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साइबर फ्रॉड के मामलों में बैंक खाते फ्रीज करने पर हाईकोर्ट सख्त, जारी की नई गाइडलाइन

केवल विवादित रकम पर ही लगाएं लियन, पूरा खाता फ्रीज करना अंतिम विकल्प. पूरे खाते को फ्रीज करना केवल असाधारण परिस्थितियों में ही किया जा सकता है।

मोहम्मद फ़ैज़ान

मोहम्मद फ़ैज़ान

संपादक

28 जुलाई 20263 मिनट पढ़ें
साइबर फ्रॉड के मामलों में बैंक खाते फ्रीज करने पर हाईकोर्ट सख्त, जारी की नई गाइडलाइन
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मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने साइबर अपराध की जांच के दौरान बैंक खातों को फ्रीज करने की प्रक्रिया को लेकर एक अत्यंत महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। जबलपुर हाईकोर्ट की एकलपीठ ने स्पष्ट किया है कि महज एक छोटी राशि के संदिग्ध लेन-देन के आधार पर पूरे बैंक खाते को फ्रीज करना न्यायसंगत नहीं है। कोर्ट ने जांच एजेंसियों और बैंकों के लिए विस्तृत दिशा-निर्देश जारी करते हुए कहा है कि भविष्य में केवल विवादित राशि पर ही रोक लगाई जानी चाहिए।

980 रुपये के लिए फ्रीज हुआ 2.51 करोड़ का खाता

यह मामला भोपाल की एक महिला कारोबारी अर्चना शिवहरे से जुड़ा है। याचिकाकर्ता का एक चालू बैंक खाता है, जिसका उपयोग वह अपने शराब व्यवसाय के वित्तीय लेन-देन के लिए करती हैं। अप्रैल 2026 में स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की इटारसी शाखा ने बिना किसी पूर्व सूचना के उनका खाता फ्रीज कर दिया। जांच में सामने आया कि यह कार्रवाई महज 980 रुपये के एक संदिग्ध साइबर ट्रांजेक्शन के आधार पर की गई थी, जबकि खाते में 2.51 करोड़ रुपये से अधिक की वैध राशि जमा थी। याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट में इस कार्रवाई को चुनौती देते हुए तर्क दिया कि संदिग्ध राशि के मुकाबले पूरे खाते को फ्रीज करना उनके व्यवसाय के लिए घातक है।

जस्टिस हिमांशु जोशी की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि जांच एजेंसियां अपनी शक्तियों का प्रयोग करते समय विवेक का इस्तेमाल करें। कोर्ट ने टिप्पणी की कि पूरे खाते को फ्रीज करना एक असाधारण कदम है, जिसे केवल तभी अपनाया जाना चाहिए जब कोई अन्य विकल्प न हो। यदि संदिग्ध लेन-देन की राशि सीमित है, तो जांच के लिए केवल उतनी ही राशि पर लियन या डेबिट फ्रीज लगाया जाना चाहिए।

बैंकों और जांच एजेंसियों के लिए नई गाइडलाइन

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि बैंक केवल आदेश का पालन करने वाली संस्था नहीं हैं, बल्कि उन्हें खाताधारक के प्रति भी जवाबदेह होना चाहिए। बैंकों को निर्देश दिया गया है कि वे खाता फ्रीज होने की स्थिति में खाताधारक को इसका कारण, संबंधित जांच एजेंसी का विवरण और शिकायत निवारण प्रक्रिया की जानकारी तुरंत प्रदान करें। बैंक अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़कर केवल पुलिस या कोर्ट जाने की सलाह नहीं दे सकते।

कोर्ट द्वारा जारी प्रमुख दिशा-निर्देशों के अनुसार, जांच अधिकारी को खाता फ्रीज करने की सूचना तत्काल संबंधित मजिस्ट्रेट को देनी होगी। इसके अलावा, यदि कोई शिकायत प्राप्त होती है, तो बैंक को उसे 7 दिनों के भीतर पोर्टल पर अपलोड करना होगा। जांच अधिकारी को 15 दिनों के भीतर शिकायत पर एक तर्कसंगत निर्णय लेना अनिवार्य होगा। यदि शिकायत सही पाई जाती है, तो बैंक को 48 घंटे के भीतर खाता डी-फ्रीज करना होगा।

अदालत ने यह भी कहा कि यदि 90 दिनों तक विवाद का कोई समाधान नहीं निकलता है और खाते को फ्रीज रखने का कोई वैध आदेश नहीं है, तो बैंक निर्धारित प्रक्रिया का पालन करते हुए खाते से रोक हटा सकते हैं। यदि किसी विशेष परिस्थिति में पूरे खाते को फ्रीज रखना अनिवार्य हो, तो जांच एजेंसी को इसके लिए एक विस्तृत और कारणयुक्त आदेश पारित करना होगा।

न्यायपूर्ण जांच की दिशा में कदम

हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि इस फैसले की प्रतियां प्रदेश के सभी थानों, साइबर सेल, जांच एजेंसियों और बैंकों को भेजी जाएं। अदालत ने याचिकाकर्ता के मामले में जांच अधिकारी को निर्देश दिया कि वे 10 अप्रैल 2026 की एसओपी (SOP) के अनुसार निर्णय लें। यदि जांच के लिए 980 रुपये सुरक्षित रखना पर्याप्त है, तो शेष राशि को तुरंत जारी किया जाए।

यह फैसला उन हजारों खाताधारकों के लिए बड़ी राहत माना जा रहा है, जिनके खाते मामूली साइबर संदिग्धता के कारण लंबे समय तक फ्रीज रहते हैं और उनका व्यापार प्रभावित होता है। कोर्ट का यह रुख जांच की पारदर्शिता और आम नागरिकों के अधिकारों के संरक्षण के बीच संतुलन बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम है।

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टिप्पणियाँ (2)

  • अ
    अमित कुमार2 घंटे पहले

    बहुत बढ़िया और संतुलित रिपोर्टिंग। FN News पर भरोसा बना रहता है।

  • स
    सपना ठाकुर4 घंटे पहले

    ग्वालियर-चंबल की खबरें इतनी डिटेल में और कहीं नहीं मिलतीं। शुक्रिया!

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