मध्य प्रदेश में शिक्षा बजट में 9 हजार करोड़ की बढ़ोतरी, फिर भी बंद हुए 2,400 से ज्यादा सरकारी स्कूल

मुश्ताक अहमद खान
Editor In Chief

मध्य प्रदेश में शिक्षा व्यवस्था को लेकर एक विरोधाभासी स्थिति सामने आई है। राज्य सरकार द्वारा शिक्षा के क्षेत्र में बजट आवंटन को लगातार बढ़ाया जा रहा है, लेकिन इसके बावजूद प्रदेश में सरकारी स्कूलों की संख्या में भारी गिरावट दर्ज की गई है। केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय की हालिया 'यूडाइस प्लस' रिपोर्ट 2025-26 के आंकड़े इस बात की पुष्टि करते हैं कि राज्य में स्कूलों के बंद होने या उनके विलय (मर्जर) की गति देश में सबसे अधिक रही है।
देशभर में बंद हुए स्कूलों में आधी हिस्सेदारी मध्य प्रदेश की
रिपोर्ट के अनुसार, एक वर्ष की अवधि में पूरे भारत में कुल 4,791 सरकारी स्कूलों को या तो बंद कर दिया गया या फिर उन्हें अन्य स्कूलों के साथ मर्ज कर दिया गया। चौंकाने वाली बात यह है कि इस आंकड़े का बड़ा हिस्सा अकेले मध्य प्रदेश से आता है। प्रदेश में कुल 2,426 सरकारी स्कूल इस प्रक्रिया के दायरे में आए हैं। राष्ट्रीय स्तर पर स्कूलों की कुल संख्या में आई कमी का यह एक प्रमुख कारण माना जा रहा है, जहां कुल संख्या 14.71 लाख से घटकर 14.66 लाख रह गई है।
प्रशासनिक स्तर पर तर्क दिया जा रहा है कि कम नामांकन वाले स्कूलों को संसाधनों के बेहतर उपयोग के लिए मर्ज किया गया है। हालांकि, यह नीति अब सवालों के घेरे में है क्योंकि बजट में भारी वृद्धि के बावजूद धरातल पर स्कूलों की संख्या कम हो रही है। पिछले तीन वर्षों के आंकड़ों पर नजर डालें तो स्कूल शिक्षा का बजट 2022-23 की तुलना में बढ़कर लगभग 36,730 करोड़ रुपए तक पहुंच गया है, जिसमें 9 हजार करोड़ रुपए की सीधी बढ़ोतरी हुई है।
बुनियादी ढांचे की कमी और छात्रों पर असर
बजट में हुई इस भारी वृद्धि के बावजूद, प्रदेश के सरकारी स्कूलों की स्थिति में सुधार की गति धीमी है। रिपोर्ट में स्पष्ट उल्लेख है कि कई सरकारी स्कूल आज भी स्थायी भवनों के अभाव में चल रहे हैं। बड़ी संख्या में ऐसे स्कूल हैं जो या तो जर्जर इमारतों में संचालित हो रहे हैं या फिर अस्थाई व्यवस्थाओं के भरोसे चल रहे हैं। बुनियादी ढांचे की यह कमी शिक्षा की गुणवत्ता पर सीधा असर डाल रही है।
स्कूलों के मर्जर की प्रक्रिया का सीधा असर विद्यार्थियों के दैनिक जीवन पर पड़ेगा। जिन स्कूलों को बंद किया गया है, वहां के बच्चों को अब अपनी पढ़ाई जारी रखने के लिए पहले की तुलना में अधिक दूरी तय करनी होगी। शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि स्कूल की दूरी बढ़ने से ग्रामीण क्षेत्रों में ड्रॉपआउट दर बढ़ने का खतरा भी बना रहता है, जो शिक्षा के अधिकार के मूल उद्देश्य के विपरीत हो सकता है।
भविष्य की चुनौतियां और प्रशासनिक स्थिति
यूडाइस प्लस रिपोर्ट में हालांकि जिला-वार आंकड़ों का विस्तृत विवरण नहीं दिया गया है, लेकिन राज्य स्तर पर यह आंकड़ा शिक्षा विभाग के लिए एक बड़ी चुनौती पेश करता है। सरकार के सामने अब यह सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी है कि बजट का उपयोग केवल कागजों पर न हो, बल्कि जर्जर स्कूलों की मरम्मत और छात्रों के लिए सुलभ शिक्षा व्यवस्था सुनिश्चित करने में किया जाए।
आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या सरकार स्कूलों के मर्जर की इस नीति को जारी रखती है या फिर कम नामांकन वाले स्कूलों को पुनर्जीवित करने के लिए कोई नई योजना लाती है। फिलहाल, बजट में बढ़ोतरी और स्कूलों की संख्या में कमी के बीच का यह अंतर प्रदेश की शिक्षा नीति पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।

Editor In Chief
मुश्ताक अहमद खान
टिप्पणियाँ (2)
- अअमित कुमार2 घंटे पहले
बहुत बढ़िया और संतुलित रिपोर्टिंग। FN News पर भरोसा बना रहता है।
- ससपना ठाकुर4 घंटे पहले
ग्वालियर-चंबल की खबरें इतनी डिटेल में और कहीं नहीं मिलतीं। शुक्रिया!