राजस्थान: राज्य की जमीनों को नगर निकायों के नाम करने के सरकारी आदेश पर हाईकोर्ट की रोक

मोहम्मद नवेद
एडिटर

सरकारी आदेश पर हाईकोर्ट की अंतरिम रोक
राजस्थान हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के 17 अप्रैल 2025 के उस विवादास्पद आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी है, जिसके तहत राज्य के स्वामित्व वाली विभिन्न प्रकार की जमीनों को नगर निकायों के नाम दर्ज करने और उन्हें 'गैर मुमकिन आबादी' घोषित करने का प्रावधान किया गया था। कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश संजीव प्रकाश शर्मा और न्यायाधीश संजीत पुरोहित की खंडपीठ ने वन्य जीव जंतु सेवार्थ फाउंडेशन द्वारा दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए यह निर्देश जारी किए हैं।
अदालत ने प्रथम दृष्टया माना कि यदि सरकार का यह आदेश प्रभावी रहता है, तो भविष्य में राज्य की भूमि के स्वामित्व और उपयोग को लेकर जटिल कानूनी स्थितियां पैदा हो सकती हैं। खंडपीठ ने राज्य सरकार को इस मामले में नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। साथ ही, अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि सरकार चाहे तो इस अंतरिम आदेश में संशोधन या इसे हटाने के लिए उचित आवेदन प्रस्तुत कर सकती है।
प्रभावित क्षेत्रों का व्यापक दायरा
राज्य सरकार के इस आदेश का असर प्रदेश के हजारों गांवों पर पड़ने की संभावना थी। आंकड़ों के अनुसार, राजस्थान में जयपुर, जोधपुर, उदयपुर, अजमेर, कोटा, बीकानेर और भरतपुर जैसे प्रमुख विकास प्राधिकरणों के अंतर्गत ही लगभग 2,300 से अधिक गांव आते हैं। इसके अतिरिक्त, प्रदेश की 10 यूआईटी के दायरे में 150 गांव और 310 नगर पालिकाओं, नगर परिषदों व नगर निगमों के अधिकार क्षेत्र में करीब 6,000 गांव शामिल हैं। इस प्रकार, कुल मिलाकर लगभग 10,000 गांवों की भूमि पर इस आदेश का सीधा प्रभाव पड़ सकता था।
अदालत ने इस मामले की गंभीरता को समझते हुए सरकार को निर्देश दिया है कि जब तक मामले की सुनवाई पूरी नहीं हो जाती, तब तक यथास्थिति बनाए रखी जाए। यह आदेश उन सभी क्षेत्रों के लिए महत्वपूर्ण है जहां विकास प्राधिकरणों और नगर निकायों का विस्तार किया जा रहा है।
पैरोल नियमों की न्यायिक समीक्षा और अन्य मामले
इसी खंडपीठ ने एक अन्य मामले में जेल में बंद महिला कैदी की मृत्यु के बाद राज्य के पैरोल नियमों पर स्वतः संज्ञान लिया है। बीकानेर जेल में बंद 57 वर्षीय मंजू देवी की बीमारी के चलते मृत्यु हो गई थी, जिन्हें आपातकालीन पैरोल नहीं मिल सकी थी। अदालत ने इसे जिला मजिस्ट्रेट की असंवेदनशीलता और नियमों की संकीर्ण व्याख्या का परिणाम बताया है। अब हाईकोर्ट इन नियमों की न्यायिक समीक्षा करेगा।
इसके अलावा, अदालत ने एक गंभीर आपराधिक मामले में फांसी की सजा को आजीवन कारावास में बदल दिया है। तीन वर्षीय बालिका के अपहरण और हत्या के मामले में आरोपी की दोषसिद्धि तो बरकरार रखी गई, लेकिन सजा को 'प्राकृतिक जीवन के शेष समय तक' के लिए आजीवन कारावास में संशोधित कर दिया गया है।
पांचना बांध और कुंभलगढ़ पर महत्वपूर्ण निर्देश
पांचना बांध से पानी छोड़ने के विवाद से जुड़ी जनहित याचिका को अदालत ने जिला कलेक्टर द्वारा शपथ पत्र पेश किए जाने के बाद निस्तारित कर दिया है। पिछली सुनवाई में अदालत ने पानी नहीं छोड़े जाने पर कड़ी नाराजगी जताई थी और अधिकारियों को पेश होने के निर्देश दिए थे। राज्य सरकार द्वारा अनुपालन सुनिश्चित करने के बाद मामले को बंद कर दिया गया।
वहीं, कुंभलगढ़ क्षेत्र के ग्रामीणों को बड़ी राहत देते हुए हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि वहां के निवासी अपने पुराने मकानों की मरम्मत और मौजूदा ढांचे का विस्तार कर सकते हैं। हालांकि, अदालत ने यह भी साफ कर दिया कि नई नींव डालकर नए निर्माण करने की अनुमति नहीं होगी और पुरातात्विक स्थलों पर किसी भी प्रकार का अतिक्रमण बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

एडिटर
मोहम्मद नवेद
टिप्पणियाँ (2)
- अअमित कुमार2 घंटे पहले
बहुत बढ़िया और संतुलित रिपोर्टिंग। FN News पर भरोसा बना रहता है।
- ससपना ठाकुर4 घंटे पहले
ग्वालियर-चंबल की खबरें इतनी डिटेल में और कहीं नहीं मिलतीं। शुक्रिया!
