के झुंड बेखौफ घूमते नजर आते हैं, जिससे स्थानीय निवासियों में आक्रोश है।
दो साल में 26 लाख से अधिक का खर्च
नगर पालिका के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2024 में एबीसी संस्था को नसबंदी का जिम्मा सौंपा गया था। पहले चरण में प्रति श्वान 1120 रुपये की दर से लगभग 1000 कुत्तों की नसबंदी का दावा किया गया, जिसके लिए 11.20 लाख रुपये का भुगतान हुआ। इसके बाद, दूसरे चरण में प्रति श्वान 1500 रुपये की दर से पुनः 1000 कुत्तों की नसबंदी के लिए 15 लाख रुपये खर्च किए गए। इस प्रकार, दो वर्षों में कुल 26.20 लाख रुपये का भारी-भरकम बजट खर्च किया गया है।
इतनी बड़ी राशि खर्च होने के बावजूद शहर में कुत्तों की संख्या में कोई कमी नहीं आई है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि वास्तव में 2000 कुत्तों की नसबंदी हुई होती, तो सड़कों पर इनका प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता। इसके विपरीत, कई इलाकों में कुत्तों के झुंड पहले से अधिक आक्रामक और सक्रिय दिखाई दे रहे हैं, जिससे कार्य की गुणवत्ता और पारदर्शिता पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।
आमजन की सुरक्षा पर मंडराता खतरा
शहर के निवासी विशेषकर सुबह और रात के समय घर से निकलने में डर महसूस करते हैं। मॉर्निंग वॉक पर जाने वाले बुजुर्गों, स्कूली बच्चों और दोपहिया वाहन चालकों के लिए ये झुंड मुसीबत का सबब बने हुए हैं। कई बार कुत्तों के पीछे दौड़ने के कारण वाहन चालक अपना संतुलन खोकर गिर जाते हैं, जिससे दुर्घटनाएं हो रही हैं। इसके अलावा, रेबीज के खतरे ने भी लोगों की चिंताएं बढ़ा दी हैं।
पूर्व में भोमा के पास समनापुर गांव में कुत्तों के हमले से एक बालिका की दुखद मौत के बाद प्रशासन ने कुछ समय के लिए सख्ती दिखाई थी, लेकिन वह कार्रवाई भी समय के साथ ठंडे बस्ते में चली गई। निवासियों का आरोप है कि नसबंदी किए गए कुत्तों की टैगिंग और रिकॉर्ड का कोई अता-पता नहीं है, जिससे अनियमितता की आशंका गहराती जा रही है।
प्रशासन का पक्ष और भविष्य की राह
इस मामले पर नगर पालिका सीएमओ दिशा डहेरिया ने स्पष्ट किया कि केवल कुत्तों को पकड़कर छोड़ देना इस समस्या का स्थायी समाधान नहीं है। उन्होंने कहा कि इसके लिए एनीमल बर्थ कंट्रोल (एबीसी) सेंटर के माध्यम से वैज्ञानिक प्रक्रिया अपनाना अनिवार्य है। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि उनके पास पूर्व में हुए कार्यों का विस्तृत रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है, लेकिन वर्तमान में इस प्रोजेक्ट पर काम जारी है।
अब शहरवासियों ने मांग की है कि नसबंदी किए गए श्वानों की संख्या, उनकी टैगिंग और किए गए खर्च का पूरा ब्यौरा सार्वजनिक किया जाए। लोगों का कहना है कि जब तक काम की गुणवत्ता की निगरानी नहीं होगी और संवेदनशील इलाकों में स्थायी व्यवस्था नहीं की जाएगी, तब तक लाखों रुपये खर्च करने का कोई सार्थक परिणाम नहीं निकलेगा।

संपादक
मोहम्मद फ़ैज़ान
टिप्पणियाँ (2)
- अअमित कुमार2 घंटे पहले
बहुत बढ़िया और संतुलित रिपोर्टिंग। FN News पर भरोसा बना रहता है।
- ससपना ठाकुर4 घंटे पहले
ग्वालियर-चंबल की खबरें इतनी डिटेल में और कहीं नहीं मिलतीं। शुक्रिया!