खरगोन: शिक्षा का बुरा हाल, पशुबाड़े में बैठकर भविष्य संवारने को मजबूर हैं 50 मासूम
Khargone Retwa village primary school students forced to study among cattle, latest education news. करीब 50 मासूम बच्चे हर दिन भैंसों के बीच बैठकर पढ़ाई करने को मजबूर हैं। जिला मुख्यालय से करीब 28 किलोमीटर दूर स्थित इस फालिया में स्कूल भवन को तीन साल पहले जर्जर और कंडम घोषित कर दिया गया था।

मोहम्मद फ़ैज़ान
संपादक

मध्य प्रदेश के खरगोन जिले से शिक्षा व्यवस्था की बदहाली की एक ऐसी तस्वीर सामने आई है, जो सरकारी दावों की पोल खोलती है। जिले के रेटवा गांव में प्राथमिक विद्यालय के करीब 50 बच्चे पिछले तीन सालों से एक पशुबाड़े में बैठकर पढ़ाई करने को मजबूर हैं। स्कूल का अपना भवन जर्जर होने के कारण उसे तीन साल पहले ही असुरक्षित घोषित कर दिया गया था, जिसके बाद से बच्चों का भविष्य पशुओं के बीच सिमट कर रह गया है।
पशुबाड़े में ही लगती है कक्षाएं
जिला मुख्यालय से लगभग 28 किलोमीटर दूर स्थित इस फालिया में स्थिति बेहद दयनीय है। स्कूल भवन बंद होने के बाद से बच्चों की कक्षाएं एक टीन शेड के नीचे लगाई जा रही हैं, जिसके चारों ओर भैंसें बंधी रहती हैं। शिक्षक अपनी कुर्सी इसी पशुबाड़े में लगाते हैं, जबकि मासूम बच्चे जमीन पर तिरपाल बिछाकर बैठने को विवश हैं। शैक्षणिक सामग्री और अलमारियां भी इसी असुरक्षित और अस्वच्छ माहौल में रखी गई हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि स्कूल तक पहुंचने के लिए न तो पक्की सड़क है और न ही बच्चों के लिए पीने के पानी की कोई उचित व्यवस्था है। इस बदतर स्थिति को लेकर स्थानीय लोगों और शिक्षकों ने कई बार संकुल, बीआरसी कार्यालय और जिला प्रशासन से गुहार लगाई है, लेकिन अब तक किसी ने भी नए भवन के निर्माण या मरम्मत की दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया है।
राजनीतिक गलियारों में मचा हड़कंप
जब यह मामला सार्वजनिक हुआ, तो विपक्षी दल कांग्रेस ने सरकार पर तीखे हमले किए। कांग्रेस जिलाध्यक्ष रवि नाईक ने मौके पर पहुंचकर स्थिति का जायजा लिया और आरोप लगाया कि शिक्षा के नाम पर करोड़ों रुपये का बजट खर्च करने के बावजूद बच्चों को सम्मानजनक माहौल नहीं मिल पा रहा है। उन्होंने इस व्यवस्था को बच्चों के अधिकारों का हनन बताया है।
मामले के तूल पकड़ने के बाद आनन-फानन में टीन शेड के आसपास ग्रीन नेट लगाकर इसे ढंकने की कोशिश की गई है। हालांकि, ग्रामीणों का मानना है कि यह केवल एक दिखावटी और अस्थायी समाधान है, जिससे बच्चों की पढ़ाई की परिस्थितियों में कोई वास्तविक सुधार नहीं आया है। यह महज एक खानापूर्ति है जो प्रशासन की विफलता को छिपाने के लिए की गई है।
प्रशासन की सफाई और भविष्य की अनिश्चितता
विद्यालय के प्राचार्य अनारसिंह डावर ने अपनी मजबूरी जाहिर करते हुए कहा कि भवन के जर्जर होने की सूचना और नए भवन के निर्माण के प्रस्ताव कई बार उच्च अधिकारियों को भेजे जा चुके हैं। उन्होंने बताया कि यह एक फालिया क्षेत्र है जहां बुनियादी ढांचों की कमी है और फिलहाल उपलब्ध संसाधनों के भीतर ही बच्चों की पढ़ाई जारी रखने का प्रयास किया जा रहा है।
फिलहाल, रेटवा गांव के इन 50 बच्चों का भविष्य एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहां उन्हें बुनियादी शिक्षा के लिए भी संघर्ष करना पड़ रहा है। प्रशासन की ओर से अब तक कोई ठोस आश्वासन नहीं मिला है, जिससे अभिभावकों में गहरी नाराजगी है। अब देखना यह है कि क्या प्रशासन इस मामले को गंभीरता से लेकर बच्चों को एक सुरक्षित और स्वच्छ स्कूल भवन उपलब्ध करा पाता है या नहीं।

संपादक
मोहम्मद फ़ैज़ान
टिप्पणियाँ (2)
- अअमित कुमार2 घंटे पहले
बहुत बढ़िया और संतुलित रिपोर्टिंग। FN News पर भरोसा बना रहता है।
- ससपना ठाकुर4 घंटे पहले
ग्वालियर-चंबल की खबरें इतनी डिटेल में और कहीं नहीं मिलतीं। शुक्रिया!
