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ओमान में फंसा रायसेन का युवक: इमामत के नाम पर ले गए, टॉयलेट साफ कराए और पासपोर्ट छीना

Raisen youth trapped in Oman facing forced labor and severe exploitation. मैं मस्जिद में इमामत कराने गया था, लेकिन वहां पहुंचते ही मुझे 30 से 40 कमरों वाले मिनिस्ट्री ऑफिस की सफाई में लगा दिया गया। रोज टॉयलेट साफ करता था, बर्तन धोता था, 14-15 घंटे काम करता था।

मोहम्मद फ़ैज़ान

मोहम्मद फ़ैज़ान

संपादक

1 अगस्त 20263 मिनट पढ़ें 905
ओमान में फंसा रायसेन का युवक: इमामत के नाम पर ले गए, टॉयलेट साफ कराए और पासपोर्ट छीना
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मध्य प्रदेश के रायसेन जिले के दीवानगंज निवासी मोहम्मद फैजान की ओमान यात्रा एक बुरे सपने में बदल गई। धार्मिक सेवा और इमामत के नाम पर विदेश गए फैजान को वहां बंधक बनाकर अमानवीय परिस्थितियों में काम करने के लिए मजबूर किया गया। करीब ढाई महीने तक चले इस संघर्ष के बाद, भोपाल के सामाजिक कार्यकर्ता की मदद और विदेश मंत्रालय के हस्तक्षेप से फैजान सुरक्षित अपने घर लौट आए हैं।

धोखे की शुरुआत: इमामत का वादा और लाखों की वसूली

फैजान की आपबीती जनवरी 2026 में शुरू हुई, जब उनकी मुलाकात एक एजेंट से हुई। एजेंट ने उन्हें ओमान की एक मस्जिद में इमामत करने का प्रलोभन दिया। इस काम के लिए एजेंट ने पहले 20 हजार रुपये लिए और बाद में मेडिकल प्रक्रिया के नाम पर 1 लाख 80 हजार रुपये और ऐंठ लिए। परिवार ने कर्ज लेकर करीब 2 लाख रुपये का इंतजाम किया, ताकि फैजान का भविष्य संवर सके। 4 मई 2026 को फैजान मस्कट पहुंचे, लेकिन वहां पहुंचते ही हकीकत उनके सपनों से बिल्कुल उलट थी।

मस्कट पहुंचने पर कंपनी ने उन्हें दो-तीन दिन अपने पास रखा और फिर एक सरकारी मिनिस्ट्री ऑफिस भेज दिया। वहां उन्हें इमामत का काम देने के बजाय 30 से 40 कमरों वाले ऑफिस की सफाई में लगा दिया गया। फैजान को रोज टॉयलेट, बाथरूम और बर्तन धोने जैसे काम करने पड़े। उनसे दिन में 14 से 15 घंटे तक काम कराया जाता था, जबकि उन्हें न तो वेतन दिया गया और न ही खाने के लिए पर्याप्त पैसे।

भूख और कैद का दर्द

काम के बदले पैसे मांगने पर कंपनी के लोग उन्हें टालते रहे और धीरे-धीरे स्थिति इतनी खराब हो गई कि फैजान कई दिनों तक भूखे रहने को मजबूर हो गए। मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना के बीच उन्होंने कई बार आत्महत्या जैसे विचार आने की बात कही है। जब उन्होंने एजेंट से संपर्क करने की कोशिश की, तो उसने उनका नंबर ब्लॉक कर दिया। कंपनी ने उनका पासपोर्ट भी अपने कब्जे में ले लिया था और भारत लौटने के लिए 650 रियाल की मांग की गई।

इस कठिन समय में मस्कट में रह रहे कुछ भारतीयों ने फैजान की मदद की। नवाब भाई और मोहम्मद खलील अहमद जैसे लोगों ने उन्हें भोजन उपलब्ध कराया और खलील अहमद ने उन्हें करीब डेढ़ महीने तक अपने घर में शरण दी, जिससे फैजान को संबल मिला।

दूतावास के हस्तक्षेप से मिली आजादी

जुलाई के मध्य में यह मामला भोपाल के सामाजिक कार्यकर्ता सैयद आबिद हुसैन के संज्ञान में आया। उन्होंने तुरंत भारतीय दूतावास और विदेश मंत्रालय के अधीन भारतीय प्रवासी सहायता केंद्र को शिकायत भेजी। दूतावास ने मामले की गंभीरता को देखते हुए त्वरित कार्रवाई की और लेबर कोर्ट के माध्यम से फैजान के लिए एग्जिट परमिट हासिल किया। 28 जुलाई की रात फैजान मुंबई पहुंचे और 30 जुलाई को अपने घर दीवानगंज सुरक्षित लौट आए।

सामाजिक कार्यकर्ता सैयद आबिद हुसैन, जो अब तक विदेशों में फंसे करीब 1500 भारतीयों की मदद कर चुके हैं, का कहना है कि सही समय पर दस्तावेजी साक्ष्यों के साथ शिकायत करने पर दूतावास प्रभावी कदम उठाता है। फैजान का मामला इस बात का प्रमाण है कि विदेश जाने से पहले एजेंटों की विश्वसनीयता की जांच करना कितना आवश्यक है।

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टिप्पणियाँ (2)

  • अमित कुमार2 घंटे पहले

    बहुत बढ़िया और संतुलित रिपोर्टिंग। FN News पर भरोसा बना रहता है।

  • सपना ठाकुर4 घंटे पहले

    ग्वालियर-चंबल की खबरें इतनी डिटेल में और कहीं नहीं मिलतीं। शुक्रिया!

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